आरटीआई की हकीकत : विपक्ष में लुभाए पर सरकार में फूटी आंख न भाए

यूपीए सरकार ने आरटीआई कानून को लागू तो किया पर कमजोर करने के प्रयासों में भी कमी नहीं की, विपक्ष में भाजपा ने आईटी सेल तक बनाया लेकिन सत्ता में आने पर संशोधन बिल लेकर आई

आरटीआई की हकीकत : विपक्ष में लुभाए पर सरकार में फूटी आंख न भाए

लखनऊ। विपक्ष में रहते हुए भले ही हर पार्टी को सूचना का अधिकार कानून सुहाता रहा है, लेकिन वही राजनैतिक पार्टी जब सरकार में आती है तो यह कानून फूटी आंख नहीं भाता। मोदी सरकार द्वारा आरटीआई कानून में संशोधन के लिए बिल लाए जाने पर छिड़ी बहस के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरटीआई को बचाने की भले ही सोशल मीडिया पर गुहार की है, लेकिन इस कानून को कमजोर बनाने में कांग्रेस की अगुआई में बनी यूपीए सरकार ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। यह विडंबना ही है कि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में जिस आरटीआई को शामिल किया, उसकी अगुआ में यूपीए-1 की सरकार इस कानून को अमल में लाई, लेकिन उसी यूपीए सरकार ने इसे कमजोर करने के लिए कई संशोधन बिल भी पेश किए।



"वर्ष 2006 में सरकार ने फाइल पर नोटिंग की जानकारी न देने से संबंधित एक संशोधन बिल यूपीए सरकार लाई, लेकिन पब्लिक ने एकजुट होकर जब विरोध किया तो सरकार को पीछे हटना पड़ा," भारत के पहले मुख्य सूचना आयक्त वजाहत हबीबुल्ला ने कहा, "यूपीए सरकार ने इसे लागू तो किया लेकिन इसे और शक्तिशाली बनाने का प्रयास नहीं किया। लगातार इसे कमजोर करने के प्रयत्न होते रहे।"

जून 2013 को केन्द्रीय सूचना आयोग ने कहा कि छह राष्ट्रीय पार्टियां (भाजपा, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीआई-एम, बसपा और एनसीपी) आरटीआई के दायरे में आती हैं। इसके विरोध में सभी राजनैतिक पार्टियां एक हो गईं, और मात्र दो महीने बाद 12 अगस्त, 2013 को मनमोहन सरकार राजनैतिक पार्टियों को आरटीआई से बाहर रखने के लिए संशोधन बिल लेकर आ गई। इस बिल को स्टैंडिंग कमेटी में भी भेजा गया।

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"जब पार्टियां विरोध में होती हैं तो आरटीआई को हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं, वहीं सत्ता में आने के बाद इसे कमजोर करने का पूरी कोशिश रहती है," गांव कनेक्शन से फोन पर आरटीआई कैंपेनर अम्रता जौहरी ने कहा, "यूपीए सरकार ने आरटीआई को कमजोर करने की कोशिश तो की लेकिन नियम कानून का पालन किया, लेकिन एनडीए सरकार ने तो कानून को ताक पर रख दिया है।"

आगे अम्रता जौहरी ने बताया, "बीजेपी जब विपक्ष में थी तो उसका एक आरटीआई सेल होता था, और पार्टी आरटीआई का सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करती थी। लेकिन आज वहीं पार्टी जब सत्ता में है तो आज अलग भाषा बोल रही है।"

अभी सरकार ने सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, वेतन और कार्यकाल के निर्धारण का अधिकार अपने पास रखने के लिए एक आरटीआई कानून में संशोधन के लिए एक बिल मानसून सत्र में पेश किया है। जिसे लेकर सिविल सोसाइटी के लोगों ने विरोध शुरू कर दिया है।

"इस संशोधन से आरटीआई कानून कमजोर ही नहीं होगा, इसे खत्म कर देगा। सूचना आयोग अन्य सरकारी दफ्तरों की तरह ही हो जाएंगे," वजाहत हबीबुल्लाह ने कहा।

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इस मौजूदा संशोधन बिल के विरोध में आरटीआई एक्टिविस्ट एकजुट होकर सरकार पर इसे वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। "अभी हम लोगों ने पांच पार्टियों से बात की तो उन्होंने समर्थन देने की बात कही है, बीजेपी से भी बात करने की कोशिश की पर कोई नहीं आया। साथ ही सरकार से कई बार बात करने की कोशिश की पर कोई जवाब नहीं आया," अम्रता जौहरी ने बताया।

वर्ष 2006 में सरकार ने फाइल पर नोटिंग की जानकारी न देने से संबंधित एक संशोधन बिल यूपीए सरकार लाई, लेकिन पब्लिक ने एकजुट होकर जब विरोध किया तो सरकार को पीछे हटना पड़ा। सरकार ने इसे लागू तो किया लेकिन इसे और शक्तिशाली बनाने का प्रयास नहीं किया। लगातार कमजोर करने के प्रयत्न होते रहे।

-वजाहत हबीबुल्लाह, भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त

जब पार्टियां विरोध में होती हैं तो आरटीआई को हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं, वहीं सत्ता में आने के बाद इसे कमजोर करने का पूरी कोशिश रहती है।

अम्रता सिरोही, नेशनल आरटीआई कैंपेनर

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