समूह बनाया, ट्रेनिंग ली और इन महिलाओं ने शुरु किया दूध से बने उत्पाद बनाने का काम

Diti BajpaiDiti Bajpai   14 Nov 2019 10:57 AM GMT

करनाल (हरियाणा)। दूध के सही दाम न मिलने से मंगलौरा गांव में पशुपालन लगभग खत्म हो रहा था, लेकिन वहां की महिलाओं ने हार नहीं मानी। उन महिलाओं ने समूह बनाया, दूध से बनने वाले उत्पादों की ट्रेनिंग ली और आज यहीं महिलाएं इन उत्पादों को बेचकर अच्छी कमाई कर रही है।

करनाल जिले से आठ किलोमीटर दूर मंगलौरा गाँव में 36 महिलाओं ने मिलकर एक समूह बनाया जिसका नाम 'जन कल्याण समिति' है। इस समूह से जुड़ी मंगलौरा गाँव की बबिता (38 वर्ष) बताती हैं, "हमारे गाँव में भैस का दूध 40 रुपए लीटर बिक रहा है। वहीं हम जो शुद्व पनीर बेच रहे वो 400 रुपए किलो में बेचते है। इससे दोगुनी कमाई हो जाती है। इसके अलावा रसगुल्ला, कलाकंद, मैंगो लस्सी बनाकर भी हम बेचते है।"

जन कल्याण समिति

जन कल्याण समिति समूह

भारत समेत दुनिया के कई देशों में दूध के दाम न मिलने से किसान परेशान है। वहीं इस समूह द्वारा किए गए काम से गांव के और लोगों को भी दिशा मिली है। "महिलाओं के उत्थान के लिए हमने स्वयं सहायता समूह बनाया। उसके बाद नाबार्ड और एनडीआरआई से इन महिलाओं को दूध के उत्पाद बनाने के साथ आचार, मुरब्बा बनाने के साथ कई प्रशिक्षण दिए गए।", जन कल्याण समिति समूह में अध्यक्ष राजबाला मान ने गांव कनेक्शन को बताया।

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जन कल्याण समिति समूह के पूरे जिले में 400 समूह है। इन सभी में महिलाएं दूध के उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बनी हुई है। इसमें नाबार्ड और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) उनकी मदद करता है। एनडीआरआई अब 50 से ज्यादा महिला समूह को दूध के उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे चुका है।

किसानों के फायदे के लिए पूरे देश में दूध से उत्पादों बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी क्रम में करनाल स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान ने नाबार्ड और राष्ट्रीय आजीविका मिशन के बने समूह की महिलाओं को दूध से उत्पादों का प्रशिक्षण देना शुरू किया है ताकि महिलाएं खुद आत्मनिर्भर बन सके।

जन कल्याण समिति समूह में अध्यक्ष राजबाला मान

जन कल्याण समिति समूह में अध्यक्ष राजबाला मान

राजबाला आगे कहती हैं, "इन महिलाओं को पशुओं के स्वास्थ्य, उनके रख-रखाव और खान-पान के लिए प्रशिक्षण दिलाया है ताकि अच्छी गुणवत्ता के दूध उत्पादन हो। क्योंकि दूध अच्छा होगा तो उत्पाद अच्छा बनेगा और रेट भी अच्छे मिलेंगे।" भारत में करीब 10 करोड़ परिवार दूध व्यवसाय से जुड़े हुए है, इनमें से भूमिहीन, छोटे और सीमांत किसानों की संख्या सबसे अधिक है।

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मंगलौरा गाँव की यह 36 महिलाएं दूध से बने उत्पादों को तो बेच ही रहीं है इसके साथ ही जिले में कोई भी सरकारी कार्यक्रम, गाँव में शादी, जन्मदिन समेत कई कार्यक्रम में आर्डर भी लेती है। इनकी देखा देखी गांव के कई परिवारों ने इस काम को शुरू किया है आज वह दूध के साथ घी, मक्खन, पनीर, कलाकंद, पेड़ा, गुलाबजामुन के साथ कई और चीजें बेच रहे है।

उसी गाँव की कविता बताती हैं, "पहले हमने सीखा फिर बेचना शुरु किया। दूध बेचने का कोई फायदा नहीं था। पहले हम लोग दूध से लस्सी बनाते थे लेकिन प्रशिक्षण लेने के बाद कई तरह के उत्पाद बनाने सीखा। एक किलो दूध का पनीर 70 रुपए में बिक रहा है और एक किलो दूध की कीमत बाजार में 30 रुपए है तो कमाई दूध से नहीं है।"

कविता आगे कहती हैं, "जब से समूह बना है हम घर के बाहर निकल पाए है। समूह में हमको आर्थिक मदद भी मिली है। हम जो उत्पाद बनाते हैं वो बहुत आसानी से बाजार में बिक जाते है क्योंकि मौसम के अनुसार हम उत्पाद बनाते हैं और उसकी गुणवत्ता भी अच्छी होती है।"


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