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बंदरों के आतंक से आम-जन-जीवन अस्त-व्यस्त

बंदरों के आतंक से आम-जन-जीवन अस्त-व्यस्तgaonconnection

शाहजहांपुर। जनपद में शहर से लेकर गाँव तक खेत-खलियानों से लेकर घरों तक और ट्रेनों से लेकर कचहरी तक व्याप्त है, बन्दरों का आतंक। जनपद में बन्दरों की संख्या खतरनाक सीमा तक बढ़ गयी है तथा बन्दरों के आतंक की बजह से आम-जन-जीवन अस्त-व्यस्त होने के साथ ही किसानों को भी भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। हर रोज कोई न कोई बन्दरों के हमले से गम्भीर रूप से घायल हो जाता है तथा किसानों की फसलों का यह बन्दर बहुत बड़े पैमाने पर नुकसान कर रहे हैं। 

इसकी वजह से छोटे किसानों को अपने परिवार को खिलाने तक के लिए अनाज बचा पाना मुश्किल हो रहा है। गाँव घुसगवां निवासी  राकेश यादव (46 वर्ष) बताते हैं, “बन्दरों से फसल की रखवाली के लिए 3000 से 5000 रुपये महीने तक खर्च करने पड़ते हैं, जिसकी वजह से हम छोटे किसान कर्ज में डूबते जा रहे हैं।” पूरे जनपद में बन्दरों के हमलों की घटनायें लगातार बढ़ रही हैं तथा तमाम लोग इनके शिकार होकर गम्भीर रूप से घायल हो चुके हैं, फिर भी प्रशासन द्वारा बन्दरों से सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किये जा रहे हैं।

पहले यह बन्दर जंगलों में और बाग-बगीचों तक ही सीमित रहते थे। जब से अन्धा-धुन्ध पेड़ों का कटान शुरू हुआ है तथा धीरे-धीरे बाग-बगीचे खत्म होते जा रहे हैं और जंगलों में भी लगातार हलचल बढ़ने की वजह से जंगली जानवरों और बन्दर आदि ने बस्तियों की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है, जो किसानों के खेत-खलियान से लेकर जन सामान्य की सुरक्षा की दृष्टि से काफी गम्भीर समस्या है। खेत-खलियान और घनी आबादी वाले क्षेत्रों के अलावा जनपद के कई पुलिस थानों और कचहरी तक में बन्दरों का भारी आतंक व्याप्त है। कचहरी में पहुंचने वाले मुवक्किल और वकील तक इन बन्दरों से सुरक्षित नहीं हैं। इसी तरह की एक घटना गाँव घुसगवां की एक बुजुर्ग महिला सावित्री देवी (75 वर्ष) के साथ घटित हुई जो इस समय जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हैं। 

इनके पति दलपत सिंह यादव ने बताया, “उनकी पत्नी नल पर पानी ले रहीं थीं कि इतने में अचानक एक बड़ा बन्दर उनके ऊपर कूद पड़ा तथा हाथ में पीछे से काफी जोर से काटकर मांस नोच ले गया। खून काफी निकल जाने की वजह से अर्द्ध बेहोशी की हालत में प्राइवेट सवारी से जिला अस्पताल लाना पड़ा।” ‘गाँव कनेक्शन’ संवाददाता के पूछने पर उन्होंने बताया कि 108 नम्बर एम्बुलेंस को कई बार टेलीफोन करने के बाद भी नहीं भेजा गया और कह दिया गया कि एम्बुलेंस नहीं मिल पायेगी।

मरीज की बिगड़ती हालत और जिला अस्पताल के डाॅक्टरों और नर्सों आदि की लापरवाही को देखते हुए मरीज के साथ आये तीमारदार ने अस्पताल वालों से कहा कि जब यहां से आप ठीक से इलाज नहीं कर पा रहे हैं तो इन्हें बरेली के लिए रेफर कर दीजिए परन्तु अस्पताल तंत्र ने उन्हें रेफर नहीं किया, क्योंकि यदि नियमानुसार अस्पताल की तरफ से रेफर किया जाता तो मरीज की गम्भीर हालत को देखते हुए सरकारी एम्बुलेंस से मरीज को बरेली भेजना पड़ता। 

सरकारी अस्पताल के बाहर तमाम प्राइवेट एम्बुलेंस खड़ी रहती हैं, जिनसे अस्पताल के डाॅक्टरों कमीशन बंधा रहता है इसीलिए अधिकतर मरीजों को रेफर नहीं करते हैं, जिससे मरीजों को मजबूरन प्राइवेट एम्बुलेंस किराये पर लेनी पड़ती है। शाहजहांपुर सरकारी अस्पताल के ट्रामा सेन्टर का हाल यह है कि गम्भीर हालत में पहुंचने वाले मरीजों को खून रोकने के इंजेक्शन भी बाहर से खरीदने पड़ते हैं। सरकारी अस्पताल से मरीजों को खून रोंकने वाले मामूली इंजेक्शन भी उपलब्ध नहीं कराये जाते।

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