दुनियाभर में कॉटन की कीमतों में गिरावट, भारतीय कपास किसानों पर भी संकट के बादल

दुनियाभर में कॉटन की कीमतों में गिरावट, भारतीय कपास किसानों पर भी संकट के बादल

लखनऊ। युनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर की मासिक रिपोर्ट के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रूई के दाम में गिरावट आने के कारण भारतीय वायदा बाजार में भी कमजोरी देखने को मिल रही है। जबकि विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू बाजार में रूई (कॉटन) के दाम में आगे कमजोरी आने की संभावना कम है।

अमेरिका में वर्ष 2018-19 में कॉटन उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की रिपोर्ट के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में शुक्रवार को कॉटन के दाम में गिरावट आई, जिसके बाद भारत समेत दुनियाभर के बाजारों में कॉटन की कीमतों में सुस्ती आई है। हालांकि बाजार के जानकारों के अनुसार भारतीय हाजिर बाजार में कॉटन के दाम में कोई खास बदलाव नहीं आने वाला है और सीजन के आखिरी दो महीने में स्थिरता का रुख रहेगा। जानकारों का यह भी कहना है कि फसल की प्रगति अगर कमजोर रही तो तेजी बनेगी लेकिन मंदी की संभावना कम है। कॉटन का सीजन पहली अक्टूबर से 30 सितंबर, यानी 12 महीने का होता है।

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मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स पर अक्टूबर वायदा दोपहर 3.11 बजे 260 रुपए यानी 1.08 फीसदी की गिरावट के साथ 23,930 रुपए प्रति रहा। कारोबार के दौरान ऊपरी स्तर 24,100 रुपए और निचला स्तर 23,900 रुपए प्रति गांठ रहा। इंटरकांनिटनेंटल एक्सचेंज (आईसीई) पर कॉटन वायदा सोमवार को 0.84 फीसदी फिसल कर 84.51 सेंट प्रति पाउंड पर कारोबार कर रहा था।

अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसएडी) की ओर से शुक्रवार को जारी अगस्त महीने की रिपोर्ट में अमेरिका में कॉटन उत्पादन 226.7 लाख गांठ (170 किलो) होने की उम्मीद जाहिर की गई है, जबकि पिछले महीने की रिपोर्ट में 237.2 लाख गांठ का अनुमान जारी किया गया था। यूएसएडी ने अगस्त में कॉटन का वैश्विक उत्पादन अनुमान को बढ़ाकर 15.456 करोड़ गांठ कर दिया है, जोकि पिछले महीने 15.402 करोड़ गांठ था। हालांकि यूएसएडी ने दुनिया के सबसे बड़े कॉटन उत्पादक भारत में अगले साल कॉटन उत्पादन का अनुमान 368 लाख गांठ पर स्थिर रखा है।

वर्धमान टेक्सटाइल्स लिमिटेड के निदेशक (कच्चा माल खरीद) इंद्रजीत धूरिया ने समाचार एजेंसियों से बातचीत में बताया "सीजन के आखिरी दो महीनों में कॉटन बाजार पर फसल की प्रगति का ज्यादा असर देखने को मिलेगा।" पिछले हफ्ते मॉनसून की चाल कमजोर रहने से कॉटन में तेजी दिखी, जबकि पहले मॉनसून के सामान्य रहने की खबर से बाजार में कमजोरी आई। लेकिन हाजिर बाजार पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा और कॉटन के दाम में तकरीबन स्थिरता बनी रही।


महाराष्ट्र के कपास व्यापारी अरुण गढ़ेवाल ने फोन पर गाँव कनेक्शन को बताया "फसल की रिपोर्ट अच्छी है, लेकिन चिंता की बात तो यह है कि रकबा पिछले साली की अपेक्षा अभी भी लगभग चार फीसदी कम है। गुजरात में भी यही हाल है। ऐसे में चिंता भी बढ़ सकती है। वहीं सौराष्ट्र के कुछ इलाकों में बारिश कम होने से भी किसान परेशान हैं।"

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पिछले हफ्ते तक देशभर में कपास का रकबा बीते सीजन के मुकाबले 3.85 फीसदी कम 112.60 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अतुल गंतरा का कहना है कि कपास पर बीते साल पिंक बालवर्म का हमला होने से फसल को काफी नुकसान हुआ था और इस साल भी अभी खतरे को लेकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसलिए अगले सीजन में उत्पादन में बढ़ोतरी की संभावना कम है।

कुछ जगहों से फसल पर कीट के हमले की खबरें भी हैं और आगे भी आती रहेंगी। इस बारे में सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर कॉटन रिसर्च सेंटर, नागपुर के कृषि विशेषज्ञों अपने पोर्टल के माध्यम से सुझाव दिए हैं कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण समय है जब कपास का पौधों में फूल व कोश लग रहे हैं। ऐसे समय में फसल को ज्यादा पोषण की जरूरत है, मगर कीट आकर उसके पत्तों का रस चूसकर उसे कमजोर कर दें तो फिर फसल में आगे वृद्धि नहीं हो पाएगी और पैदावार पर असर पड़ेगा। इसलिए फसल को कीटों से बचाना बहुत महत्वपूर्ण है।

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मुंबई के कॉटन बाजार विश्लेषक गिरीश काबरा का अनुमान है कि अगस्त में कॉटन वायदे में बड़ी तेजी नहीं भी आए तो भी कारोबारी रुझान मजबूत रहेगा, क्योंकि स्टॉक कम है और मांग लगातार बनी हुई है। बड़ी तेजी कुछ देर तक ही रहेगी, जोकि किसी फसल की प्रगति की रपट या मौसम की खराबी के कारण आ सकती है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार जंग पर बाजार कई बार अपनी प्रतिक्रिया दे चुका है, इसलिए उसको लेकर अभी कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं हो सकता है। लेकिन व्यापार जंग की नौबत को दूर करने के लिए अगर वैश्विक स्तर पर कोई भी प्रयास होगा तो बाजार जबरदस्त प्रतिक्रिया दे सकता है।

(एजेंसी से इनपुट)

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