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जयपुर : 'सुना कि लोग दशहरा नहीं मनाएंगे, मेला नहीं लगेगा लेकिन हमने रावण के पुतले बनाए हैं, अब आगे भगवान की मर्जी'

नवरात्रि के लिए मूर्ति और रावण दहन के लिए पुतला बनाने वाले कारीगर काम पर जुट गए हैं, लेकिन इस साल न ही जयपुर में न तो दशहरा मेला लगेगा और न ही मैदानों में 100-100 फीट के पुतले लहराएंगे।

Avdhesh PareekAvdhesh Pareek   21 Oct 2020 7:16 AM GMT

जयपुर : सुना कि लोग दशहरा नहीं मनाएंगे, मेला नहीं लगेगा लेकिन हमने रावण के पुतले बनाए हैं, अब आगे भगवान की मर्जीकोरोना महामारी के बीच अक्टूबर में पड़ने वाले दो बड़े त्यौहार नवरात्रि और दशहरे को लेकर इससे जुड़े कारीगर वर्ग अपने काम में जुटे हैं। फोटो : अवधेश पारिक

(जयपुर से अवधेश पारीक और इकबाल खान की रिपोर्ट)

पिछले छह महीने से जारी कोरोना महामारी के बीच अब त्योहारों का मौसम आने को तैयार है। कोरोना काल में चौपट हो चुके बाजार की मायूसी भी कुछ हद तक छटने की उम्मीद है। जहां एक तरफ दीपावली को लेकर बाजार में उत्साह है, दूसरी तरफ अक्टूबर महीने में पड़ने वाले दो बड़े दिन नवरात्रि और दशहरे को लेकर इससे जुड़े कारीगर वर्ग की रुकी गाड़ी के धक्का लगने की उम्मीद है।

नवरात्रि के लिए मूर्ति और रावण दहन के लिए पुतला बनाने वाले कारीगर काम पर जुट गए हैं, लेकिन इस साल न ही मानसरोवर का प्रसिद्ध दशहरा मेला भरेगा और न ही मैदानों में 100-100 फीट के पुतले लहराएंगे। ऐसे में इस साल अभी तक कारीगरों के चेहरे नाउम्मीदी की लकीरों से पटे पड़े हैं।

दरअसल कोरोना महामारी और राजस्थान सरकार द्वारा जयपुर में 31 अक्टूबर तक लगाई गई धारा 144 की वजह से राजधानी जयपुर में 1947 के बाद से यह पहली बार होगा जब दशहरे पर रावण दहन और मेले का आयोजन नहीं होगा, वहीं जयपुर शहर में सामूहिक नवरात्रि पूजा और 10 दिनों तक चलने वाले छोटे-बड़े सभी भीड़-भाड़ वाले कार्यक्रम भी जिनमें न्यू गेट स्थित रामलीला मैदान रामलीला, आदर्श नगर दशहरा मैदान कार्यक्रम, जवाहर नगर रामलीला मैदान में रामलीला जैसे बड़े आयोजन शामिल हैं, रद्द हो गए हैं।

श्री राम मंदिर प्रन्यास आदर्श नगर की तरफ से जयपुर के आदर्श नगर दशहरा मैदान में 65 साल से रामलीला होती रही है, लेकिन इस बार वहां सन्नाटा पसरा रहेगा।

'गांव कनेक्शन' ने शहर के कई इलाकों के मूर्तिकारों और रावण पुतला बनाने वाले कारीगरों से बात कर जाना कि आखिर इस साल सड़क किनारे सजने वाले बाजारों में वो ग्राहकों की कैसी चहल-पहल देख रहे हैं और कारीगर किस तरह की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

नवरात्रि पूजा के लिए माँ दुर्गा की मूर्ति को अंतिम रूप देता एक कारीगर।

पिछली साल आफत की बारिश और इस बार कोरोना

जयपुर में पिछले साल दशहरे के कुछ रोज पहले आई आफत की बारिश के घाव रावण के पुतले बनाने वाले कारीगरों के अभी भरे नहीं कि वो इस साल अनदेखी आफत के बीच सड़क किनारे ग्राहकों की आस लगाए बैठे हैं।

गुजरात में अहमदाबाद के एक गांव से आए अभय कुमार ने जयपुर में न्यू आतिश मार्केट मेट्रो के पुल नीचे सड़क किनारे सैकड़ों की तादाद में रावण के पुतले बनाकर खड़े कर दिए हैं।

अभय बताते हैं, "हमने 20-25 हजार रुपये डालकर यहां पुतले खड़े तो कर दिए लेकिन अभी तक कोई खरीदार आया नहीं है, हां कुछ लोग दशहरे के दिन खरीदने का बोल कर गए हैं।"

हमने 20-25 हजार रुपये डालकर यहां पुतले खड़े तो कर दिए लेकिन अभी तक कोई खरीदार आया नहीं है, हां कुछ लोग दशहरे के दिन खरीदने का बोल कर गए हैं। यहां आकर सुना कि लोग इस बार दशहरा नहीं मनाएंगे, मेला नहीं लगेगा लेकिन हमने तो मेहनत कर ली, अब आगे सब भगवान की मर्जी है।

अभय कुमार, कारीगर

पिछले पांच साल से अभय अपने परिवार के पास दशहरे से 15-20 दिन पहले जयपुर रावण के पुतले बनाकर बेचने आते हैं। वह कहते हैं, "यहां आकर सुना कि लोग इस बार दशहरा नहीं मनाएंगे, मेला नहीं लगेगा लेकिन हमनें तो मेहनत कर ली, अब आगे सब भगवान की मर्जी है।"

एक अनुमान के मुताबिक गुलाबी नगरी जयपुर में दशहरे पर छोटे-बड़े मिलाकर करीब 13 हजार रावण के पुतले तैयार होते हैं। शहर में हर साल मानसरोवर की रावण मंडी के अलावा आदर्श नगर, शास्त्री नगर, प्रताप नगर, अग्रवाल फार्म, चौमू पुलिया, विद्याधर नगर, डीसीएम, तारों की कूंट जैसे कई इलाकों में सजने वाली रावण मंडी में ढाई फीट से लेकर 110 फीट तक के पुतले मिल जाते हैं।

जयपुर में मानसरोवर मेट्रो स्टेशन के पास लगने वाली प्रसिद्ध रावण मंडी में करीब 150 परिवार हर साल पुतले बनाने के काम में तीन महीने पहले ही जुट जाते हैं।

वहीं शहर में मानसरोवर मेट्रो स्टेशन के पास लगने वाली प्रसिद्ध रावण मंडी में करीब 150 परिवार हर साल पुतले बनाने के काम में तीन महीने पहले जुट जाते हैं लेकिन इस बार यहां नजारा एकदम उलट है।

रावण मंडी में इस बार रावण के 50 फीट या उससे ऊंचे रावण के पुतले नदारद हैं बाकी जो है वह महज 5-10 फीट के हैं। इस रावण मंडी में सांचौर, गुजरात, बीकानेर, जोधपुर, बंगाल के कई इलाकों से कारीगर पुतले बनाने आते हैं लेकिन इस बार सभी नदारद हैं।

कुछ कारीगरों के मुताबिक आमतौर पर 800 से 900 रुपए की कीमत पर बिकने वाले एक ढाई फीट का पुतले में हमारी 200 रुपए तक की मजदूरी निकल जाती है लेकिन इस बार तो हम सिर्फ लागत मिल जाए, वही काफी है क्योंकि अमूमन दशहरे के 2-3 दिन पहले पुतलों को लेने के लिए लोग निकलते हैं।

हमने सभी कारीगरों की तरफ से कोरोना काल में दशहरे को लेकर उपजे हालातों पर राजस्थान सरकार से मदद की गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक कोई सहायता नहीं मिली है।

जगदीश नाथ परमार, अध्यक्ष, रावण मंडी

रावण मंडी के अध्यक्ष जगदीश नाथ परमार बताते हैं, "हमने सभी कारीगरों की तरफ से कोरोना काल में दशहरे को लेकर उपजे हालातों पर राजस्थान सरकार से मदद की गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक कोई सहायता नहीं मिली है।"

परमार ने यह भी बताया कि कुछ कारीगरों को समाज के लोगों की तरफ से हमने 500-600 रुपये की मदद दिलवायी गई है लेकिन बिना सरकार के मदद के इस बार पुतले बनाने वाले कारीगरों की हालत खराब हो जाएगी।

जयपुर की रावण मंडी में पुतला तैयार करता एक कारीगर।

जयपुर में गुर्जर की थड़ी इलाके की रहने वाली मीरा का पूरा परिवार भी पिछले एक महीने से रावण के पुतले तैयार करने में लगा है।

मीरा बताती हैं, "हमने इस बार मेले के हिसाब से पुतले तैयार ही नहीं किए क्योंकि सरकार का क्या भरोसा कब लॉकडाउन लगा दे, इसलिए हमने कोरोना की वजह से सिर्फ छोटे साइज और 100 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक के ही पुतले लोगों के लिए तैयार किए हैं।"

आगे अपनी किस्मत और सरकार दोनों को कोसती हुई मीरा अपनी बात में जोड़ती हैं, "हमारा पिछली बार भी नुकसान हुआ था और इस बार भी हमने सरकार को कहा कि हमारी लागत भी निकलना मुश्किल लग रही है लेकिन यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है।"

इसके अलावा जयपुर के विद्याधर नगर में रावण दहन समिति के अध्यक्ष दिनेश कांवट बताते हैं, "हर साल की तरह इस बार हम आयोजन नहीं कर रहे हैं, बाकि जो होगा वो सरकार की कोरोना गाइडलाइंस को देखकर तय किया जाएगा।"

वहीं रावण के पुतले बनाने वाले कारीगरों पर कांवट ने कहा, "इस बार कारीगर वैसे भी कम हैं जो पुतले बना रहे हैं बाकि जिन्होंने बनाये हैं उन्हें आर्थिक सहायता देने के बारे में हम जल्द ही कुछ सोचेंगे कि उनके लिए कुछ व्यवस्था की जाए।"

रावण के पुतले बनाने के काम में जुटे हैं कई परिवार।

इस पूरे मसले पर 'गांव कनेक्शन' ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के कमिश्नर ओम प्रकाश बुनकर से भी बात की। उनके मुताबिक, अभी विभाग की ओर से इन पुतला कारीगरों को कोई आर्थिक मदद देने के लिए हमारे पास कोई भी योजना नहीं है।

क्या विभाग आने वाले समय में इन कारीगरों के लिए कुछ मदद देने लिए कोई प्लान तैयार कर रहा है, इस सवाल पर बुनकर ने कहा, "अभी तक तो हमने ऐसा कोई विचार नहीं किया गया है।"

माता को हाथों से सजाकर ग्राहकों का इंतजार करते मूर्तिकार

पालड़ी मीणा के रहने वाले 36 साल के भीमा भाटी ने जयपुर के जेएलएन मार्ग की भारी आवाजाही वाले जेडीए चौराहे की लाल बत्ती के पास इस साल इस बचकानी उम्मीद में दुकान लगाई है कि लोग अगर माता रानी की पूजा करेंगे तो कोरोना महामारी दूर हो जाएगी।

भीमा ने बताया कि एक मूर्ति का पुतला बनाने से लेकर उसकी रंगाई-पुताई होने में करीब 7-8 दिन लग जाते हैं। इस बार मूर्तियां बनाने के लिए उन्होंने 10 रुपये सैकड़े पर करीब 40 हजार रुपये का कर्जा लिया है।

वहीं पिछले साल 50 मूर्तियों की दुकान लगाने वाले भीमा ने इस बार 2 महीने पहले मूर्ति बनाने का काम शुरू किया और अभी तक 2 से लेकर 5 फीट तक की करीब 20 मूर्तियां बना ली हैं, लेकिन अभी तक वह बोनी भी नहीं कर पाए हैं और आगे उन्हें ऐसे लगता है कि इस बार तो लागत भी नहीं निकल पाएगी।

वहीं इसी सड़क की एक लाल बत्ती पर बिड़ला मंदिर के पास काली भाटी ने अपने पति के साथ मूर्ति की दुकान लगा रखी है, पति मूर्ति की पलकों को गहरे काले रंग से उकेरने में व्यस्त थे तभी कैमरा देखकर काली दौड़ी और बंद कैमरे के सामने ही बोलने लगी।

जयपुर के जेएलएन मार्ग के पास माँ दुर्गा की मूर्ति लगाए एक कारीगर।

कुछ देर में शांत होकर तुरंत बोल पड़ी, "आप लोगों को कहो कि मूर्ति लेने आए, हमने बहुत मेहनत की है।"

आगे बात करने पर वह कहती हैं, "पहले हमारे पास दो महीने पहले ही बड़ी मूर्तियों के ऑर्डर आ जाया करते थे लेकिन इस बार तो कोई छोटी भी लेने नहीं आया।"

ग्राहकों का सूना देखकर काली आगे कहती हैं कि इस बार लोग पता नहीं माता की पूजा करेंगे या नहीं, अभी तक तो लग रहा है कि लोग पूजा नहीं करेंगे।

कुछ दूर आगे चलने पर 45 साल के मोहन राठौर जिनका खानदानी काम मूर्ति बनाने का है वह करीब 100 मूर्तियों की सबसे बड़ी दुकान लगाकर बैठे हैं, बताते हैं, "इस साल हमारे पास हमेशा की तरह पहले से कुछ ऑर्डर आए थे लेकिन ग्राहकों ने शहर में धारा 144 लगने का हवाला देते हुए कैंसल कर दिए।"

आगे मोहन कहते हैं, "चलो यह समझ में आता है कि इस बार बड़े पंडालों में मूर्ति पूजा नहीं होगी लेकिन कॉलोनियों के लोग तो छोटी मूर्ति लेने आ सकते हैं लेकिन वह भी कोरोना के डर से नहीं निकल रहे हैं।"

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