पहले विश्व युद्ध में हथियार की तरह इस्तेमाल की गई ये बीमारी, आज भी घोड़ों-गधों की ले रही जान

Diti BajpaiDiti Bajpai   22 Oct 2019 1:58 PM GMT

पुराने जमाने के युद्ध में न सिर्फ घोड़े हाथियों पर लड़े जाते थे, बल्कि कई बार इनका इस्तेमाल हथियार की तरह भी किया जाता था। पहले विश्व युद्ध में दुश्मनों को हराने के लिए घोड़ों और गधों में होने वाली ग्लैंडर्स बीमारी को जैविक हथियार बनाया गया। इस बीमारी के जीवाणुओं को इन्हीं पशुओं के जरिए दुश्मनों के खेमे में भेजा जाता था।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई देशों ने इस बीमारी पर रोकथाम कर ली, लेकिन भारत में आज भी ये बीमारी सैकड़ों घोड़ों, खच्चरों और गधों की जान लेती है। इस लाइलाज बीमारी से ग्रसित पशु की मौत तो होती है, उसके संपर्क में आने वाले इंसानों की भी मौत हो सकती है। संक्रमण से बचाने के लिए कई बार इस बीमारी से ग्रसित पशु का पता चलते ही पशु को मार दिया जाता है।

केंद्रीय मत्स्य, डेयरी एवं पशुपालन विभाग में पशुपालन आयुक्त डा. प्रवीण मलिक ने अपने शोध पत्र में युद्धों में इन पशुओं को जैविक हथियार के रुप में इस्तेमाल किए जाने पर विस्तार से लिखा है। कैसे जर्मन एजेंट ने ईस्टर्न फ्रंट रसियन घोड़ों गधों पर इसका उपयोग किया था।


'ग्लैंडर्स' एक जुनोटिक बीमारी है। यह ज्यादातर घोड़े, गधों और खच्चरों में होती है। इस बीमारी से पीडि़त पशु को मारना ही पड़ता है। अगर कोई पशुपालक इस बीमारी से ग्रसित पशु के संपर्क में आता है तो यह मनुष्यों में भी फैल जाती है। लाइलाज होने के कारण इस बीमारी से ग्रसित पशु को यूथेनेशिया दिया जाता है, जिसके बाद पशु गहरी नींद में चला जाता है और लगभग दस मिनट में नींद के दौरान ही उसकी दर्दरहित मौत हो जाती है।

भारत में इस बीमारी का केस जुलाई वर्ष 2006 में महाराष्ट्र में मिला था इसमें 20 घोड़े और 3 टट्टू के पॉजिटिव सैंपल मिले थे। उसके बाद दिसम्बर वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश में 70 पॉजिटिव सैंपल मिले थे इसमें घोड़ों की संख्या 40, टट्टू 8, गधे 16 और 6 खच्चर थे। इसके फरवरी 2007 में पंजाब, मार्च 2007 में उत्तराखंड, सितंबर 2007 में आंध्र प्रदेश में हुआ। उसके बाद अक्टूबर वर्ष 2009 में छत्तीगढ़ के साथ उत्तर प्रदेश में वर्ष 2010 से 2011 तक लगातार केस आते रहे।

देश में हर छह साल पर जारी होने वाली पशुगणना के अनुसार देश में घोड़ों, गधों और खच्चरों की संख्या तेजी से कम हुई है। 20वीं पशुगणना के अनुसार पिछले सात साल (2012-19) में इनकी संख्या में 6 लाख की कमी दर्ज की गई है। बढ़ते मशीनीकरण, आधुनिक वाहन और ईट-भट्ठों में काम न मिलने की वजह से लोगों ने इन्हें पालना कम कर दिया है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में गधे की संख्या इसलिए घट रही है क्योंकि चीन में गधों की खाल की मांग तेजी से बढ़ रही है। उनका कहना हैं कि चीन में उम्र कम करने और सेक्स वर्धक दवाओं के रुप में पारंपारिक दवा बनाने में इनका प्रयोग किया जाता है। पशुगणना 2019 में के मुताबिक देश में 5 लाख 40 हज़ार अश्व (घोड़े, टट्टू,गधे और खच्चर) हैं, जिनकी संख्या पशुगणना 2012 में 11 लाख 40 हजार थी। यानि पिछले सात साल में इनकी संख्या में 51.9 फीसदी की गिरावट आई है, जो कि संख्या में 6 लाख है।

वर्ष 2011 में प्रकाशिक जर्नल ऑफ बॉयोटेरिरज्म एंड बॉयोडिफेंस के अनुसार, प्रथम विश्व युद्व में कई तरह की बीमारियों का उपयोग शत्रु सेना में बीमारी फैलाने के लिए हथियार के रुप में करते थे। एन्थ्रेस,प्लेग, ग्लैंडर्स से पीड़ित लोगों और जानवरों को शत्रु सेना में भेज दिया जाता था। बैक्टीरियल संक्रमण होने के कारण यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती थी। 'ग्लैंडर्स' बीमारी की पुष्टि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की गई थी।


इस बीमारी से घोड़े, गधे और खच्चरों को बचाने के लिए ब्रुक इंडिया संस्था पिछले कई वर्षों से काम कर रही है। इस संस्था के पशुचिकित्सक अधिकारी डॉ मनीष राय बताते हैं, "घोड़े, गधे और खच्चरों में होने वाली यह बीमारी बहुत पुरानी है। विश्व युद्व को जीतने के लिए इसके जीवाणु का इस्तेमाल किया जाता था।"

डॉ मनीष आगे बताते हैं, "आप सभी को पता है कि युद्ध घोड़ों के द्वारा लड़े जाते थे तो कुछ देशों ने इस जीवाणु का इस्तेमाल किया जो दूसरी देश के आर्मी वाले थे उनके घोड़ों में यह जीवाणु उन्होंने इंजेक्शन के द्वारा डाल दिए जिसकी वजह से उनके पास जब यह घोड़े गए तो इससे लोग भी मरने लगे।"

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'ग्लैंडर्स' बीमारी से ग्रसित पशु के संपर्क में आने पर यह बीमारी इंसानों में भी फैल जाती है। पशु में इस बीमारी के लक्षणों के बारे में डॉ राय बताते हैं, "यह बीमारी जानवरों से इंसानों में फैलती है इसलिए इसको जूनोटिक कहा जाता है। इस बीमारी में घोड़े, गधे और खच्चर में अलग-अलग तरह से लक्षण दिखाई देते है। घोड़े में यह बीमारी त्वचा में गांठ के रुप में दिखाई पड़ती है। गधे और खच्चरों में सांस की बीमारी में आता है। सांस लेने में दिक्कत होती है उनके नाक के अंदर त्वचा में छोले पड़ जाते है जब वो फूटते है तो उनसे खून आने लगता है।"


इस बीमारी से गधे और खच्चरों की एक हफ्ते से 10 दिन के अंदर मौत हो जाती है लेकिन घोड़े इस बीमारी में कई महीनों तक जिंदा रह सकते हैं। घोड़े की त्वचा में गांठ पड़ जाती है इनपर जब एंटीबायोटिक का इस्तेमाल किया जाता है तो वो जीवाणु अपने लक्षण कम कर देता है, जिससे लगता है कि जानवर ठीक हो गया लेकिन जैसे ही आप इलाज बंद करेंगे उसके 15 दिन बाद फिर वो लक्षण दिखाई देने लगते है। ऐसे में इस बीमारी से ग्रसित घोड़े कई महीनों तक जीवित रह लेते है।

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द्वितीय विश्व युद्ध में पुष्टि होने के बाद अंग्रेजों ने इस बीमारी को गंभीरता से लिया और वर्ष 1899 में ग्लैंडर्स एंड फारसी एक्ट बनाया। इस एक्ट के तहत यह प्रावधान रखा गया था कि जिस जानवर में यह बीमारी पाई जाएगी उसको दया मुत्यु देने के बाद 50 रुपए उसके मालिक को मुआवजे के रुप में दिया जाएगा। यह प्रावधान काफी लंबे अरसे तक चला। वर्ष 2016- 2017 में केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने इस बीमारी को रोकने के लिए एक्शन प्लान जारी किया।

पशुपालन विभाग उत्तर प्रदेश में संयुक्त निदेशक डॉ शरद अग्रवाल ने बताया, "दया मुत्यु देने के बाद पशु मालिकों की राशि बढ़ाने पर संस्थाओं ने जोर दिया जिसके बाद आपदा प्रबंधन में जो पशुओं की राशि दी गई थी उसके अनुसार अगर कोई भी घोड़ा, गधा और खच्चर को दया मृत्यु दी जाती है तो उसके पशु मालिक को मुआवजा दिया जाता है। घोड़े के मरने पर 25000 रूपए और गधों, खच्चर के मरने पर 16000 रूपए की धनराशि दी जाती है। इसमें 50 प्रतिशत भारत सरकार और 50 प्रतिशत राज्य सरकार देती है।"


अपनी बात को जारी रखते हुए डॉ अग्रवाल आगे कहते है, "वर्ष 2017-18 में 249, 2018-19 में 229 और वर्ष 2019-20 में 85 ग्लैंडर्स बीमारी के पॉजिटिव केस मिले हैं। देश में इस बीमारी को खत्म करने के लिए पूरा एक्शन प्लान भी तैयार किया गया है। इस प्लान के तहत समय-समय पर घोड़े, गधे और खच्चरों के रक्त के नमूने लेकर राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में भेजा जाता है। जहां पुष्टि होने पर इनको दया मृत्यु दी जाती है। केस ज्यादा मिलने से यूपी के गोरखपुर, आगरा, लखनऊ में जल्द ही लैब खोली जाएगी। ताकि सैंपलों की पुष्टि और जल्दी हो सके।


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