युवाओं की टीम ने खुद के बनाए ग्रेविटी मैपर की मदद से चांद पर दफन गड्ढों की खोज की

युवाओं की टीम ने खुद के बनाए ग्रेविटी मैपर की मदद से चांद पर दफन गड्ढों की खोज कीज्वालामुखी विस्फोट के बाद चांद पर बने गड्ढों की तस्वीर।

लखनऊ। चंद्रमा पर कई निशान दफन हैं। गुरुत्वाकार्षण मानचित्र (ग्रेविटी मैपर) ने छिपे हुए प्राचीन गड्ढों के निशान होने की पुष्टि की है। इन गड्ढों में लंबे समय तक लावा भरा था और ये चंद्रमा की सतह पर बढ़ रहा है। वेस्टलाफेट, इंडियाना के पर्ड्यू यूनिवर्सिटी (अमेरिका) में पढ़ने वाले जे मेलोश और उनके सहयोगियों ने खुद के गणितीय मॉडल के साथ गुरुत्वाकर्षण-मैपिंग डेटा की मदद से, दो भूमिगत ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बने गड्ढों की पुष्टि की है। एक तो शांति सागर के ठीक नीचे दफन है। मेलोश ने कहा कि हमे एक नई जानकारी ये भी मिली है कि चन्द्रमा की सतह भी छिद्रित हो रही है क्योंकि इसकी परत लगभग 4.2 अरब साल पहले बनी थी।

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ट्यूसॉन में एरिजोना विश्वविद्यालय के जेफरी एंड्रयूज-हन्ना का कहना है कि खगोलविदों ने चंद्र विज्ञान के शुरुआती दिनों से इन दफन गड्ढों के बारे में जाना है, जबकि इसकी खोज हमारे काम में शामिल नहीं था। वे कहते हैं, "हम अभी भी जमी हुई लावा के समुद्र में द्वीपों की तरह निशान देख सकते हैं। पिछले साल, एरिजोना विश्वविद्यालय में एलेक्स इवांस और उनके सहयोगियों ने नासा के ग्रेविटी रिकवरी और इंटीरियर लेबोरेटरी (जीआरआईएल) के मिशन का इस्तेमाल किया था जो प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोटों द्वारा बनाई गई बेसाल्ट के समुद्र के नीचे दफन 100 से अधिक गड्ढों के साक्ष्यों का पता लगा रहे हैं। जीआरआईएल ने दो जुड़वा अंतरिक्ष यान, ईबीबी और फ्लो को 2012 में नौ महीनों के लिए चंद्रमा की कक्षा में स्थापित किया था। इन्हीं से चंद्रमा सतह और उसके अंदरूनी घनत्व में हो रहे बदलावों की जानकारी मिली। एंड्रयूज-हन्ना कहते हैं, "गुरुत्वाकर्षण सतह के नीचे द्रव्यमान के वितरण के प्रति संवेदनशील है, इसलिए हम चाँद के अंदर देख पा रहे हैं।

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जीआरआईएल ने कुछ दफन घाटियों, ज्वालामुखीय गतिविधि के कारण प्राचीन ज्वालामुखी और अन्य संरचनाओं की वर्तमान स्थित का भी पता लगाया है। न्यू साइंटिस्ट डॉट काम ने बताया कि मेलोश और उनके सहयोगियों ने इस रिसर्च को अंजाम दिया है। वे भूमिगत उन नालियों को खोज रहे हैं जिनसे होकर लावा गड्ढों तक पहुंचे हैं। एक गड्ढे का व्यास करीब 200 किलोमीटर का है। ये निशान बाद के ज्वालामुखी और लावा के प्रभावों से बचे रहे।

ये संभवतः तीन अरब वर्ष पूर्व एक क्षुद्रग्रह के प्रभाव से बने थे। मेलोश का अनुमान है कि क्षुद्रग्रह ने 40 या 50 किलोमीटर की गहरा गड्ढा बना दिया, जो तब ज्वालामुखी के लावा से भर गया होगा। टीम ने कुछ छोटे-छोटे दबे हुए गड्ढे जिनका व्यास में 160 किलोमीटर है, की भी खोज की है। जसका नाम अशोक अनोमली रखा गया है। एंड्रयूज-हन्ना का कहना है कि दफन गड्ढे चंद्रमा के कई रहस्यों से पर्दा उठा सकता है। "एक प्याज की परतें छीलने की तरह, हम सतह के नीचे देखने के लिए गुरुत्वाकर्षण डेटा का उपयोग कर सकते हैं और नीचे की परतों की उम्र का सही ढंग से पता लगा सकते हैं।

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