अनु रॉय

अनु रॉय

"लेखिका महिला एवं बाल अधिकारों के लिए काम करती हैं। प्रकाशित लेख में उनके निजी विचार हैं।"


  • धड़क जो धड़कनों में उतरेगी आहिस्ता-आहिस्ता

    'जो मेरे दिल को दिल बनाती है तेरे नाम की कोई धड़क है ना।' सच है न। बिना प्रेम के हम क्या हम होते जो आज हैं, नहीं। प्रेम में हम रचते हैं ख़ुद को नए सिरे से। हम महबूब बन जाते हैं और महबूब हम। प्रेम कुछ ऐसा ही है न। हर चीज़ के मायने बदल कर रख देता है ये। वो जिन चीज़ों को हम सिरे से खारिज करते आये...

  • दुनिया को कोलिंडा की तरह ख़ूबसूरत होना चाहिए

    परसों जब दुनिया फ्रांस के जीतने का जश्न मना रही थी और मैं ग़मजदा थी क्रोएशिया के हार जाने से। जिन पलों मैं लुका की उदास आँखों की तस्वीर को अपने फ़ोन में क़ैद रही थी, उन्हीं पलों में मेरी उदास नज़रें ठहरी एक ख़ूबसूरत महिला पर। जो व्लादिमीर पुतिन और मैक्रों के साथ मैदान में आयी। उन्होंने पहना था क्रोएशिया...

  • यही है उम्मीद कि अब और मासूम न गुज़रें महिला खतने की तकलीफ़ से

    'अगर लड़कियों का खतना नहीं किया जाता है तो वे आदमियों के पीछे भागने वाली वेश्याएं बन जाती हैं।' जी बिलकुल ठीक पढ़ा आपने। मुस्लिम समाज का एक समुदाय, बोहरा समुदाय आज भी लड़कियों में खतना हो इसकी वक़ालत इसी तर्क के साथ करता है। यह समुदाय मानता है कि महिलाओं को सेक्स सिर्फ बच्चा पैदा करने या पति को...

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