नई फसल आने पर उत्तरकाशी में मनाया जाता है 'सेलकु मेला' का उत्सव

रोबिन सिंह चौहान, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

उत्तरकाशी (उत्तराखंड)। इन दिनों यहां पर हर एक गाँव में सेलकु मेला मनाया जाता है, इस त्योहार में लोग अपनी पहली फसल सोमेश्वर देवता को अर्पित करते हैं।

उत्तरखंड के उत्तरकाशी जिले में दो दिनों तक मनाए जाने वाले सेलकु त्योहार के समय हर बेटी अपने मायके आ जाती है। इस त्योहार के मनाए जाने के पीछे कई मान्यताएं हैं।

सोमेश्वर मंदिर के पुजारी बताते हैं, "रात में मशाल जलाकर इस त्योहार की शुरुआत की जाती है, दूसरे दिन दोपहर में देव पूजा की जाती है, एक डेढ़ घंटे की पूजा होती है। इसमें फसलों की पूजा भी की जाती है, इस समय राजमा, आलू और सेब जैसी फसलें निकलती हैं वो भी देवता को चढ़ायी जाती है। पूरे जिले में पहले लोग अपने-अपने जिले में सेलकु मनाते हैं, उसके बाद सबसे आखिर में यहां पर आते हैं, सोमेश्वर देवता सब से आखिरी स्टाप होता है। आजकल ही हमारे यहां चीड़ा निकलता है, जिसका प्रसाद बनता है जो देवता को चढ़ाया जाता है।


वो आगे बताते हैं, "सोमेश्वर देवता की डोली निकलती है, जिसके अंदर सोमेश्वर देवता की मूर्ति रखी जाती है, जिसे दो लोग लेकर चलते हैं, लोगों के मन में जो सवाल होते हैं। लोग डोली से पूछते हैं और ये जवाब भी देते हैं।"

कहा जाता है इस दिन इलाके के लोगों ने तिब्बत के आक्रमणकारियों को जरिया था और उसी के जश्न मनाया जाता है। इसके अलावा एक अंग्रेज विल्सन का किस्सा भी यहां से जुड़ा है, जिसे यहां के लोग चाव से सुनाते हैं। हिमालय का राजा माने जाने वाले सोमेश्वर देवता का अंतिम आसन मां गंगा के मायके मुखबा आखिरी पड़ाव होता है।देवता का पश्वा अवतरित होता है और उसके बाद डांगरियों पर देवता का आसन लगता है। साथ ही देवता को भेंट चढ़ाने आई बहनों की मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद देते हैं।

यहां के स्थानीय निवासी विल्सन का किस्सा बताते हैं, "साल 1864 में विल्सन यहां पर आए थे, जो ईस्ट इंडिया कंपनी में सर्विस करते थे। उन्हें टीबी हो गई थी तो डॉक्टर ने कहा कि आप ऐसी जगह जाइए जहां पर देवदार के पेड़ हो। वो पहले मसूरी गए फिर गंगोत्री यात्रा की उसके बाद हर्षिल आए और यहां पर एक बंगला बनाया। वो जब यहां आए तो सेलकु देखने आए तो यहां पर जिनके ऊपर देवता आता है, वो फरसे के ऊपर चलते हैं। जब हमारे बुजुर्ग उनके पास गए तो उनसे पूछा कि आपने हमारे देवता को चलते देखा तो विल्सन ने कहा कि देखा तो लेकिन फरसे में धार हीं थी, हमारे पास एक तलवार है अगर उस पर चलकर दिखाएं तो मानूंगा। तो वहां पर देवदत्त जी के ऊपर देवता आ गए और विल्सन से कहा कि मैं तलवार पर चलकर दिखाता हूं और चलकर भी दिखाया। ये देखकर विल्सन उसी दिन से देवता का भक्त हो गया।"


स्थानीय लोकगायक रजनीकांत सेमवाल कहते हैं, "ये जो कार्यक्रम शुरू होता है ये रात से ही शुरू हो जाता है, जिसमें कई गाँव के लोग मशाल जलाते हैं। दूसरा दिन देव पूजन का दिन होता है, सोमेश्वर देवता की डोली जाती है, उसी दिन दूर-दूर से ध्यानियां आती हैं, वो बीच में बैठती हैं उनके चारों ओर डोली घुमायी जाती है, और जो भी सवाल होते हैं वो अपने देवता से पूछती हैं।"

कहा जाता है इस समय ये देवता गाँव के किसी व्यक्ति पर अवतरित होता है। पूजा के लिए सभी गांव के लोग अपने अपने घरों से फरसे लेकर आते है। इसे स्थानीय भाषा में डांगरी कहा जाता है। और इसे पवित्र मन जाता है। इसे देवता के आगे रखा जाता है। इसके बाद देवता जिस स्थानीय पर अवतरित होता है वो इन फरसों की धार पर पैदल चलता है।और लोगों को अपना आशीर्वाद देता है। इस समय सोमेश्वर देवता की स्तुति में कफूआ गया जाता है ।लोक गायक रजनी कांत सेमवाल बताते हैं कि ये गीत सोमेश्वर देवता की यात्रा को बताता है।

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