छत्तीसगढ़ के इस पर्वत पर पांडवों ने गुजारा था अज्ञातवास

छत्तीसगढ़ के इस पर्वत पर पांडवों ने गुजारा था अज्ञातवासयहाँ आज भी पांडवों की पूजा होती है।

बीजापुर (आईएएनएस/वीएनएस)। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में दक्षिण बस्तर जिला मुख्यालय से 72 किलोमीटर दूर तेलंगाना की सीमा पर स्थित पुजारी कांकेर ऐसा गांव है, जहां आज भी पांडवों की पूजा होती है। पांचों पांडव भाइयों के लिए अलग-अलग पुजारी भी नियुक्त किए गए हैं। यह परंपरा यहां कई सौ साल से चली आ रही है।

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ग्रामीणों का मानना है कि गांव के पास स्थित विशाल पर्वत पर पांडवों ने अपना अज्ञातवास गुजारा था। इसी वजह से पहाड़ का नाम पांडव पर्वत रखा गया है। पहाड़ के ऊपर एक मंदिर है, जिसकी घंटी अपने आप बज उठती है। इस मंदिर के अलावा गांव वालों ने गांव की सरहद पर धर्मराज (युधिष्ठिर) मंदिर भी बना रखा है, जहां हर दो साल में एक बार मेला लगता है। ऐसी मान्यता है कि इस मेले में शामिल होने के लिए 25 गांवों के देवी-देवता पहुंचते हैं।

प्रतीकात्मक फोटो

गांव के पुजारी दादी राममूर्ति ने बताया, "मान्यता के अनुसार कौरवों के हाथ अपना सब कुछ गंवा देने के बाद पांडव जब अज्ञातवास पर निकले तो उस दौरान उन्होंने अपना कुछ समय दंडकारण्य में गुजारा था। इसमें से एक इलाका पुजारी कांकेर का भी था। जब पांडव यहां पहुंचे थे, तब उन्होंने दुर्गम पहाड़ पर स्थित गुफा से प्रवेश किया था और यहीं आश्रय लिया था, इसलिए बाद में इस पहाड़ का नाम दुर्गम पहाड़ के स्थान पर पांडव पर्वत रखा गया।"

उनके मुताबिक, पांडव इस पर्वत से होकर गुजरने वाली सुरंग से होकर भोपालपटनम के पास स्थित सकल नारायण गुफा से निकले थे, जहां वर्तमान में श्रीकृष्ण की मूर्ति है। हर साल वहां सकल नारायण मेला लगता है।

पुजारी कहते हैं कि उनके पूर्वजों द्वारा पांडव पर्वत में पांडवों के नाम पर मंदिर का निर्माण भी किया है। कोई भी व्यक्ति वहां नहीं पहुंच पाता है, इसलिए गांव के सरहद पर धर्मराज युधिष्ठिर के नाम का मंदिर बनाया गया है और पांचों पांडवों की पूजा के लिए अलग-अलग पुजारी नियुक्त किए गए हैं। अर्जुन की पूजा के लिए राममूर्ति दादी, भीम के लिए दादी अनिल, युधिष्ठिर के लिए कनपुजारी, नकुल के लिए दादी रमेश व सहदेव के लिए संतोष उड़तल को पुजारी बनाया गया है।

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हर दो साल में धर्मराज मंदिर में मेला लगता है। यहां आने वाले श्रद्धालु अपने कामना और मन्नत के अनुसार, बकरे और मुर्गो की बलि चढ़ाते हैं। यह मेला अप्रैल माह में बुधवार के दिन ही आयोजित किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि पूजा पाठ और पुजारियों का गांव होने के कारण ही उनके गांव का नाम पुजारी कांकेर रखा गया है।

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