डिजिटल प्रचार की हवा सिर्फ शहरों तक सीमित

डिजिटल प्रचार की हवा सिर्फ शहरों तक सीमितगाँवों के मतदाताओं को तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां डिजिटल के साथ ही अभी भी चुनाव प्रचार के परंपरागत तरीकों पर निर्भर हैं

लखनऊ। डिजिटल प्रचार के शोर के बीच राजनीतिक पार्टियों को भी यह जानकारी है कि गाँव के मतदाताओं तक अपनी बात कैसे पहुंचानी है। इसलिए बीजेपी, सपा, कांग्रेस और बीएसपी ने प्रचार के लिए बड़ी संख्या में बैनर, पोस्टर, हैंडबिल और झंडे की व्यवस्था की है। इस बारे में जानकारी देते हुए कांग्रेस मीडिया विभाग के इंचार्ज और पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाटी ने कहा, ‘’गाँव के लोग आज भी पोस्टर और बैनर के जरिए पार्टी और उम्मीदवार से अधिक जुड़ते हैं, मोबाइल फोन घर-घर में आने के बाद भी मोबाइल के जरिए होने वाले प्रचार से वह नहीं जुड़ते हैं।’’

इसी का नतीजा है कि चुनाव प्रचार डिजिटल और हाईटेक होने बाद भी गाँवों के मतदाताओं को तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां डिजिटल के साथ ही अभी भी चुनाव प्रचार के परंपरागत तरीकों पर निर्भर हैं।बीजेपी, सपा, बीएसपी और कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर अपनी पार्टी का प्रचार करने के लिए बड़ी-बड़ी टीमें तैनात कर रखी हैं, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए प्रचार की हकीकत जानना हो तो राजधानी के बाहर मुश्किल से 20 किलोमीटर बाहर निकलिए। गाँवों में सोशल मीडिया नहीं बल्कि झंडा, बैनर, पोस्टर, हैंडबिल और माइक के जरिए होने वाले प्रचार के बारे में ही लोगों को पता है।

राजधानी लखनऊ से 25 किलोमीटर दूर बख्शी का तालाब विधानसभा क्षेत्र के अंतगर्त आने वाले मेहरौरा गाँव के किसान चेतराम ने बताया, “गाँव में चुनाव प्रचार करने वाली गाड़ियां रोज आ रही हैं, लेकिन मोबाइल पर अभी तक प्रचार नहीं देखा।’’यह हाल तब है केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों का जोर डिजिटल मीडिया की तरफ है। गाँव के मतदाताओं के बीच अभी भी परंपरागत चुनाव प्रचार ही मायने रखता है। बाराबंकी जिले की कुर्सी विधानभा क्षेत्र के भोजपुर गाँव में किसान भुवेश्वर से जब इंटरनेट और टीवी के जरिए आने वाले प्रचार के बारे में बात की गई तो उनका कहना था, ‘’मैं मोबाइल सिर्फ बात करने के लिए इस्तेमाल करता हूं। अभी तक इसके जरिए कोई चुनाव प्रचार करता है, इसकी मुझे जानकारी नही है।’’

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि गाँवों में जो मोबाइल फोन इस्तेमाल हो रहे हैं उसमें से स्मार्टफोन कम हैं। अधिकतर फोन बटन वाले हैं। इन मोबाइल पर इंटरनेट नहीं चलता है।” लखनऊ और बाराबंकी की सीमा पर स्थित देवरिया कलां गाँव के रहने वाले कैलाश यादव लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए फाइन ईयर के स्टूडेंट हैं। स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर फेसबुक से लेकर व्हाटसऐप तक चलाते हैं। चुनाव प्रचार के बारे में उनका कहना था, ‘’फेसबुक और व्हाटसऐप पर चुनाव से संबंधित कई मैटर आते हैं, लेकिन मैं बिना देखे ही डिलीट कर देता हूं।’’

झंडा-बैनर पोस्टर और हैंडबिल की इसलिए बढ़ रही डिमांड

डिजिटल प्रचार के शोर के बीच राजनीतिक पार्टियों को भी यह जानकारी है कि गाँव के मतदाताओं तक अपनी बात कैसे पहुंचानी है। इसलिए बीजेपी, सपा, कांग्रेस और बीएसपी ने प्रचार के लिए बड़ी संख्या में बैनर, पोस्टर, हैंडबिल और झंडे की व्यवस्था की है। इस बारे में जानकारी देते हुए कांग्रेस मीडिया विभाग के इंचार्ज और पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाटी ने कहा, ‘’गाँव के लोग आज भी पोस्टर और बैनर के जरिए पार्टी और उम्मीदवार से अधिक जुड़ते हैं, मोबाइल फोन घर-घर में आने के बाद भी मोबाइल के जरिए होने वाले प्रचार से वह नहीं जुड़ते हैं।’’ इसी का नतीजा है कि चुनाव प्रचार डिजिटल और हाईटेक होने बाद भी गाँवों के मतदाताओं को तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां डिजिटल के साथ ही अभी भी चुनाव प्रचार के परंपरागत तरीकों पर निर्भर हैं।

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