लखीमपुर खीरी में पांच साल से कम उम्र के आधे से ज्यादा बच्चे अविकसित, भूमिगत जल भारी मात्रा में आर्सेनिक से दूषित

भौगोलिक रूप से लखीमपुर खीरी यूपी का सबसे बड़ा जिला है, जिसे उत्तर प्रदेश के मिनी-पंजाब के रूप में भी जाना जाता है। फिलहाल तो यह भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में एक नई हलचल का केंद्र बन हुआ है। तीन अक्टूबर को जिले में हुई हिंसक झड़प में आठ लोगों की मौत हो गई थी। यहां अगले साल की शुरुआत में चुनाव भी होने हैं। हालांकि राज्य के कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी 3.38 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। लेकिन सामाज और सेहत से जुड़े मामलों में जिले का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है।

Shivani GuptaShivani Gupta   12 Oct 2021 1:45 PM GMT

लखीमपुर खीरी में पांच साल से कम उम्र के आधे से ज्यादा बच्चे अविकसित, भूमिगत जल भारी मात्रा में आर्सेनिक से दूषित

लखीमपुर खीरी को उत्तर प्रदेश के मिनी-पंजाब के रूप में भी जाना जाता है। फोटो: अरविंद शुक्ला

3 अक्टूबर को हुई हिंसक झड़प के बाद लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश में हलचल का एक नया केंद्र बन गया है। यहां चार किसान, दो भाजपा कार्यकर्ता, उनके ड्राइवर और एक स्थानीय पत्रकार रमन कश्यप समेत आठ लोगों की मौत हो गई थी। उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव भी होने हैं।

लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है, जिसकी सीमाएं पड़ोसी देश नेपाल के साथ सटी हुईं हैं। 7,680 वर्ग किलोमीटर में फैला यह जिला लखनऊ संभाग का एक हिस्सा है। निघासन तहसील हिमालय की तलहटी में फैली तराई पट्टी में बसा है। इसी क्षेत्र में 3 अक्टूबर को हिंसक झड़प हुई थी।

उत्तर प्रदेश के इस जिले में सिख आबादी काफी ज्यादा है जिस कारण इसे यूपी के मिनी-पंजाब के रूप में भी जाना जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार इसकी कुल 4,021, 243 आबादी में से 2.35 प्रतिशत (94,388 लोग) लोग सिख है। यह राज्य में औसत सिख आबादी 0.32 प्रतिशत से कहीं अधिक है। राज्य की कुल सिख आबादी 643,500 है।

शारदा और घाघरा सहित कई नदियों और हरी-भरी वनस्पतियों वाला यह जिला, राज्य के कृषि और मत्स्य पालन क्षेत्रों में अपने योगदान के लिए भी जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश के अर्थशास्त्र और सांख्यिकी निदेशालय द्वारा जारी जिला घरेलू उत्पाद के आंकड़ों के अनुसार, लखीमपुर खीरी का योगदान 124.14 अरब रुपये है, जो राज्य के कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्र की GDP (सकल घरेलू उत्पादः 2019-20) 3,667.27 अरब रुपये का 3.38 प्रतिशत है।

सिख किसानों ने लखीमपुर खीरी को उत्तर प्रदेश के कृषि उत्पादन में सबसे अधिक योगदान देने वालों में से एक बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। फोटो: अरविंद शुक्ला/गाँव कनेक्शन

हालांकि, पिछले कुछ सालों में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और जिले की समृद्ध कृषि स्थिति के बावजूद, खीरी सेहत, साफ पानी और महिला साक्षरता के मामले में काफी पीछे है।

जिले के लोग पीने के पानी और सिंचाई के लिए भूमिगत जल पर ही निर्भर रहते हैं। लेकिन इस पानी में जहरीले आर्सेनिक का स्तर बहुत अधिक है। साथ ही फ्लोराइड जैसे अन्य दूषित पदार्थों का स्तर भी तय सीमा से कहीं ज्यादा हैं। ये दूषित पदार्थ लोगों को जीवन भर के लिए अपंग भी बना सकते हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (NFHS)- 2015-16 के अनुसार, खीरी जिले में पांच साल से कम उम्र के आधे से ज्यादा (53.9 प्रतिशत) बच्चों की लंबाई उम्र के हिसाब से कम पायी गई, जबकि 40.8 प्रतिशत बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम था औऱ 17.5 प्रतिशत बच्चे कमजोर श्रेणी में आते हैं।

पानी में जहर

'उत्तर प्रदेश, भारत के भूजल और मिट्टी में आर्सेनिक की उपस्थिति और फसल व पौधों पर इसके फाइटोटॉक्सिक प्रभाव' शीर्षक से 2018 में एक अध्ययन किया गया था। अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और उन्नाव जिलों के भूमिगत जल में प्रति लीटर (µg/l), 23 से 140 माइक्रोग्राम आर्सेनिक की मात्रा पाई गई जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की 10 µg/l1. की तय सीमा से काफी ऊपर थी। माइक्रोग्राम प्रति लीटर को प्रति बिलियन या पीपीबी के रूप में भी जाना जाता है। BIS (भारतीय मानक ब्यूरो) की, पीने के पानी में आर्सेनिक की तय सीमा भी 10 पीपीबी है।

2018 में किए गए इस अध्ययन में जिले के एक ही जगह से मिट्टी और भूजल के नमूने लिए गए थे। जिसमें भूजल की तुलना में मिट्टी में लगभग 40 से 45 गुना अधिक आर्सेनिक मिला था।

यह चिंता का विषय है क्योंकि जिले में ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमिगत जल पर ही निर्भर है और इसी से वो फसलों की सिंचाई भी करता है।

2019 में प्रकाशित 'भूजल आर्सेनिक संदूषण की भविष्यवाणी: भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में जोखिम वाले क्षेत्र' शीर्षक से एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम 23.48 मिलियन लोग ऐसे भूजल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें आर्सेनिक की मात्रा काफी ज्यादा है। 2019 के अध्ययन के अनुसार, लखीमपुर खीरी सबसे बुरी तरह प्रभावित जिलों में से है।

रिपोर्ट के लेखक चंदर कुमार सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया, "लखीमपुर खीरी जिले के पल्लिया, निघासन और ईशानगर जैसे इलाकों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा है। आर्सेनिक त्वचा, फेफड़े, लीवर कैंसर जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। इससे कार्डियक अरेस्ट भी हो सकता है,।" सिंह TERI स्कूल ऑफ एडवांस स्टडीज के ऊर्जा और पर्यावरण विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

समस्या बस यहीं तक सीमित नहीं हैं। सिंह ने बताया, "जिले का मितौली ब्लॉक फ्लोराइड से जूझ रहा है। फ्लोराइड हड्डियों से संबंधित समस्याओं का कारण बनता है। बच्चों में दांत या स्केलेटल फ्लोरोसिस होने की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं"

उत्तर प्रदेश के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा लाल, हरे और नीले घेरे द्वारा दर्शाई गई है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) ने भी भूमिगत जल की खराब गुणवत्ता की इस समस्या को माना है। CGWB के अनुसार, लखीमपुर खीरी का निघासन क्षेत्र आर्सेनिक की समस्या से जूझ रहे सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में से एक है। केंद्रीय भूजल बोर्ड, जल संसाधन विभाग के जल शक्ति मंत्रालय के अधीन काम करता है।

2012-13 में 'यूपी के लखीमपुर खीरी जिले में भूजल परिदृश्य' शीर्षक से तैयार की गई इस रिपोर्ट में बताया गया था कि लखीमपुर खीरी के पलिया, निघासन, रमिया बिहार, धौरहरा और इसानगर ब्लॉक में 10 पीपीबी से ज्यादा की आर्सेनिक सांद्रता दर्ज की गई है।

इस क्षेत्र के भूमिगत जल में फॉस्फेट बिल्कुल भी नही है। CGWB की 2012-13 की रिपोर्ट में कहा गया था, " विश्लेषण किए गए 20 प्रतिशत नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा काफी ज्यादा थी। ऐसा शायद खेती में उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल और कचरे के सही तरीके से निपटारा न करने की वजह से था।"

खराब स्वास्थ्य संकेतक

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी, 2016-17 के आंकड़ों से पता चलता है कि लखीमपुर खीरी जिले की चालीस लाख से अधिक ग्रामीण आबादी के लिए 54 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) हैं। इनमें से सिर्फ 30 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सप्ताह के सातों दिन लगातार 24 घंटे काम कर रहे हैं।

जिले में 6-23 महीने के आयु वर्ग के आठ प्रतिशत से कम बच्चों को पर्याप्त आहार मिल रहा है। फोटो: अरविंद शुक्ला/गाँव कनेक्शन

इस बीच, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) 2015-16 के अनुसार खीरी जिले में पांच साल से कम उम्र के आधे से ज्यादा (53.9 प्रतिशत) बच्चों की लंबाई उम्र के हिसाब से कम पायी गई, जबकि 40.8 प्रतिशत बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम था औऱ 17.5 प्रतिशत बच्चे कमजोर श्रेणी में आते हैं।

NFHS के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि जिले में 6-23 महीने की उम्र के आठ प्रतिशत से भी कम बच्चों को पर्याप्त आहार मिल पा रहा है।

इसके अलावा, 2015-16 में किए गए इस सर्वे के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि जिले में 6-59 महीने की उम्र का लगभग हर दूसरा बच्चा (49.8 प्रतिशत) एनीमिक है और 15-49 साल की उम्र की 43.1 प्रतिशत सभी महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं।

लखीमपुर खीरी: यूपी का मिनी-पंजाबी

2011 की जनसंख्या जनगणना के अनुसार, लखीमपुर खीरी जिले में कुल 529,223 किसान हैं जो कुल श्रमिकों का 41.8 प्रतिशत है और कुल 422,142 खेतिहर मजदूर हैं जो श्रमिकों के कुल प्रतिशत का 33.4 प्रतिशत है।

इससे पता चलता है कि जिले में श्रमिकों की एक बड़ी संख्या– 75.2 प्रतिशत – खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है।

गांव कनेक्शन ने अविभाजित पंजाब से उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में आए सिखों और जिले के इतिहास के बारे में पता लगाया।

उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में सिखों की अधिकांश आबादी 1960 के दशक की है। एक सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल शिक्षक और खीरी जिले के पासगवां शहर के निवासी राम चंद्र शुक्ला ने गांव कनेक्शन को बताया, "विभाजन के बाद, पाकिस्तान (अविभाजित पंजाब) से कई सिख यहां आए थे। यह तराई क्षेत्र है। उस समय, यहां कम ही लोग रहा करते थे। सिखों ने यहां अपना बसेरा डाल लिया।"

73 साल के शिक्षक ने कहा, "वे (सिख) पंजाब में एक एकड़ जमीन बेचेंगे और यहां खीरी में दस एकड़ जमीन खरीदेंगे।" उन्होंने आगे बताया, "यहां के स्नातकों को बीस एकड़ जमीन और हाई स्कूल वालों को बारह एकड़ जमीन दी गई थी। तब खीरी में जमीनें बहुत सस्ते दामों पर बेची जाती थीं, "

शुक्ला के अनुसार, आजादी के पांच साल बाद, 1950 से लेकर 1970 तक कम से कम 20 साल तक पलायन जारी रहा था।

इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में 1960 के दशक के दौरान सिख आबादी में कैसे अभूतपूर्व तेजी देखी गई थी।

23 जनवरी 1965 को EPW में प्रकाशित लेख में लिखा गया था, "ऐसा क्यों हुआ, इसकी तलाश में ज्यादा गहराई तक जाने की जरुरत नहीं है। इस क्षेत्र में हमेशा खेती करने की व्यापक संभावनाएं मौजूद रहीं है, उसके बावजूद व्यावहारिक रूप से ये इलाका बेकार पड़ा हुआ था। आजादी के तुरंत बाद जमींदारों के कार्यकाल की व्यवस्था के उन्मूलन ने इस आभासी बंजर भूमि के विकास के रास्ते खोल दिए थे। पंजाब की घनी आबादी वाले सिख किसानों को इस इलाके ने अपनी ओर आकर्षित किया था "

इसी लेख में आगे कहा गया था, आर्थिक अवसरों की तलाश में, पंजाब से बाहर जाने वाले सिख भारत के अधिकांश हिस्सों में फैल गए। हालांकि, उनमें से एक बहुत बड़ी संख्या आसपास के राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में बस गई।, जहां दस वर्षों के दौरान उनकी आबादी में जबरदस्त वृद्धि हुई है,

उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में सिख आबादी में 43.58 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। 1951 में इनकी आबादी 197,612 थी जो साल 1961 में बढ़कर 283,737 हो गई। EPW के लेख में इसका जिक्र किया गया है।

1951-61 में सिख जनसंख्या की राज्यवार वृद्धि।


1951-61 के दौरान उत्तर प्रदेश के जिलों में सिख आबादी में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई।

इस प्रकार खेती की आपार संभावनाओं के चलते सतलुज क्षेत्र निकलकर सिख किसानों ने उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों की ओर रुख किया।

सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल के शिक्षक ने आगे बताया, "उन्होंने (सिखों) हिंदुओं की अन्य जातियों के मूल निवासियों से जमीनें खरीदीं। यहां के स्थानीय लोगों को मजबूरन जमीनें बेचनी पड़ीं। अब उनमें से ज्यादातर सिखों के खेतों में मजदूरी का काम कर रहे हैं। जमीन के मालिक मजदूर बन गए।"

हालांकि, खीरी के कृषि क्षेत्र में सिखों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

कृषि, आजीविका और जीडीपी

उत्तर प्रदेश के अर्थशास्त्र और सांख्यिकी निदेशालय द्वारा जारी जिला घरेलू उत्पाद के आंकड़ों के अनुसार, लखीमपुर खीरी का योगदान 124.14 अरब रुपये है, जो राज्य के कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्र की GDP (सकल घरेलू उत्पादः 2019-20) 3,667.27 अरब रुपये का 3.38 प्रतिशत है।


अविभाजित पंजाब से उत्तर प्रदेश में प्रवास करने के बाद, सिख किसानों ने लखीमपुर खीरी जिले को राज्य के कृषि उत्पादन में सबसे अधिक योगदान देने वालों में से एक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

शुक्ला ने कहा, "यहां के मूल निवासी धान और गेहूं जैसी फसल ही उगाते थे। सिखों के यहां आने के बाद उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने के लिए ट्रैक्टर जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने जमीन को समतल करने के लिए लेवलर का इस्तेमाल किया और तराई की जमीन को खेती योग्य बना दिया "

वह आगे कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है कि यहां कृषि क्षेत्र को बेहतर बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे बहुत अमीर किसान भी हैं। उनके पास 100 एकड़ जमीन है।"

कम साक्षरता दर

सरकारी आंकड़े जिला और राज्य स्तर पर महिलाओं की साक्षरता दर में भारी अंतर को दर्शाते हैं। जिले में 15-49 साल की आधे से भी कम (44.6 प्रतिशत) महिलाएं साक्षर हैं। NFHS 2015-16 के आंकड़ों से पता चलता है कि यह राज्य के औसत 61 प्रतिशत से कम है। भारत सरकार पढ़ने और लिखने में समर्थ किसी भी व्यक्ति को साक्षर के रूप में परिभाषित करती है।

हैरानी की बात यह है कि जिले में सिर्फ 15.1 प्रतिशत महिलाओं ने दस साल या फिर उससे ज्यादा साल स्कूली शिक्षा में बिताएं हैं, यह राज्य के औसत 32.9 प्रतिशत से काफी कम है।

जिले में महिला और पुरुष साक्षरता दर के बीच एक बड़ा अंतर है। जिले में जहां 78.6 प्रतिशत पुरुष साक्षर हैं वहां जिले की आधी महिलाएं भी साक्षर नहीं हैं। हालांकि, जिले में पुरुषों की साक्षरता दर अभी भी राज्य के औसत 82.4 प्रतिशत से कम है।

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि जिले में केवल 41.4 प्रतिशत घरों में बिजली है। ग्रामीण परिवारों में तो प्रतिशत घटकर 37 ही रह जाता है।

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अनुवादः संघप्रिया मौर्य

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