आदिवासी समुदाय के लिए सांस्कृतिक महत्व के साथ ही अर्थव्यवस्था का आधार भी हैं महुआ

मध्य भारत के जंगलों में इन दिनों माहौल किसी उत्सव से कम नहीं, क्योंकि यहां के एक बड़े क्षेत्रफल में आदिवासी समुदाय महुआ के फूलों को इकट्ठा करते हैं। महुआ के इन फूलों की खुशबू तो फैल ही रही है, साथ ही समुदाय के लिए खुशहाली भी लेकर आया है। क्योंकि ये अपनी आजीविका चलाने और अपनी सेहत का ख्याल रखने के लिए महुआ के फूलों पर निर्भर हैं। मध्य प्रदेश के गाँवों से गाँव कनेक्शन के लिए ग्राउंड रिपोर्ट

Arun SinghArun Singh   8 April 2022 10:41 AM GMT

आदिवासी समुदाय के लिए सांस्कृतिक महत्व के साथ ही अर्थव्यवस्था का आधार भी हैं महुआ

विक्रमपुर (पन्ना) मध्य प्रदेश। भोर होने से पहले ही राधारानी राजगौंड अपने महुआ के बाग में पहुंच गई हैं, महुआ के लगभग 50 पेड़ हैं जो जंगल को घेरे हुए हैं। वह अकेली नहीं हैं बल्कि उनके साथ उनका पूरा परिवार पति, शंकर सिंह, उनका बेटा, उनकी बेटी, उनकी बहू पेड़ों के नीचे पीले कालीन के तरह बिखरे हुए फुलों को चुन रहे हैं।

सुगंध हर तरफ फैली हुई है और वहां इकट्ठा लोग खुश हैं। राधारानी ने हंसते हुए गाँव कनेक्शन से बताया कि ये हमारे लिए किसी त्योहार के सीजन से कम नहीं है। हमारा जीवन महुआ के फूलों पर निर्भर है। उन्होंने आगे कहा कि फूलों को इकट्ठा करने में काफी मेहनत लगती है।

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में राधा रानी का गाँव विक्रमपुर जंगलों से घिरा हुआ है। यहां करीब 46 परिवार रहते हैं, इनमें से ज्यादातर आदिवासी हैं, सभी की जिंदगी महुआ पर निर्भर है।

विक्रमपुर के एक और ग्रामीण शंकरसिंह राजगोंड ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हम लोग अक्सर रात के खाने के बाद खेत में आ जाते हैं और खेतों में बनी मचानों पर रात गुजारते हैं, ताकि नीलगाय या जंगली सुअर गिरे हुए महुए को न खाएं। उन्होंने बताया कि भोर होते ही सारा परिवार महुआ के फूलों को चुनने में लग जाता है। हम लोग जंगलों में घुस जाते हैं। कभी-कभी बहुत ज्यादा फूल जमा हो जाते हैं जिनको हम इकट्ठा नहीं कर पाते हैं। उन्होंने कहा कि जो फूल छूट जाते हैं उनको सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है बाद में उसको आपस में बांट लिया जाता है।


यह मध्य भारत का मौसम है जब आदिवासी समुदाय टोकरियां लेकर खेतों और जंगलों की ओर महुआ के फूलों को इकट्ठा करने के लिए निकल जाते हैं। महुआ जिसे इंडियन बटर ट्री भी कहा जाता है, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और झारखंड के आदिवासी पट्टी में काफी उपयोगी माना जाता है।

महुआ का फूल गैर-लकड़ी जंगली पैदावार (NTFP) में से एक है, जो जनजातीय अर्थव्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। महुआ के आर्थिक महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश की तीन चौथाई आदिवासी आबादी महुआ के फूलों को एकत्रित करने में लगी हुई है, जो दर्शाता है कि लगभग 7.5 मीलियन लोगों का जीवन इस पर निर्भर है।

2019 के एक शोथ पत्र महुआ (मधुकैंडिका): आदिवासी अर्थव्यवस्था के लिए एक वरदान है में उल्लेख है कि महुआ के फूलों का संग्रह और व्यापार प्रति वर्ष 28 हजार 6 सौ व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करता है, जबकि इसकी क्षमता प्रति वर्ष 1 लाख 63 हजार व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करने की है।


आदिवासियों के जीवन में महुआ का खास स्थान है। ये उनकी रोजी-रोटी का साधन है, उनका खाना और पानी भी इसी से आता है। यह एक ऐसी फसल है जिसके लिए उन्हें एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता (क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा कुदरती तौर पर जंगलों में उगता है)। आदिवासी आम तौर पर दैनिक किराना सामान लेने के लिए महुए की अदला बदली करते हैं, जिसका मूल्य महुआ के कारोबार के वास्तविक मूल्य से काफी अधिक है।

भोपाल की एनजीओ समर्थन के क्षेत्रीय समन्वयक ज्ञानेंद्र तीवारी ने बताया, "महुआ का फूल जनजातीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अकेले विक्रमपुर से सालाना लगभग 150 क्विंटल महुआ इकट्ठा होता है।"

सेंटर फॉर पीपुल्स फॉरेस्ट्री द्वारा प्रकाशित एक पेपर के अनुसार, महुआ का अनुमानित राष्ट्रीय उत्पादन 0.85 मिलियन टन है, जबकि कुल उत्पादन की क्षमता 4.9 मिलियन टन है। मध्य प्रदेश में महुआ के फूल के औसत कारोबार का मूल्य 5 हजार 7 सौ 30 मीट्रिक टन के आस पास है। 21 सौ मीट्रिक टन ओडिशा में है और आंध्रप्रदेश में 13 हजार 7 सौ 6 क्विंटल महुआ के फूलों की पैदावार (कीमत 8.4 मिलियन रुपए) और 6 हजार 1 सौ 88 क्विंटल (कीमत 6.5 मिलियन) महुआ के बीज की पैदावार होती है।

महुआ के अच्छे मौसम में औसतन हर व्यक्ति 70 किलो तक सूखा महुआ इकट्ठा कर सकता है। महुआ के फूल 4 से 6 सप्ताह तक होते हैं (मार्च से मई तक)। हालांकि इकट्ठा करने का समय 15 से 20 का होता है जब ज्यादा से ज्यादा फूल आते हैं। महुआ के पेड़ की औसत वार्षिक उपज 50.756 किलो प्रति पेड़ है।


उदाहरण के लिए, औडिशा में औसतन प्रत्येक परिवार प्रति मौसम में 5 से 6 क्विंटल महुआ इकट्ठा करते हैं, जो उनकी वार्षिक नकद आय में 30 प्रतिशत तक योगदान करता है।

विक्रमपुर गांव के शंकर सिंह राजगोंड के अनुसार, वे हर साल पांच से आठ क्विंटल महुआ फूल इकट्ठा करते हैं, जिसे वे व्यापारियों को 40 रुपये से 50 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचते हैं।

उन्होंने बताया, "महुआ के फूलों के अलावा, महुआ के फल और जामुन भी 15 हजार रुपये की बेचते हैं। हम लोग तेंदू और आमला भी तोड़ते हैं। सब कुछ प्रकृति के अनुसार बढ़ते हैं।

यहां तक कि जिनके पास 10 महुआ के पेड़ हैं उनको गाँव में बड़ा आदमी माना जाता है। विक्रमपुर गाँव के प्रतिपाल सिंह ने गाँव कनेक्शन से बात करते हुए बताया कि जिनके खुद के पेड़ नहीं हैं वह महुआ फूल इकट्ठा करने के लिए जंगल में जाते हैं।

40 वर्षीय शंकर सिंह ने बताया, "महुआ का हर टुकड़ा हमारे लिए अहमियत रखता है। महुए की छाल, फल और फूल सब कुछ इस्तेमाल में लाया जाता है। और महुआ की बीजों से निकाला गया तेल खाने के साथ साथ त्वचा पर लगाने के लिए भी स्तेमाल करते हैं।

विक्रमपुर की दीपारानी ने बताया कि जो हम तेल निकालते हैं हम उसको अपनी त्वचा पर लगाते हैं। महुआ हमारे लिए सिर्फ पैसे कमाने का माध्यम ही नहीं है, बल्कि ये हमारी सेहत का भी ख्याल रखता है।

महुआ के जंगल

पन्ना गाँवों के उत्तरी वन प्रभाग जैसे इमलौनिया पनारी, रहुनिया, खजरी कुदर, हर्ष, बगौहा, मुतवा और जनवार में महुआ को आदिवासियों द्वारा बड़ी मात्रा में इकट्ठा किया जाता है।

मध्य प्रदेश में उत्तरी पन्ना के सर्कल अधिकारी गौरव शर्मा ने गांव कनेक्शन से बात करते हुए बताया, "उत्तरी वन मंडल में महुआ के साठ हजार से अधिक पेड़ हैं।" उन्होंने बताया कि एक पेड़ से पच्चीस से पचास किलोग्राम तक सूखे फूल मिल सकते हैं।

आदिवासियों के लिए महुआ की पैदावार का समय परिवार के सदस्यों से दोबारा मिलने का समय होता है जो शायद रोजी रोटी की तलाश में गाँव छोड़ कर कहीं और चले गए होते हैं। पन्ना के दक्षिण वन प्रभाग में आने वाले कालदा पाथर के एक आदिवासी कुसुआ ने गांव कनेक्शन से बात चीत में बताया, "महुआ के मौसम में सभी घर वापस आते हैं।"


विक्रमपुर की दीपारानी ने मुस्कुराते हुए कहा जो अपने नौ साल के बेटे बसंत के साथ फूल चुन रही थीं, यह एक अच्छा मौसम रहा है। 36 साल के दीपरानी ने गाँव कनेक्शन से खुशी खुशी बताया कि हमारी 14 एकड़ जमीन में करीब 27 महुआ के पेड़ हैं और मुझे मालूम है कि इससे 6 से 7 क्विंटल फूल मिलेंगे।

महुआ के महत्व को 2018 के शोधपत्र Economic Impact of Mahua (Madhuca spp.) on Tribal Livelihood and It`s Marketing In Chhattisgarh State में प्रकाशित किया गया है। इसमें जानकारी दी गई किं किसान महुआ की खेती नहीं कर रहे हैं बल्कि उसको इकट्ठा कर के मुनाफा कमा रहे हैं और बाजार में सीधे उपभोक्ताओं को या विभिन्न स्तरों पर मध्यस्थों के माध्यम से बेच रहे हैं।

महुआ की बिक्री और मार्केटिंग

इस बीच, कल्दा रामपुर, जो पन्ना के दक्षिण वन प्रभाग में आता है, अपने महुआ के पेड़ों के साथ उन पर लदे भारी फूलों के साथ उत्सव जैसा दिखता है। फूलों की महक हर तरफ है और लगता है पूरी आदिवासी आबादी फूल लेने निकल पड़ी है।

कालदा पठार में आदिवासी समुदायों के अनुसार अमदरा, मैहर, पवई और सालेहा के व्यापारी उनसे फूल खरीदने गांव आते हैं।

माइनर फॉरेस्ट प्रोड्युस को-ऑपरेटिव फेडरेशन के आंकड़ों के अनुसार पन्ना के दक्षिणी फॉरेस्ट डिविजन में कालदा, रामपुर, मैन्हा, पिपरिया, जैतुपुरा, टोकुलपोंडी, भोपर, श्यामगिरि, कुसमी, झिरिया और डोंडी सहित गाँवों से लगभग 3 हजार क्विंटल फूलों का उत्पादन किया जाता है।


मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में महुआ के फूल एक जिला एक उत्पाद योजना के अंतर्गत आते हैं। जिले में लगभग 17 हजार टन महुआ की पैदावार होती है। जिले में पाए जाने वाले महुआ के फूलों की गुणवत्ता को सुरक्षित रखने के लिए लोगों को फूलों के इकट्ठा करने का सही तरीका का प्रशिक्षण देने का जिम्मा आजीविका मिशन ने अपने ऊपर लिया है।

अजीविका मिशन ने उमरिया जिले में महुआ के फूलों को इकट्ठा करने के लिए जाल बांटे हैं। जाल को जमीन पर बिछाया जाता ताकि डाल से गिरने वाले फूल सुरक्षित रह सकें। राज्य के माइनर फॉरेस्ट प्रोड्युस को-ऑपरेटिव फेडरेशन के आंकड़ों के अनुसार आदिवासियों से 75 हजार क्विंटल से ज्यादा महुआ के फूल खरीदे जाते हैं।

महुआ की एमएसपी

वनवासियों को लाभान्वित करने के लिए राज्य के वन मंत्री कुंवर विजय शाह ने कहा कि मध्य प्रदेश में 32 लघु जंगल की पैदावार का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) निर्धारित किया गया है। महुआ के फूलों का एमएसपी 35 रुपये किलो तय किया गया है।

राज्य भर में एकत्रित लघु जंगल की पैदावार के भंडारण के लिए 179 खरीद केंद्र और 47 गोदाम हैं।

प्रधानमंत्री वन धन विकास योजना के तहत जनजातीय मामलों के मंत्रालय और TRIFED की पहल, आदिवासी उत्पादों के मूल्यवर्धन के माध्यम से आदिवासी आय में सुधार करने का प्रयास किया जाएगा। इस योजना के तहत 19 जिलों में 107 वन धन केंद्र या केंद्र हैं।

35 रुपये प्रति किलो एमएसपी सास्तव में फूलों के मुकाबले में काफी कम है। विक्रमपूर गाँव के प्रतिपाल सिंह ने गाँव कनेक्शन से बताया कि व्यापारी हमारे गाँव में आते हैं और कम से कम 45 रुपये किलो तक फूल की खरीदारी करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि दो महीने में कीमत बढ़ कर 60 रुपये प्रति किलो तक हो जाएगी।

सोशल संगठन समर्थन के ज्ञानेंद्र तिवारी ने बताया, "कम एमएसपी के कारण, सरकार द्वारा बमुश्किल 15 से 20 प्रतिशत फूलों की खरीद की जाती है।"

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