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यात्राओं के 84 साल: दांडी मार्च से अखिलेश की समाजवादी विकास रथयात्रा तक

Rishi MishraRishi Mishra   3 Nov 2016 9:38 PM GMT

यात्राओं के 84 साल: दांडी मार्च से अखिलेश की समाजवादी विकास रथयात्रा तकमहात्मा गांधी की दांडी यात्रा (साभार गूगल) और यूपी सीएम अखिलेश यादव की समाजवादी विकास रथ यात्रा।

लखनऊ। महात्मा गांधी के नमक बनाओ आंदोलन के तहत दांडी मार्च से शुरू हुआ यात्राओं का सिलसिला आज की राजनीति में भी उतना ही प्रासंगिक है। इंदिरा और राजीव गांधी ने पदयात्राएं कीं। लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली थी। इसके बाद में सियासत का व्यवसायीकरण हुआ, तब रोड शो होने लगे थे। मगर अब धीरे-धीरे महंगे रथों की राजनैतिक यात्राएं शुरू हो गई हैं। जिनसे बड़े नेता खुद को सीधा जनता से जोड़ने का प्रयास करते हैं। अलग-अलग समय पर इन यात्राओं ने भारत और खासतौर पर उप्र की राजनीति पर खास प्रभाव डाला।

84 साल पहले शुरू हुआ सिलसिला

यह सिलसिला अब से करीब 84 साल पहले शुरू हुआ था। महात्मा गाँधी ने समुद्र के किनारे गुजरात दाण्डी नामक स्थान से नमक कानून भंग करने का निश्चय किया था। 12 मार्च 1930 को उन्होंने साबरमती आश्रम से अपने साथियों के साथ दाण्डी यात्रा प्रारंभ की। उनके आश्रम से दाण्डी की दूरी 200 मील की थी। 24 दिनों में उन्होंने अपनी यात्रा पूरी की और दाण्डी पहुँचे। 6 अप्रैल 1930 को उन्होंने अपने हाथों से समुद्र के जल से नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया। महात्मा गाँधी की दाण्डी यात्रा स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महान घटना का आरंभ था। संपूर्ण देश की जनता पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। संपूर्ण देश में नमक बनाने का कार्यक्रम तेजी से फैल गया।

देखते ही देखते ले लिया आंदोलन का रूप

छोटे-छोटे कस्बों से लेकर बड़े-बड़े शहरों में भी नमक बनाया जाने लगा। समुद्र के किनारे शहरों एवं गाँवों में नमक बनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई, लेकिन समुद्र से काफी दूर शहरों एवं गाँवों में नमक निर्माण में अनेक कठिनाइयाँ थी। वहाँ सामुद्रिक जल उपलब्ध नहीं होने के कारण आसानी से नमक नहीं बनाया जा सकता था। इसलिए ऐसे जगहों में नोनियाँ मिट्टी को जमाकर उससे बड़ी मुश्किल से नमक तैयार किया जाता था। देखते ही देखते सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्वरुप आंदोलन जैसा हो गया।

गांधी परिवार को पदयात्रा पर भरोसा

इसके बाद में देश को आजादी मिली और इंदिरा गांधी ने छोटी पदयात्राओं को चुनाव जीतने का मंत्र बनाया। उन्होंने अमेठी, रायबरेली में इस तरह की अनेक पदयात्राएं की। जिससे उनका जनता में जुड़ाव बढ़ता चला गया। इसके बाद में उनके पुत्र राजीव गांधी ने भी इन पदायात्राओं को सहारा लिया। राजीव गांधी की पदयात्राओं में भीड़ का जोश देखते ही बनता था। सोनिया गांधी और राहुल गांधी का समय आते-आते पदयात्रा ने रोड शो का रूप ले लिया। जिसमें एक प्रचार गाड़ी पर नेता सवार होकर जनता से मिलता हुआ सड़क पर आगे बढ़ता था। साथ में दर्जनों गाड़ियां होती हैं। जिससे नेता अपनी ताकत का भी अहसास करवाता है।

लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा

23 अक्टूबर 1990 को आडवाणी की राम रथयात्रा समस्तीपुर (बिहार) में रोकी गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें गिरफ्तार कराया था। यह यात्रा गुजरात के सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक शुरू की गई थी। मगर बिहार में रथयात्रा रोके जाने के बाद में भाजपा ने तब केंद्र की वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। 1991 में पीवी. नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन गई थी। 21 साल बाद 2011 में बिहार से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जयप्रकाश नारायण के जन्मस्थल सिताब दियारा में फिर से आडवाणी की जनचेतना यात्रा शुरू कराई थी। नीतीश कुमार ने इस यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। उस समय बिहार में नीतीश कुमार की सरकार थी। यात्रा को सफल बनाने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। आडवाणी की यह सातवीं रथ यात्रा थी।

नीतीश सारथी आडवाणी अर्जुन

इस दौरान पूरे बिहार में जो पोस्टर-बैनर लगाए गए थे। इन पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कृष्ण (सारथी) और आडवाणी को (अर्जुन) की भूमिका में दिखाया गया था। इन बैनर-पोस्टर पर गीता का श्लोक 'यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत' भी लिखा गया था। इन बैनर में सारथी की भूमिका में नीतीश को दिखाया गया था। वहीं, आडवाणी अर्जुन की भूमिका में थे।

चंद्रबाबू नायडू भी कर चुके हैं विजयी यात्रा

दक्षिण के दिग्गज नेता तेलगूं देशम पार्टी के मुखिया और वर्तमान में आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने चुनाव से पहले 208 दिनों में 2800 किलोमीटर का सफर तय किया था। इस दौरान वो हजारों गांवों तक पहुंचे थे। उनकी ये पदयात्रा पार्टी की जीत में अहम कारक बनी थी।

‘मर्सडीज़ बेंज’ का है रथ

अखिलेश यादव के रथयात्रा के लिए बनाया गया मर्सडीज बेंच की डीजल बस को हाइटेक तरीके से बनाया गया है। इस हाईटेक बस का निर्माण ‘मर्सडीज़ बेंज’ ने किया है। इस बस में सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन इस विकास रथ में भी चाचा-भतीजे के बीच चल रही तल्खी साफ़ नजर आई। इस रथ में मुलायम और अखिलेश की तस्वीर तो लगी हैं, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल नदारद हैं। जिसके बाद से चर्चाएं आम हैं कि अभी भी दोनों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है और तनातनी जारी है। हजारों किमी की साइकिल यात्रा का रिकार्ड भी अखिलेश यादव के नाम से दर्ज है। अखिलेश यादव पहली बार 2001-2002 में क्रांति रथयात्रा पर निकले थे। साल 2011-12 में भी वे क्रांतिरथ से पूरे प्रदेश में जनसंवाद पर निकले थे। जिससे प्रदेश में बहुमत की समाजवादी सरकार बनी थी। एक बार फिर से 2017 के चुनाव के लिए जनादेश मांगने अखिलेश यादव रथयात्रा पर निकल रहे हैं। रथयात्रा में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोग बसों और ट्रेनों के जरिए लखनऊ पहुंच रहे हैं।

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