सिंगरौली पार्ट 3- मौत का पहाड़, सांसों में कोयला और जिंदगी में अंधेरा

Mithilesh DharMithilesh Dhar   29 Oct 2019 9:15 AM GMT

सिंगरौली पार्ट 1- बीस लाख लोगों की प्यास बुझाने वाली नदी में घुली जहरीली राख, कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा

सिंगरौली पार्ट 2- राख खाते हैं, राख पीते हैं, राख में जीते हैं

सोनभद्र/सिंगरौली (उप्र/मप्र)। फिर चर्चा है कि दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, दिल्ली में धुंध छाई है। दिल्ली में धुंध न पहुंचे इसके लिए पिछले साल से इंतजाम शुरू हो गए थे, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी से करीब 900 किलोमीटर दूर यूपी के सोनभद्र जिले में 18000 लोग इससे ज्यादा दूषित और जहरीली हवा और पानी के बीच रहने को मजबूर हैं।

कोयला खदान के पड़ोस मे बसे चिलकाटाड़ गांव के लोग अगर एक घंटे के लिए घर से बाहर निकल जाएं तो उनके नाक, मुंह और शरीर के ऊपर कोयले की राख की एक पतली परत बन जाती है।

गांव के ही लोग इस मामले में सरकार के उदासीन रवैसे से खासे नाराज हैं। चितरंगन गिरी (28 वर्ष) भोपाल से इंजीनियरिंग कर रहे हैं, छुट्टी में अपने घर आए थे, मुलाकात होने पर कहते हैं, " हम देश के सबसे प्रदूषित जगह पर रहते हैं। हमारे सर पर हमेशा मौत का साया है। हमारी जमीन से बिजली पैदा की जा रही, कोयला निकाला जा रहा। लेकिन इसके बदले हमें क्या मिला? इसके लिए आपको पूरा गांव घूमना पड़ेगा।"

सिंगरौली-सोनभद्र की सड़कों पर ऐसी धुंध आपको हर वक्त दिख जाती है

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) ने वर्ष 2018 में सोनभद्र-सिंगरौली के कुछ गांवों में कई तरह के नमूने लिए। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के नाखून और बालों में भी मरकरी का जहर है। सर्वे के दायरे में लिए गए करीब 300 किलोमीटर के इलाके में लगे पौधों और मिट्टी में भी मरकरी प्रदूषण की मौजूदगी पाई गई। जिन गांवों के लोगों के नमूने लिए गये थे उसमें चिलकाटाड़ गांव के लोग भी थे। वर्ष 2012 में विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (CSE) ने भी कुछ ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

रिपोर्ट में बताया गया था कि यहां के ज्यादातर ग्रामीण बेचैनी, याददाश्त की कमी, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, थकान, मतिभ्रम, अनिद्रा, कमजोर और कंपकंपी से ग्रस्त हैं। भूजल के स्रोतों में फ्लोराइड के मिल जाने से प्रभावित लोगों में फ्लूरोसिस (हड्डियों का टेढ़ा होना) जैसी बीमारी भी पनप रही है।

चिलकाटाड़ गांव वैसे आता तो है उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में, लेकिन परिक्षेत्र मध्य प्रदेश का सिंगरौली लगता है। सिंगरौली परिक्षेत्र में कुल 269 गांव आते हैं।

वर्ष 1977 में सोनभद्र के शक्तिनगर में जब देश की बिजली बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी एनटीपीसी (नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन) की खड़िया परियोजना की शुरुआत हुई थी, तब वहां के लोगों को चिलकाटाड़ में विस्थापित किया गया। गांव के लोग कहते हैं कि तब यहां की आबोहवा बहुत अच्छी थी, चारों ओर हरियाली थी। लेकिन फिर यहां नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) को कोयला खोदने के लिए जमीन दे दे गई। पेड़ों को काटा गया। एनसीएल का कोयला खदान गांव से मात्र 50 मीटर की दूर है।

ये तस्वीर चिलकाटाड़ की शाम ८ बजे की है। बगल में ही बिजली बनती है फिर गांव में बिजली मुश्किल से ८, १० ही आती है।

शक्तिनगर रेलवे स्टेशन से मात्र चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर बसे इस गांव के लोग जान हथेली पर लेकर यहां रह रहे हैं। यहां समस्या सिर्फ प्रदूषण और जहरीली राख, प्रदूषित पानी की ही नहीं है, बल्कि एक मानव निर्मित खतरा हमेशा इनके सिर पर रहता है। गांव के ठीक पीछे सैकड़ों फीट ऊंचा मिट्टी का पहाड़ नुमा टीला है, जिसे ओवर बर्डन कहा जाता है।

कोयला निकालने के लिए जब जमीन को खोदा जाता है तो उससे निकली मिट्टी को एक जगह जमा किया जाता है जिसे ओवर बर्डन (ओबी) कहा जाता है।

नियम कहता है कि कोयला खदान से आबादी की दूरी कम से कम 700 मीटर होनी चाहिए। बावजूद इसके चिलकाटाड़ गांव में 18000 लोगों के रहने के लिए 500 घर बना दिये गये।

कोयला खदानों से जब एक साथ कोयले से लदे सैकड़ों डंफर और ट्रक हॉल रोड (कोयला गाड़ियों के लिए बने रास्ते) से गुजरते हैं तो गांव में शाम जैसा माहौल हो जाता है। चोरों ओर फ्लाई ऐश (उड़न राख) दिखती है।

गांव के ठीक पीछे से गुजरते कोयला लदे ट्रक

गांव में जाने के बाद जब मैं वापस अपने होटल पहुंचा तो मेरे कान और नाक से काली राख निकल रही थी। मेरे पैरों पर राख की मोटी परत जम चुकी थी। ऐसे में आप अनुमान लगाइये कि यहां रहने वाले 18000 लोग किन परिस्थितियों में रहते होंगे?

वर्ष 2008 में भारी बारिश के कारण ओबी (ओवर बर्डन) ढह गया था। जिसके बाद वर्ष 2012 में डीएम की निगरानी में गांव का सर्वे हुआ। डीएम ने इसके बाद एनसीएल और एनटीपीसी के प्रबंधकों से कहा कि यह जगह रहने लायक नहीं है। यहां रहने वाले लोग बीमार हो सकते हैं इसलिए इन्हें कहीं और विस्थापित किया जाये। अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन डीएम ने कहा कि "यह जगह रहने लायक नहीं है। यहां प्रदूषण बहुत ज्यादा है जिसकी वजह से गंभीर बीमारियों का खतरा है। यहां लगभग 500 घर हैं। ऐसे में इन्हें यहां से दूसरी जगह विस्थापित किया जाना चाहिए।"

गांव में घूमने के बाद मेरे पैरों का वो हिस्सा जो खुला रह गया था।

एनसीएल और एनटीपीसी के प्रबंधकों ने इस पर सहमति जताई और कहां कि गांव के जो लोग यहां से जाने चाहते हों हमें बता दें। गांव वालों ने सहमति भी जताई लेकिन बात आई-गई हो गई। इन्हें आज भी यहां से विस्थापित नहीं किया जा सका।

इस बारे में एनसीलए खड़िया परियोजना के प्रोजेक्ट मैनेजर सैयद घोरी कहते हैं, " पहले ये बस्ती हमारे ब्लॉक से काफी दूर थी। लेकिन यहां के लोगों ने अवैध अतिक्रमण किया जिस कारण वे और पास आते जा रहे हैं। हम तो अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं उन्हें किसी तरह की दिक्क्त न हो लेकिन वे इसके लिए खुद जिम्मेदार हैं। हमने वहां पेड़ भी लगा रखे हैं ताकि उन्हें दिक्कत न हो।"

वर्ष २०१२ में तत्कालीन जिलाधिकारी की रिपोर्ट

हालांकि कोल ब्लॉक का ओबी दूर से देखने पर काफी हराभरा दिखता है। लेकिन पास जाकर देखने पर पता चलता है कि ये सभी पेड़ बबूल के हैं जो खुद उगे हैं।

इस बारे में चितरंजन बताते हैं, "एनसीएल वालों ने कहा था कि उन्हें इस क्षेत्र को ग्रीन बनाया है, लेकिन सच्चाई आपके सामने है। दो करोड़ पौधे लगाने का वादा हुआ था, लेकिन लगे एक भी नहीं।"

इसी गांव के रहने वाले हीरा लाल (35) कहते हैं, " जो भी है आपके सामने है। आप तो लखनऊ से आये हैं, देखिए यहां कितनी राख है। यहां किसी के भी छतों पर आपको कपड़े सूखते हुए नहीं दिखेंगे। मेरे तीन साल के ही बेटे को दमा हो गया है। डॉक्टर ने का कि प्रदूषण की वजह से ऐसा हुआ है। वर्ष 2012 में हमें यहां से हटाने के लिए कह दिया गया था। तब से अब तक हम हजारों बार एनटीपीसी के अधिकारियों से गुहार लगा चुके हैं लेकिन अब कोई सुनवाई नहीं हो रही।"

चिलकाटाड़ गांव से फेसबुक लाइव


गांव के कई लोगों को दिल की बीमारी है तो कई दिव्यांग हो चुके हैं। पीने का पानी भी दूषित है। साफ पानी के लिए कुछ साल पहले आरओ लगवाया गया था जो खराब हो चुका है। बगल में ही बिजली संयंत्र है, लेकिन गांव में कुछ घंटे ही बिजली की आपूर्ति होती है। शाम के समय अक्सर चारों ओर अंधेरा दिखता है।

चिलकाटाड़ के ग्राम प्रधान रवींद्र यादव कहते हैं, " मामला एनटीपीसी और एनसीएल के बीच फंस गया है। एनसीएल वाले कह रहे हैं कि आपको यहां एनटीपीसी ने बसाया है तो आप उनसे कहिए कि वे आप को सुरक्षित स्थान पर ले जाएं। दूसरी ओर एनटीपीसी का कहना है कि आपको एनसीएल के कारण दिक्कत हो रही इसलिए आप उनसे गुहार कहिए।"

एनसीएल ने उन लोगों से आवेदन मांगे थे जो यहां से विस्थापित होना चाहते थे

"गांव के एक तरफ रेलवे लाइन है तो दूसरी ओर ओबी। ज्यादातर नलों से गंदा पानी आता है। युवाओं के पास रोजगार नहीं है। यहां आपको हर घर में कोई न कोई बीमार मिल जायेगा। लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। हम कितनी बार डीएम, एसडीएम से मिल चुके हैं। हम इस नरक ये बाहर निकलना चाहते हैं।"

60 वर्षीय रामसुभग शुक्ला आज भी इंतजार में हैं कि कब उन्हें और उनके परिवार को यहां से दूसरी जगह बसाया जायेगा। रामसुभग शुक्ला इसको लेकर लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे हैं। वे कहते हैं, " 1974-75 में एनटीपीसी ने हमें यहां बसाया था। उसके बाद 1981 में एनसीएल की खदान यहां आ गई। उसके आने से पहले यहां सब कुछ ठीक था। लेकिन उनके आने के कुछ वर्षों बाद ही स्थिति बदल गई।"

"मैं कई बार प्रदर्शन भी कर चुका हूं। लगातार मांग करता रहा है कि हमें यहां से निकाला जाये, लेकिन जाएं तो जाएं कहां। हमारी ही जमीन लेकन अब हमें यहां मरने के लिए छोड़ दिया। चुनाव के समय नेता लोग आते हैं और वादा करके चले जाते हैं।" रामसुभग आगे कहते हैं।

इस मामले पर एनटीपीसी के प्रबधंक से बात नहीं हो पाई लेकिन पीआरओ आदेश पांडेय ने जानकादी दी। उन्होंने बताया, " जब ये मामला उठा था तभी एनसीएल ने इसे लेकर सहमति जताई थी कि वे गांव से लोगों को विस्थापित करेंगे। इसके बाद उन्होंने क्यों नहीं किया ये तो वही बता सकते हैं।"

विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (CSE) की वर्ष 2012 की रिपोर्ट


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