चाइनीज लाइटों का बहिष्कार, बढ़ी चाक की रफ्तार

चाइनीज लाइटों का बहिष्कार, बढ़ी चाक की रफ्तारबाराबंकी में मिट्टी के दीये बनाते कुम्हार। 

कम्यूनिटी रिपोर्टर: अरुण मिश्रा

विशुनपुर (बाराबंकी)। दीपावली में इस बार चाइनीज वस्तुओं के बहिष्कार का असर बाराबंकी जिले में भी दिखाई पड़ रहा है। ऐसे में मिट्टी के बने दीयों की मांग बढ़ गई है।

फिर बढ़ी मिट्टी के दीयों की मांग

दीपावली में मिट्टी के दीपों की काफी मांग रहती है, लेकिन पिछले कुछ सालों से बाजार में चायनीज वस्तुओं की भरमार के चलते देसी मिट्टी की मांग कम पड़ गई थी, जिसके कारण क्षेत्र के कुम्हार भुखमरी के कगार पर पहुंच गए थे। उन्हें अपना परम्परागत कार्य छोड़ कर दूसरे कार्यों को करने के लिए मजबूर होना पड़ा। किन्तु इस बार चाइनीज की वस्तुओं के बहिष्कार के चलते एक बार फिर मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ गई है, जिससे जिले के कुम्हारों ने अपनी चाक की रफ्तार तेज कर दी है।

बीते कुछ सालों से घटी थी मांग

फतेहपुर ब्लाक के आइबाहार के कुम्हार हीरो प्रजापति (55 वर्ष) बताते हैं, "दीपावली में मिट्टी के बर्तनों की काफी मांग रहती है, जिसमें मलवा, दीये, भुरके, देरी प्रमुख है। इधर कुछ सालों से इन बर्तनों की मांग कम पड़ गई थी, लेकिन इस बार चाइनीज दियों के बहिष्कार के कारण अच्छी बिक्री के आसार है। जिससे हम लोग लगभग एक महीने से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं।"

प्राचीन काल से मिट्टी में तेल डालकर दीपक जलाने की परम्परा है। ऐसा माना जाता है कि तेल का दीपक जलाने से घर के आस-पास के बैक्टीरिया ख़त्म हो जाते हैं और पर्यावरण भी शुद्ध हो जाता है, लेकिन महंगाई के चलते लोग बाजार से मोमबत्ती व चाइनीज वस्तुओं का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। जिससे पर्यावरण को नुकसान होता ही है, साथ ही साथ देश की मुद्रा भी विदेशों को जाती है। लोगों को चाहिए कि देश में बनी वस्तुओं का इस्तेमाल ज्यादा करें।
बुजुर्ग संकटा प्रसाद (70 वर्ष), सिसवारा

चाहे जो हो लेकिन एक बात यह स्पष्ट है कि इस बार दीवाली में चायनीज वस्तुओं के बहिष्कार का असर दिखने लगा है, जिससे मिटटी के बर्तनों की मांग बढ़ने की उम्मीद है।

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