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नर्मदा के साथ-साथ : पहला दिन, कहानी जलुद की, जहाँ सौ-फीसदी पुनर्वास हो गया है

‘नर्मदा के साथ-साथ’ की कहानी कई कड़ियों में होगी। ये पहला भाग है। पढ़िए और जानिए कि सरदार सरोवर बांध बनाने के लिए उसके आसपास रहने वाले लोगों के साथ विस्थापन के नाम पर क्या-क्या किया गया। इस विशेष श्रृंखला में आप वास्तविकता से रू-ब-रू होंगे। मध्य प्रदेश से अमित की विशेष रिपोर्ट

यह कहानी नर्मदा के साथ-साथ चली है। नर्मदा नदी कई मायनों में विशेष है। जहाँ भारत की अधिकतर प्रमुख नदियां पूर्वी तट यानि बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, वहीं नर्मदा पश्चिमी तट यानि अरब सागर में गिरने वाली नदी है। यह 'रिफ्ट' घाटी में बहने वाली नदी है, जो कभी भी अपना स्थान नहीं बदलती। यह दो पर्वत श्रृंखलाओं से होकर बहती है। उत्तर में विंध्य पर्वत और दक्षिण में सतपुड़ा। नर्मदा ही भारत को उत्तर-दक्षिण में बांटने वाली प्रमुख रेखा है। इसके उत्तर में सिंधु-गंगा के मैदान खत्म होते हैं तो दक्षिण में एक नया भू-शास्त्र, दक्कन का पठार शुरू होता है।

यूं तो अपने आरंभ से लेकर अंत तक नर्मदा भारत के तीन प्रदेशों, जिसमें मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात शामिल हैं, से गुजरते हुए करीब 1300 किलोमीटर का सफर तय करती है। सरदार सरोवर बांध में पानी की ऊंचाई 138 मीटर होने से मध्यप्रदेश में 193 गाँव-क़स्बे, महाराष्ट्र में 33 गाँव और गुजरात में 19 गाँव डूब प्रभावित हुए हैं। पर्यावरणविद और नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोग इसे 121-122 मीटर रखना चाहते हैं। 121 मीटर पर मध्य प्रदेश में प्रभावित गाँवों की संख्या 177 थी। शेष महाराष्ट्र और गुजरात में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

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नर्मदा प्रकृति है, उसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन हमारी अपनी सीमाएं हैं। हम 1300 किलोमीटर का सफर तय नहीं कर सकते। कर भी सकते हैं तो चीजों को समेट नहीं सकते इसीलिए हमने दो राज्यों में नर्मदा के साथ-साथ करीब 400 किलोमीटर का सफर तय किया। इस दौरान हमने नर्मदा तीरे बसे हुए 15 गांव या क़स्बों की यात्रा की और जानने की कोशिश की कि आधुनिक भारत के जो मंदिर बनाए गए हैं, उनसे लोगों की क्या प्रार्थनाएं हैं। यह यात्रा बस, कार, बाइक या पैदल... जो भी साधन मिलता गया, उससे हुई।

किसी भी चीज़ का एक निश्चित समय होता है। नर्मदा आंदोलन का भी अपना एक समय रहा, लेकिन हम इस समय के साथ नहीं चल पाए। 17 सितंबर से 6 दिन बाद हमने यह यात्रा की। सफ़र दिल्ली से शुरू हुआ, इंदौर होते हुए मंडलेश्वर के गाँव जलुद से हमने यात्रा शुरु की और जो बाद में गुजरात के एक गाँव में खत्म हुई।

आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं हमने इसमें सरकारी पक्ष को नहीं लिया है। हालांकि हमें पत्रकारिता की पढ़ाई में सभी पक्षों को सुनकर, चीज़ों को बैलेंस करके लिखना बताया गया था लेकिन यहाँ मैं समाचार लेखन के इस नियम का पालन नहीं कर रहा हूँ। बस इतना जान लीजिए कि जब बांध की ऊंचाई बढ़ाने की बात आई तो तीनों राज्य की सरकारों ने उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दायर किया कि पुनर्वास-मुआवजे के सभी काम पूरी तरह हो चुके हैं, और बांध की ऊंचाई बढ़ाई जा सकती है।

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इसके अलावा मैं उन लोगों से भी माफी मागूंगा जो इस व्यवस्था से पीड़ित हैं, जिन्होंने अपनी बात मुझे इस आशा से बताई कि लिखते ही मानो कोई चमत्कार हो जाएगा। पता नहीं मैं उनके शब्दों को कितना यहाँ रख पाउंगा और अगर रख भी दिया तो किस हद तक उनकी पीड़ा को व्यक्त कर पाउंगा। आप मुझे माफ करें।

पहला दिन, पहला गाँव- जलुद (तहसील महेश्वर, जिला खरगोन, इंदौर से दूरी करीब एक सौ किलोमीटर)

इस गाँव में पहुंचने में कोई परेशानी नहीं होती। सड़कें अच्छी हैं। सरकार की ओर से परिवहन का कोई साधन नहीं है लेकिन सरकारी परमिट पर चलने वाली निजी बसें बड़ी आसानी से आपको आपकी मंज़िल तक पहुंचा देती हैं। जलुद गाँव उन इक्का-दुक्का गाँवों में से है जिसका सौ फीसदी पुनर्वास हो गया है और पुराने गाँव में अब कोई नहीं रहता।

यह गाँव सीधे सरदार सरोवर बांध से प्रभावित नहीं है बल्कि नर्मदा घाटी विकास परियोजना में बनने वाले महेश्वर (बांध) जल विद्युत परियोजना से है। इस गाँव में सबसे पहली हमारी मुलाकात फूलचंद कानुड़े से हुई। फूलचंद खेती करते हैं। पुराने गाँव में फूलचंद का मकान करीब 30 गुणा 60 फीट में था जिसके बदले इन्हें नए पुनर्वास स्थल पर 60 गुणा 90 फीट कर प्लॉट दिया गया। मकान बनाने के लिए मुआवजे के नाम पर इन्हें एक बार 40 हज़ार रुपए मिले और एक बार 18 हज़ार रुपए। यानि कुल 58 हज़ार रुपए।

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इतनी रकम में किस युग में मकान बनता होगा, आप खुद अनुमान लगाइए इसीलिए यहाँ साल बताना अप्रसांगिक हो जाता है। इतना ही नहीं फूलचंद की करीब 13-14 एकड़ ज़मीन डूब प्रभावित हो रही है, जिसे अधिकारी-कर्मचारी डूब प्रभावित नहीं मान रहे हैं। फूलचंद के अनुसार एक बार बांध भरने के बाद उनके खेत टापू बन जाएगें जिसमें नाव से हल-बैल लेकर जाना पड़ेगा। यहाँ बता दूं कि अभी तक महेश्वर बांध में पानी भरना शुरु नहीं किया गया है।


इस नए बसे गाँव में पक्की सड़कें नहीं हैं। चूंकि व्यवस्था से प्लॉटिंग की गई है तो बस सड़कों के नाम पर वही सब है जो बच गया है। अगली मुलाक़ात उमराव सिंह सोलंकी से हई। गाँव वालों ने बताया कि उमराव सिंह नर्मदा बचाओ आदोंलन से जुड़े हैं। स्वयं वह भी इसकी पुष्टि करते हैं। क्या यह विकास या पर्यावरण की बहस है, यह पूछने पर उमराव सिंह इंकार करते हैं। उनके अनुसार वे बांधों के विरोध में नहीं हैं। ना यह आंदोलन बांधों के विरोध में है। बल्कि यह उचित मुआवजे और पुनर्वास की लड़ाई है।

उमराव सिंह की खेती की ज़मीन भी डूब प्रभावित क्षेत्र में आ रही है। लेकिन ना तो अभी तक उन्होंने मुआवजा लिया है और ना ही ज़मीन पर कब्जा छोड़ा है। वे कहते हैं कि 25 फीसदी खेती योग्य ज़मीन जाने पर कर से कम 2 एकड़ भूमि देने का प्रावधान बनाया गया है लेकिन प्रशासन उनकी इस बात को नहीं सुनना चाहता।

उमराव सिंह के अनुसार मुआवजा-पुनर्वास की प्रक्रिया का क्रियान्वयन सामान्य वर्गों के लोगों के बीच तो ठीक-ठाक हुआ है लेकिन दलित-आदीवासी लोगों को बस चलता कर दिया गया है। करीब 35 लोग अभी भी ऐसे बचे हैं जिन्हें प्लॉट नहीं दिया गया जबकि मुआवजा या अनुदान के नाम पर भी किसी को 15-18 हज़ार दे दिए गए तो किसी को 25 हज़ार। ऐसे दो लोगों से भी मेरी बार हुई। प्रशासन का कहना है कि जब घोषणा हुई तो इन लोगों के घर गाँव में नहीं थे। उमराव सिंह प्रशासन के इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए पूछते हैं कि अगर घर गाँव में नहीं था मुआवजा क्यों दिया? मतलब प्रशासन खुद असमंजस में है। इन 35 लोगों में से हम दो से बिना किसी मेहनत से बड़े आराम से मिल गए। ये लोग अभी भी डूब इलाके में ही रहते हैं।

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लोकेश ऐसे ही एक हैं। ये मजदूरी करते हैं। 25 हज़ार मुआवजा मिला और 5 हज़ार रुपए घर को तोड़ने के लिए मिले। यानि कुल 30 हज़ार रुपए। इन्होंने घर नहीं तोड़ा है। घर क्या हैं, कच्ची झोपड़ी जैसा कुछ है। चूंकि अभी पानी नहीं भरा गया है, तो इसी में रह रहे हैं। इन्हें प्लॉट नहीं दिया गया है। इन घरों में बिजली नहीं है, जबकि बिजली इनकी झोपड़ियों के ठीक ऊपर से निकली है।

गाँव के सरपंच इससे सबसे इंकार करते हैं। वे आदिवासी भील समुदाय से हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि विकास होना चाहिए। सरकार ने मुआवजे-पुनर्वास के प्रयास किए हैं, फिर भी 'कुछ' मामले रह गए हैं लेकिन अधिकतर का 'निपटारा' हो गया है।

पहले भाग का अंत करने से पहले एक छोटी सी कहानी और... जलुद में सरकारी प्रयास (इंटेक) द्वारा पानी को अपलिफ्ट करके सौ किमी दूर इंदौर भेजा जाता है। लेकिन यहाँ के किसानों को अपने खेतों में पानी लेने के लिए पुराने गाँव में ही नर्मदा के तट अपने-अपने पंप लगाने पड़ते हैं।

मतलब बांधों से सिंचाई के जो दावे किए जाते हैं, वे किसानों को स्वयं अपने बल पर ही करने पड़ते हैं। इंदौर जाने वाली लाइन से किसी को पानी देने की कोई व्यवस्था नहीं है। ना खेतों के लिए ना पीने के लिए। शहरों को पानी दिया जा रहा है, ग्रामीण अपना इंतज़ाम खुद करते हैं।

दिन ढलने को है। अगली कहानी, अगले दिन होगी।