छोटी नगरिया की पहचान कीचड़ वाली गलियां

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मैनपुरी। सूबे में सबसे ज्यादा विकास कार्य मैनपुरी में कराया जा रहा है। मगर, छोटी नगरिया की हालत सरकारी दावों को झूठा साबित करती है। जिला मुख्यालय से महज 5 किमी. की दूरी पर बसा है यह गाँव, लेकिन, हाल देखिए। यहां न तो रास्ते हैं और न ही कूड़ा निस्तारण की व्यवस्था। बरसात के पानी में डूबी कीचड़ वाली गलियों से होकर गुजरने के लिए लोग मजबूर हैं। पिछले 10 वर्षों में ग्राम प्रधान ने यहां विकास के नाम पर कुछ भी नहीं किया। 

कागजों में छोटी नगरिया की आबादी तकरीबन चार हजार है। मगर, इतनी बड़ी आबादी के लिए सुविधाएं नाकाफी हैं। सरकार की कोई भी योजना इस गाँव में नजर नहीं आती। यूं तो पूरे साल यहां बदहाली रहती है, लेकिन सबसे ज्यादा समस्या बरसात के दिनों में होती है। गाँव में पक्की सड़कों का अभाव है। गलियों में भी न तो खड़ंजे बिछवाए गए हैं और न ही इंटरलॉकिंग कराई गई है। 

हाल यह है कि अभी हल्की बरसात में ही गलियां बदहाल हो गईं। कच्ची पड़ी गलियों में कीचड़ ही कीचड़ भरा पड़ा है। एकाध सड़क को सीसी कराया भी गया, लेकिन सड़क के किनारे जल निकासी के लिए नालियां नहीं बनाई गईं। स्थिति यह है कि पूरे गाँव में जल निकासी के लिए किसी भी प्रकार का इंतजाम नहीं है। घरों से निकलने वाला गंदा पानी सड़कों पर भर रहा है। पूरे गाँव का गंदा पानी गलियों से होकर खाली पड़े प्लॉटों में भर गया है। स्थिति यह है कि निचले इलाके में रहने वाले ज्यादातर मकान पानी में डूब रहे हैं। आवागमन का रास्ता न होने की वजह से लोगों को पानी के बीच से होकर ही गुजरना पड़ता है। कीचड़ और फिसलन होने के कारण आए दिन लोग रास्ते में गिरकर चोटिल होते हैं। 

बारिश में गिर गया गरीब का मकान

गाँव के बीचों-बीच शैलेंद्र कुमार पुत्र माखनलाल का कच्चा मकान बना हुआ है। मकान के नाम पर टूटी हुई सी छत थी। गली-गली घूमकर चूरन बेचकर परिवार के सदस्यों का पेट पालने वाला शैलेंद्र इतना नहीं कमा पाता है कि अपने जर्जर पड़े मकान की मरम्मत करा सके। उसने जन प्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों तक से किसी योजना के तहत एक मकान देने की अर्जी लगाई, लेकिन हर बार कोई न कोई खानापूर्ति बताकर अर्जी फाड़ दी गई। अभी 19 जून की रात हुई बारिश में मकान की पूरी छत ढह गई। अब रहने के लिए आसरा भी नहीं है। गाँव के ही कुछ मददगारों द्वारा मुहैया कराई गई टिन शेड के नीचे शैलेंद्र ने अपना बसेरा बसाया है। 

वह सरकारी मशीनरी से खफा है। शैलेंद्र का कहना है, “मैंने ग्राम प्रधान से लेकर विधायक और अधिकारियों तक सभी से मदद मांगी थी, लेकिन सभी ने मना कर दिया। ग्राम पंचायत सचिव भी कई बार आकर लिखा-पढी करके ले गए, लेकिन आज तक राहत नहीं उपलब्ध कराई।” परेशान परिवार के सदस्य अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से आस लगा रहे हैं।

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