राजस्थान सरकार द्वारा बाल विवाह के 'पंजीकरण' के लिए कानून बनाए जाने पर विवाद

राजस्थान सरकार बाल विधवाओं को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए बाल विवाह को पंजीकृत कराना चाहती है। हालांकि कई सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर में यह समाज को फिर से पीछे की ओर ले जाने वाला और असंवैधानिक कदम है। कार्यकर्ता इसे सामाजिक बुराई के लिए 'कानूनी मंजूरी' के रूप में देख रहे हैं।

Devendra Pratap Singh ShekhawatDevendra Pratap Singh Shekhawat   11 Oct 2021 11:49 AM GMT

राजस्थान सरकार द्वारा बाल विवाह के पंजीकरण के लिए कानून बनाए जाने पर विवाद

आए दिन बाल विवाह की खबरें आती रहती हैं, जबकि सबको पता है कि यह अपराध है। फोटो: अरेंजमेंट

जयपुर (राजस्थान)। वर्षा की उम्र 16 साल है। वह राजस्थान के जोधपुर जिले के एक गांव में अपने माता-पिता के साथ रहती हैं। जब उसने गांव कनेक्शन को बताया कि जल्द ही उसे अपने पति के साथ ससुराल जाना होगा, तो उसकी आवाज में एक डर था। वह इस शादी से खुश नहीं थी और ससुराल नहीं जाना चाहती थी।

वर्षा को अपनी शादी से जुड़ी कोई बात याद नहीं है। सिवाय इसके कि उसकी शादी एक साल की उम्र में कर दी गई थी। तब से उसके माता-पिता उसके 'बड़े होने' का इंतजार करते रहे हैं ताकि वे उसका गौना कर सकें। यह माता-पिता के घर से पति के घर जाने की एक औपचारिक विदाई है।

लेकिन, वर्षा अपने पति के साथ नहीं जाना चाहती। उसने सुना है कि वह ठीक आदमी नहीं है, गलत कामों से जुड़ा है। वह बड़ी निराशा से कहती है, "अगर शादी नहीं टूटी, तो मेरा जीवन नरक हो जाएगा।" वह अपनी 'शादी' से बाहर निकलने की कोशिशों में लगी है।

वर्षा जिस राज्य (राजस्थान) में रह रही है, वह बाल विवाह के लिए बदनाम है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान, भारत में बाल विवाह के मामले में शीर्ष 12 राज्यों में शामिल है। देश में बाल विवाह का प्रतिशत जहां 11.9 प्रतिशत है, वहीं राजस्थान में यह 16.2 प्रतिशत है।

कोविड-19 महामारी ने इस स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। पिछले डेढ़ सालों में बाल विवाह के मामले फिर से बढ़ने की लगातार खबरें आ रही हैं।

कोरोना महामारी के चलते बाल विवाह के मामलों में वृद्धि हुई है। फोटो: पिक्साबे

पिछले महीने 17 सितंबर को राजस्थान सरकार ने राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 में संशोधन करते हुए राज्य विधानसभा में एक विधेयक पारित किया था। जिससे यह मामला और पेचीदा हो गया है।

नए संशोधन में कहा गया है कि अगर 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के की शादी की जाती है तो उनके माता-पिता या अभिभावक को शादी के 30 दिनों के अंदर प्रशासन को सूचित करना होगा। केंद्र सरकार के बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम, 1929 के अनुसार, भारत में लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष है।

राजस्थान का नया विधेयक अन्य बातों के साथ-साथ अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम 2009 की धारा 8 में संशोधन करने के लिए पारित किया गया है। यह सरकार को विवाह पंजीकरण के लिए एक अतिरिक्त जिला विवाह पंजीकरण अधिकारी और ब्लॉक विवाह पंजीकरण अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार भी देगा।

लेकिन, इस संशोधन ने न केवल राज्य में बल्कि पूरे देश में हंगामा खड़ा कर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार के इस कदम को प्रतिगामी (समाज को पीछे की ओर ले जाने वाला) और असंवैधानिक बताया है।

17 सितंबर को विधेयक पारित किया गया था। तब विपक्ष ने इसे "काला दिन" कहा था और इसका जोरदार विरोध हुआ था। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों ने वाकआउट किया और यहां तक ​​कि कांग्रेस समर्थित निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने भी विधेयक का विरोध किया था।

चिंतित कार्यकर्ताओं ने कहा कि राज्य को बाल विवाह मुक्त बनाने की बजाय, नया कानून बाल विवाहों को पंजीकृत करके एक 'कानूनी मंजूरी' दे रहा है।

राजस्थान उच्च न्यायालय के वकील अमितोष पारीक, ने उच्च न्यायालय में कानून के खिलाफ याचिका दायर की है। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "बाल विवाह को मौजूदा समय में अमान्य बनाने की जरूरत है। लेकिन सरकार इस कानून के माध्यम से इसे प्रोत्साहित कर रही है। यह बाल विवाह को खत्म करना मुश्किल कर देगा।" पारीक ने आगे कहा, " फिलहाल भारतीय कानून के अनुसार, बाल विवाह एक अपराध है, लेकिन अवैध नहीं है।"

हालांकि, राजस्थान के संसदीय मामलों के मंत्री शांति धारीवाल ने यह कहते हुए बिल का बचाव किया कि यह कानून बाल विवाह को वैध नहीं बनाता है, सिर्फ पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। उन्होंने कहा कि जिला कलेक्टर चाहें तो बाल विवाह के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं।

संसदीय मामलों के मंत्री ने दोहराया, "विवाह प्रमाण पत्र एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके अभाव में विधवा को किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा।"

राजस्थान सरकार द्वारा हाल ही में राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 में संशोधन के बाद से, ऐसी शादियों के लिए भी अब विवाह प्रमाण पत्र जरूरी हो गया है। फोटो: अरेंजमेंट

क्या विवाह प्रमाणपत्र वर्षा की मदद करेगा?

वर्षा को अपने बाल विवाह से छुटकारा पाना काफी मुश्किल लग रहा है। उन्होंने कहा, "जज साहब ने हमसे शादी की एक तस्वीर पेश करने को कहा, जो हमारे पास नहीं है।"

राजस्थान सरकार द्वारा हाल ही में राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 में संशोधन के बाद से, ऐसी शादियों के लिए भी अब विवाह प्रमाण पत्र जरूरी हो गया है।

जोधपुर स्थित सारथी ट्रस्ट की संस्थापक कीर्ति भारती, लड़कियों को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करके बाल विवाह को रोकने में मदद करती हैं। वह वर्षा के साथ खड़ी हैं और उसकी शादी को रद्द करने की कोशिश कर रही हैं। भारती को 2006 में पहली बार बाल विवाह को रद्द कराने का श्रेय भी दिया जाता है।

वह अब तक 43 बाल विवाह रद्द करा चुकी हैं। भारती ने गांव कनेक्शन को बताया, "वर्षा का मामला निश्चित रूप से अपनी तरह का अलग मामला है। बाल विवाह की पीड़िताएं अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं। "

यूनिसेफ के अनुसार, भारत में हर साल, 18 साल से कम उम्र की कम से कम 15 लाख लड़कियों की शादी हो जाती है। जिसकी वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा बाल वधु बाल भारत में है। इस समय देश में 15 से 19 साल की लगभग 16 प्रतिशत लड़िकयों की शादी हो चुकी है।

भारतीय विवाह अधिनियम की पृष्ठभूमि के बारे में बताते हुए, राजस्थान उच्च न्यायालय के वकील, पारीक ने कहा, "साल 1929 में पहली बार बाल विवाह का मुद्दा उठाया गया था। तब बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम या शारदा अधिनियम अस्तित्व में आया था। उस समय, चौदह साल से कम उम्र की लड़कियों और अठारह साल से कम उम्र के लड़कों की शादी को अमान्य घोषित किया गया था।"

उन्होंने आगे बताया, "फिर, 1978 में एक संशोधन किया गया जिसने लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाकर 15 से 18 साल और लड़कों की 18 से 21 साल कर दी गई। कुछ साल बाद, सरकार ने बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 पेश किया। इस कानून में बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम को निरस्त कर दिया और बाल विवाह को अमान्य घोषित कर दिया गया था।"

नए संशोधन का विरोध

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ( NCPCR) की अध्यक्ष, प्रियांक कानूनगो ने चेतावनी देते हुए कहा, "यह (17 सितंबर का संशोधन) एक अपराध को कानूनी रूप से सही ठहराना जैसा है। यह बिल लागू नहीं होना चाहिए। यह बच्चों के शोषण को बढ़ावा देगा।" वह आगे कहती हैं, "यह न केवल बाल विवाह अधिनियम बल्कि पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम और बाल न्याय किशोर अधिनियम को भी प्रभावित करेगा।" NCPCR का मुख्यालय दिल्ली में है।

कानूनगो ने गांव कनेक्शन को बताया कि NCPCR ने राजस्थान के राज्यपाल को पत्र लिखकर बिल के बारे में अवगत कराया है। बाल अधिकार आयोग ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी पत्र लिखकर कानून पर पुनर्विचार करने और समीक्षा करने को कहा है।

इस बीच, दिल्ली की कार्यकर्ता स्वाति गोयल शर्मा ने भी सुप्रीम कोर्ट में संशोधन के खिलाफ एक याचिका दायर की है। दिल्ली की एक अन्य कार्यकर्ता युक्ति राठी ने इस बारे में भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है। भाजपा युवा शाखा के प्रमुख तेजस्वी सूर्या ने भी अपनी राजस्थान इकाई से नए कानून के खिलाफ राज्य भर में विरोध प्रदर्शन करने को कहा है।


संशोधन का समर्थन करने वाले

कानून को सही ठहराते हुए इसके समर्थकों का कहना है कि इससे विधवाओं को सभी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। कानून से न केवल बाल विवाह को रद्द करने में मदद मिलेगी बल्कि पंजीकरण की संख्या से इस सामाजिक मुद्दे पर शोध भी किया जा सकेगा।

राजस्थान सरकार ने तर्क दिया है कि यह बिल सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2007 के फैसले के बाद लाया गया था, जिसमें कहा गया था कि "सभी विवाह बिना किसी धर्म के अपवाद के पंजीकृत होने चाहिए।"

हालांकि, बाल अधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने "बाल विवाह" को इसमें निर्दिष्ट नहीं किया था। क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार यह एक अपराध है। जबकि नियमित विवाह प्रथा के साथ ऐसा कुछ नहीं है।

भारती ने तर्क दिया, "सबसे पहले, इस फैसले में बाल विवाह का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया है। और अगर आपको कोई संदेह था तो इस तरह के कानून को लाने से पहले सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण मांग सकते थे। हमारा राष्ट्रीय कानून खुद इसे संज्ञेय अपराध कहता है।" .

उन्होंने सवाल किया: "सरकार बाल विवाह जैसे संज्ञेय अपराध के पंजीकरण के बारे में सोच भी कैसे सकती है। अगर बिल लागू हो जाता है, तो इस तरह की शादी को रद्द करने की प्रक्रिया और भी कठिन हो जाएगी।"

भारती के अनुसार, जाहिर तौर पर माता-पिता बाल विवाह का पंजीकरण नहीं करेंगे और एक लड़की विवाह प्रमाण पत्र की अदालत की मांग के कारण अपनी शादी को रद्द नहीं कर सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बाल विवाह एक ऐसा तरीका है जिससे माता-पिता को लगता है कि वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि लड़की की शादी जल्दी हो जाए, इसलिए शादी के बाहर गर्भधारण का कोई खतरा नहीं है।

क्या भारत में 2030 तक बाल विवाह होने बंद हो जाएंगे?

लोग जानते हैं कि यह एक अपराध है उसके बावजूद बाल विवाह हो रहे हैं। 'विकल्प' संस्थान के सह-संस्थापक योगेश वैष्णव के अनुसार, यह एक ऐसा तरीका है जिससे माता-पिता को लगता है कि अगर वे अपनी लड़कियो की शादी जल्दी कर देंगे तो अंतर्जातीय विवाह या शादी से पहले संबंध या गर्भावस्था जैसी कोई समस्या उनके सामने नहीं आएगी।" 'विकल्प' लिंग आधारित भेदभाव और हिंसा को समाप्त करने की दिशा में काम करने वाले कार्यकर्ताओं एक सामाजिक संगठन है।

कार्यकर्ताओं ने बताया कि शिक्षा की कमी और क्षेत्र में सरकार की विफलता के कारण बाल विवाह के मामलों में तेजी आई है।

2011 की जनगणना के अनुसार, राजस्थान की साक्षरता दर 66.11 प्रतिशत थी। राजस्थान देश में तीसरा ऐसा राज्य रहा जिसकी साक्षरता दर सबसे कम थी। यहां पुरुष साक्षरता दर 79.9 प्रतिशत थी, वहीं महिला साक्षरता दर 52.12 प्रतिशत थी। जो पुरुषों के मुकाबले बमुश्किल आधे से अधिक थी।

बीकानेर के एक सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार ने गांव कनेक्शन को बताया, "महामारी के दौरान बेरोजगारी के चलते बाल विवाह की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। कोविड प्रोटोकॉल के कारण बड़े समारोहों की अनुमति नहीं थी, परिवारों का लगा कि यह पैसे बचाने और अपने 'बोझ' से छुटकारा पाने का एक अच्छा तरीका है।"

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, मई 2020 से अक्टूबर 2020 के बीच राजस्थान की बेरोजगारी की दर बढ़ गई थी। उनकी नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, इस साल सितंबर के पहले सप्ताह में, भारत में दूसरी सबसे अधिक बेरोजगारी दर राजस्थान की रही।

वैष्णव ने कहा, "कोविड प्रतिबंधों के कारण लड़कियां घर पर थी और महामारी के दौरान गौना भी बड़ी संख्या में हुआ।"

इन परिस्थितियों में, क्या भारत 2030 तक बाल विवाह प्रथा को समाप्त कर सकता है, जो संयुक्त राष्ट्र में देश द्वारा अपनाए गए सतत विकास लक्ष्यों में से एक है?

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अनुवाद : संघप्रिया मौर्या

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