गोमती के पानी में लेड बना रहा बच्चों को हड्डियों का रोगी

Darakhshan Quadir SiddiquiDarakhshan Quadir Siddiqui   7 Oct 2016 5:41 PM GMT

गोमती के पानी में लेड बना रहा बच्चों को हड्डियों का रोगीगोमती नदी 

लखनऊ। सात साल के रोहन आहुजा को पैर में दर्द रहता था। पहले तो दर्द का कुछ पता नही चल पाया, लेकिन जब डाक्टर को दिखाया तो पता चला रोहन को अर्थराइटिस की परेशानी थी। यह सिर्फ रोहन की परेशानी नही, बल्कि रोहन की तरह न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं, जो अर्थराइटिस की शिकार हो जाते हैं। आमतोर पर यह रोग उम्र बढ़ने के साथ लोगों को होते हैं, लेकिन अब बच्चों को इसने अपनी गिरफत में ले लिया है। केजीएमयू के हड्डी रोग विभाग की ओर से हुई एक स्टडी में पता चला है कि अब बच्चे भी अर्थराइटिस जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो रहे हैं। इस स्टडी में पता चला है कि हर 10 हजार बच्चों में तीन बच्चे अर्थराइटिस के शिकार हैं।

लगातार बढ़ रहा जल प्रदूषण बड़ी वजह

गोमती के पानी में लेड होने और इसका असर भूमिगत जल स्त्रोतों पर पड़ने की वजह से भी बच्चों को हड्डी की बीमारियां शिकार बना रही हैं। लगातार बढ़ते जल प्रदूषण की वजह से ये परेशानी बढ़ती जा रही है। यह स्टडी केजीएमयू के ऑर्थोपेडिक विभाग के डॉ. अजय सिंह और प्रो. अब्बास की टीम ने संयुक्त रूप से की है। स्टडी में सामने आया है कि बच्चों में कमर दर्द, हड्डी का ठीक ढंग से विकास न होने जैसी समस्याएं बढ़ गई हैं।

पानी में लेड का होना संकेत

ये बीमारी गोमती नदी से सीधा पानी पीने वाले बच्चों में हो रही है। हैंडपम्प का इस्तेमाल करने और इंडस्ट्रियल इलाकों के आसपास रहने वाले बच्चों में यह बीमारी ज्यादा पाई जा रही है। अजय सिंह का कहना है कि अभी हम इस बीमारी के कारणों का सटीक अंदाजा नहीं लगा पाए हैं, लेकिन जांच से ऐसा पता चलता है कि इसकी वजह पानी में लेड का होना है। इस बीमारी की जांच के लिए लखनऊ स्थित भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान केंद्र के साथ इस विषय पर एडवांस स्टडी कराए जाने की तैयारी की गई है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, जिससे पूरी तरह से स्थिति को जाना जा सके और उससे निपटने के इंतजाम हो पाएं।

कैसे की गई है ये स्टडी

केजीएमू के ऑर्थोपेडिक विभाग में आए 36 बच्चों पर ये स्टडी की गई। इसमें 30 फीसदी बच्चे नेपाल के रहने वाले थे। 67 फीसदी बच्चे हैंडपम्प का पानी पीने वाले या इंडस्ट्रियल इलाकों से जुड़े थे। इसमें 60 फीसदी लड़के और 40 फीसदी लड़कियां शामिल थीं।

कितनी खतरनाक है यह बीमारी

जांच के दौरान बच्चों में लेड की मात्रा 36 माइक्रोग्राम तक निकली, जो काफी खतरनाक है। सामान्य स्थिति में यह 5 माइक्रोग्राम तक ही होनी चाहिए। ऐसे में यह सामान्य से 83 फीसदी ज्यादा है। इस बीमारी से पीड़ित होने पर हड्डियां विकसित नहीं हो पाती हैं। शरीर में अपंगता आने का खतरा रहता है। कमर के निचले हिस्से में हमेशा दर्द बना रहता है।

भारत सरकार को भेजेंगे रिपोर्ट

डॉ. अजय सिंह ने बताया है कि यह रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी जाएगी। साथ ही नेपाल को भी यह रिपोर्ट दी जाएगी, जिससे वह जरूरी कदम उठा सकें।

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