भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के को शत-शत नमन

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भारत में सिनेमा की नींव रखने वाले दादा साहेब फाल्के की आज 146वीं जन्मतिथि है। उनका असली मान धुंदीराज गोविंद फाल्के था। सही मायनों में भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के ही हैं जिन्होंने अपने सिनेमाई सपने को भारत में सच कर दिखाया। वह भी उस दौर में जब देश में नाटकों का चलन हुआ करता था। तब न तो फिल्मों का कोई विशेषज्ञ था, न आलोचक और न ही फिल्म बनाने के लिए विशेष तकनीक। उस दौर में उन्होंने भारत में प्रदर्शित पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई। इस फिल्म के निर्माण से लेकर, निर्देशन, कास्टिंग और यहां तक कि मार्केटिंग भी खुद दादा साहेब फाल्के ने ही की थी। सिनेमा के ऐसे पितामह के बारे में कोई कौन नहीं जानना चाहेगा।

फाल्के का जन्म महाराष्ट्र के नासिक से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर त्रयम्बकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को हुआ था। ऐसा माना जाता है कि बचपन से ही उनमें कला के प्रति रुझान था। उन्होंने 1885 में मुंबई के सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया। वर्ष 1890 में यहां से उत्तीर्ण होने के बाद फाल्के ने बड़ौदा के कला भवन में प्रवेश लिया, जहां उन्होंने मूर्तिशिल्प, इंजीनियरिंग, ड्राइंग, पेंटिंग व फोटोग्राफी का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने मुंबई में ही अपने लिए एक कैमरा खरीदा था जिससे वे अक्सर फोटोग्राफी किया करते थे। फाल्के ने गोधरा में एक फोटोग्राफर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वर्ष 1903 में वह भारतीय पुरातत्व विभाग में ड्राफ्ट्समैन के तौर पर काम करने लगे थे।

कैसे बनी राजा हरिश्चंद्र

देश में उस वक्त क्रांतिकारी माहौल था। अनेक स्वाधीनता पुरुष और राजनेता अपने-अपने विचारों के जरिए देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए जनता को उत्साहित करते थे। उस दौरान फाल्के लोकमान्य तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे इसलिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। साल 1911 में क्रिसमस के दौरान उन्होंने मुंबई के एक तम्बू सिनेमा में लाइफ ऑफ क्राइस्ट नामक अंग्रेजी फिल्म देखी। फिल्म देखकर घर लौटे और सारी रात बेचैन रहे। दूसरे दिन अपनी पत्नी सरस्वती काकी के साथ वही फिल्म दोबारा देखी। हर बार वह अलग नजरिए से फिल्म देखते और इस तरह उन्होंने 10 दिन फिल्म देखकर मन में निश्चय किया कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर फिल्म बनाना चाहिए। यह बात अपनी पत्नी, रिश्तेदार तथा मित्रों को बताई। सभी ने उनके विचार की प्रशंसा तो की लेकिन फिल्म निर्माण को कठिन बताया। काफी समय विचार के बाद सुझाव आया कि कृष्ण के जीवन में विस्तार व उतार-चढ़ाव अधिक हैं इसलिए किसी सरल कथानक पर फिल्म बनाना चाहिए। इस तरह आखिर में राजा हरिश्चंद्र का कहानी सबको पसंद आई। दादासाहब ने फिल्म के निर्माण के लिए व्यापारी मित्र नाडकर्णी ने पैसे उधार लिए। अब फिल्म की कास्टिंग की बारी थी जिसके लिए सारे कलाकार मिल गए लेकिन  महारानी तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला तैयार नहीं हुई। आखिरकार भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की नायिका के लिए पुरुष को चुना गया। उसका नाम था अण्णा सालुंके जो महाराष्ट्र के एक ढाबे में वेटर था। 

सिर्फ तीन आने में देखिए दो मील लंबी फिल्म में 57 हजार चित्र

राजा हरिश्चंद्र जिसे बनाने में 15000 रुपए लगे थे जो उस समय बड़ी राशि थी। अब फिल्म बनकर तैयार हो गई तो इसकी मार्केटिंग का जिम्मा भी दादासाहेब के ऊपर था। उन दिनों नाटकों का बोल-बाला था। लोग दो आने में छह घंटे के नाटक का आनंद लेते थे। इस तरह दादासाहेब ने फिल्म को बेचने के लिए एक क्रियेटिव विज्ञापन तैयार किया जो आज के विज्ञापनों से बिल्कुल अलग था। “सिर्फ तीन आने में देखिए दो मील लंबी फिल्म में 57 हजार चित्र।” ये  फिल्म 17 मई 1913 को प्रदर्शित हुई। दूसरे दिन ही ‘कारोनेशन थियेटर’ में, जहां ये फिल्म लगी थी, वहां टिकट विंडों में दर्शकों की जबर्दस्त भीड़ जम गई। इतनी भीड़ कि पैर रखने की जगह नहीं। फिल्म देखकर दर्शक खुशी से झूमने लगे। साथ ही दादासाहेब भी, आखिरकार उनका सपना जो पूरा हुआ। इस फिल्म के बाद वे नासिक जाकर रहने लगे और वहीं से फिल्म निर्माण का कार्य जारी रखा। धीरे-धीरे उनकी संस्था ‘फाल्के फिल्म्ास’ में सदस्यों की संख्या बढ़ते-बढ़ते सौ से अधिक हो गई। उन्होंने ‘भस्मासुर मोहिनी’ व ‘सावित्री’ नामक फिल्में भी बनाई। इन फिल्मों की न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी बहुत तारीफ हुई।  

दादा साहेब की अंतिम फिल्म ‘गंगावतरण’ थी। उससे पहले उन्होंने कुल 125 फिल्मों का निर्माण किया था। 16 फरवरी 1944 को उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी सौवीं जयंती के अवसर पर 1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना हुई। यह भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार है जो फिल्मों में आजीवन योगदान के लिए केंद्र सरकार की ओर से दिया जाता है। पहला फाल्के पुरस्कार अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया। अब तक यह अवॉर्ड 64 लोगों को दिया जा चुका है, जिसमें शबाना आजमी भी शामिल हैं जिन्हें हाल ही में ये सम्मान मिला था। 

संकलन - शेफाली श्रीवास्तव

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