सरकारों को नहीं पता- किसान किस 'कारण' से करते हैं आत्महत्या?

जिस देश में रोजाना 31 किसान आत्महत्या करते हैंं, वहां कि सरकारों को नहीं पता Farmers' suicides के कारण क्या हैं? राज्यसभा में ये सवाल पूछा गया, जिसका जवाब ये मिला...

Arvind ShuklaArvind Shukla   9 Dec 2019 8:00 AM GMT

सरकारों को नहीं पता- किसान किस

नई दिल्ली/लखनऊ। भारत में रोजाना 31 किसान आत्महत्या कर रहे हैं, महीने में ये आंकड़ा 948 का है। लेकिन सरकारें नहीं जानती कि इतने बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्या किस वजह से कर रहे हैं। राज्यसभा में कई सांसदों ने सरकार ने इस संबंध में सवाल पूछा कि किसानों की आत्महत्या की वजह क्या है ? लेकिन सरकार वाजिब कारण नहीं बता पाई।

संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में तीन सांसदों ने किसानों के आत्महत्या की वजह, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में आई कमी की वजह और इन आत्महत्याओं को रोकने के लिए सरकार के पास क्या योजना है, इस संबंध में सवाल पूछे।

राज्यसभा में कांग्रेस सांसद हुसैन दलवाई ने गृहमंत्री से लिखित सवाल (अतरांकित प्रश्न संख्या-1028) में पूछा कि एनसीआरबी द्वारा अपनी पिछली रिपोर्ट (2016) में किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के कारणों को शामिल नहीं किया गया, जबकि इससे पहले की रिपोर्ट में कृषि संकट, फसल नुकसान, कर्ज़, पारिवारिक समस्याएं और बीमारी आदि शामिल क्या जाता था, इसके क्या कारण हैं ?

एनसीआरबी की 2016 के रिपोर्ट के मुताबिक देश में रोजाना 31 किसान और खेतिहर मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं।

हुसैन दलवाई के प्रश्न के उत्तर में गृह मंत्रालय में राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने सदन को बताया, "एनसीआरबी ने सरकार को सूचित किया है कि राज्य और संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा इस संबंध में जानकारी नहीं दी और पेशों (अलग-अलग वर्ग) की आत्महत्या की सूचना देते वक्त किसान और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या पर 'शून्य' आंकड़े बताए। इस बाध्यता के कारण किसान की आत्महत्या के कारण अपुष्ट हैं। इसलिए इन्हें अलग से प्रकाशित किया नहीं गया।"

सरकार का सरल शब्दों में कहना ये है कि राज्यों ने ही किसानों की मौत के कारण नहीं बताए। हुसैन दलवाई महाराष्ट्र से कांग्रेस सांसद हैं और महाराष्ट्र को किसान नेता और कृषि जानकार किसानों की कब्रगाह कह रहे हैं।

भारत में किसी तरह के अपराध को राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा प्रति वर्ष जारी करने की परपंरा रही है। लेकिन 2015 के बाद ये आंकड़ें देरी से जारी हुए। 21 अक्टूबर को 3 साल बाद 2016 की रिपोर्ट जारी हुई, जबकि 2017,18 और 19 के संबंध में कोई रिपोर्ट नहीं प्रकाशित नहीं की गई है।

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एनसीआरबी की हालिया (21 अक्टूबर 2019) जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में 11,379 किसानों और खेतिहर मजूदरों ने खुदकुशी की। ये आंकड़ा एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट एक्सिडेंटल डेथ एंड सुसाइड 2016 नाम से जारी किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर महीने 948 किसान, यानि हर दिन 31 किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

इससे पहले 2015 में रिपोर्ट आई थी जिसके मुताबिक 12602 किसान और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2014 में 12,360 ने कृषि संकट के चलते आत्महत्या की थी। इससे पहले 2012 में 13,754 और 2013 में 11,772 किसान और कृषि से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की थी।

किसान, जमींदार, शेतकरी, अन्नदाता कहे जाने वाले कृषि पेशे से जुड़े लोगों की आत्महत्या का सिलसिला वर्ष 1990 से चला और 1995 से एनसीआरबी ने इन्हें अलग से रिपोर्ट करना शुरू किया था साथ ही कारण भी दिए जाते थे, लेकिन 2016 में किसानों की देश में सभी तरह के पेशों की आत्महत्या वाले सेक्शन में शामिल कर दिया गया।

वर्ष 2015 और 2016 की किसान आत्महत्याओं के बीच मामूली कमी दर्ज की गई है। जिसके मुताबिक पूरे साल में 1223 किसानों की जान कम गई। वर्ष 2015 में औसतन 33 किसान रोज आत्महत्या कर रहे थे, जबकि 2016 में ये आंकड़ा 31 का है। लेकिन कृषि जानकारों के मुताबिक इसी बीच महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में किसान आत्महत्या दर्ज़ करने के लिए नियमों बदलाव किया गया है।

ओडिशा से बीजू जनता दल से राज्यसभा में सांसद अमर पटनायक ने सरकार से सवाल (प्रश्न संख्या 1004) किया कि एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में आई किसान आत्महत्याओं की कमी के कारणों की पहचान की गई है ?

बीजू जनता दल से राज्यसभा में सांसद अमर पटनायक द्वारा पूछा गया सवाल और उसका जवाब।

इस सवाल के जवाब में भी गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने वही जवाब दिया। वर्ष दर वर्ष दुर्घटना और आत्महत्या के कारणों में परिवर्तन होने के कारण आंकड़े नहीं रखे जाते। राज्यसभा सांसद पटनायन ने भी पूछा था कि आत्महत्या के कारण क्यों नहीं प्रकाशित किए गए, इसका भी जवाब राज्य और केंद्र शाषित राज्यों से आंकड़े नहीं होना बताया गया।


महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या को लेकर लगातार आरटीआई लगाने वाले शकील रिजवी ने पिछले दिनों गांव कनेक्शन से हुई बात में कहा था, "किसान की आत्महत्या के बाद सरकार कुछ एक लाख रुपए देती है जिसमें 30 हजार नकद और बाकी बैंक में जाते हैं। पहले महाराष्ट्र में तहसीलदार और स्थानीय अधिकारियों की रिपोर्ट पर ये पैसे मिल जाते थे, लेकिन अब नियम बदले हैं। सरकार शायद वो पैसा भी बचाना चाहती है।"

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राज्यसभा में 27 नवंबर को ही तमिलनाडु से डीएमके सांसाद तिरुचि शिवा ने सवाल का जवाब दिया गया जिसमें उन्होंने पूछा था कि 2017 के आंकड़े जारी करने में विलंब क्यों हुआ ? वर्ष 2018 और 2019 की किसान आत्महत्या की रिपोर्ट कब तक जारी की जाएगी ? साथ ही वर्ष 2016 से 2019 के बीच कितने किसानों के आत्महत्या की है ?

जिसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डे ने राज्यसभा को बताया कि एनसीआरबी राज्यों से अपराध संबंधी आंकड़े एकत्र करता है और इन्हें क्राइम इन इंडिया (crime in india) में प्रकाशित करता है। वर्ष 2017 की रिपोर्ट में कई सुधार किए गए थे ताकि इसे स्टेकहोल्डरों के लिए अधिक व्यापक, सूचनाप्रद और उपयोगी बनाया जा सके। इसके लिए आंकड़ों के संग्रह और संकलन के साफ्टवेयर में भी बदलवा किया गया।

उन्होंने आगे बताया कि अधिकारियों को प्रशिक्षित करना था ताकि अस्पष्टता दूर की जा सके। इन आंकड़ों को एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया (ADSI) में प्रकाशित करता है। आखिरी रिपोर्ट 2016 की थी, जिसके मुताबिक देश में कुल 6270 (इसमें कृषि मजदूर शामिल नहीं) किसानों/खेतिहरों ने आत्महत्या की।

पिछले 3 दशकों से कृषि, खाद्य और निर्यात नीति पर लगातार लिख रहे, देविंदर शर्मा कहते हैं, रिपोर्ट में देरी की वजह ये है कि किसान की मौत राष्ट्रीय बहस ही न बनें, इतने अंतराल पर आने वाली रिपोर्ट से धीरे-धीरे ये चर्चा खत्म हो जाएगी।

महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद हुसैन दलवाई ने सरकार से ये भी सवाल किया था कि महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं ये संख्या कम करने के लिए सरकार की क्या योजना है, जिसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने कहा कि कृषि राज्य का विषय होने के नारे सरकारें, कार्यक्रमों/स्कीमों के प्रभावी कार्यान्यवन को सुनिश्चित करने के लिए भावी योजनाएं बनाती हैं।


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