पीएम मोदी ने तीन तलाक और हलाला से दिलाई आजादी

Dr SB MisraDr SB Misra   31 July 2019 5:52 AM GMT

पीएम मोदी ने तीन तलाक और हलाला से दिलाई आजादी

देश के बड़े नेता, सेकुलरवादी और समाजवादी प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पास पचास के दशक में सुनहरा मौका था मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक और हलाला की जलालत से निजात दिलाने का... जब उन्‍होंने हिन्दू कोड बिल पास कराया और हिन्दू कुरीतियों से छुटकारा दिलाया था। लेकिन मुस्लिम समाज विशेषकर महिलाओं को अपने हाल पर छोड़ दिया था। जिस तरह नेहरू कटिबद्ध थे हिन्दू कोड बिल पास कराने के लिए शायद उससे अधिक दृढ़निश्चयी थे मुस्लिम महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भले ही राज्य सभा में उनके पास बहुमत नहीं था। समान नागरिक संहिता की मंजिल अभी दूर है।

तीन तलाक को हटाने में अनेक सेकुलरवादियों ने तो साथ नहीं दिया लेकिन मोदी सरकार को उच्चतम न्यायालय के निर्णय से बहुत बल मिला। मोदी सरकार संविधान और उच्चतम न्यायालय की अपेक्षाओं को पूरा कर सकी। मोदी सरकार ने राज्य सभा में बड़ी दक्षता से बहुमत जुटाकर इतिहास रचा। मोदी सरकार राजीव गांधी सरकार की तरह दुबक नहीं गई। आज कितनी ही शाह बानो मोदी को दुवाएं दे रही होंगी। मोदी के पास कोई आरिफ मुहम्मद भी नहीं था तर्कपूर्ण भाषण के लिए।

दुनिया के 22 इस्लामिक देशों ने पहले ही तीन तलाक और हलाला को प्रतिबंधित कर रखा है, भारत तो सेकुलर देश है, यहां बहुत पहले यह जलालत बैन हो जानी थी। लेकिन आज भी अनेक सभ्य सेकुलर सांसदों ने तीन तलाक बिल को अस्वीकार किया है। देश ने सती प्रथा, बालविवाह, विधवा विवाह, दहेज, पिता की सम्पत्ति में महिलाओं का अधिकार जैसे कानून पास किए है, अब देश को सच्चे अर्थों में सेकुलर कानून बनाने की बारी है।

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सामाजिक न्याय के सेकुलर कानून लागू करने में आजादी के बाद और पाकिस्तान बनने के बाद नेहरू मंत्रिमंडल को अविलम्ब निर्णय लेना था। लेकिन लिया नहीं, बस सेकुलर की ढफली बजाते रहें। संविधान निर्माता अम्बेडकर का कानून था, संविधान की धारा 44 में निहित समान नागरिक संहिता जिसे कांग्रेस सरकार जब चाहती लागू कर सकती थी।

भारतीय मुसलमान कांग्रेस की ढुलमुल नीतियों के कारण पर्सनल लॉ के लिए उद्वेलित(अशान्त) होने लगा। ध्‍यान रहे कोई कानून पर्सनल नहीं होता, बेडरूम छोड़कर। कट्टरवादी मुसलमान तो पाकिस्तान चले गए थे बाकी बचे थे सेकुलरवादी मुसलमान, जो यूनिफार्म सिविल कोड को राजी खुशी स्वीकार कर लेते यदि तत्कालीन सरकारे चाहतीं।

तमाम कानून जैसे आबादी पर नियंत्रण, तलाक, बहुविवाह, बच्चों को रोटी रोजी देने वाली शिक्षा, मदरसों और पाठशालाओं का आधुनिकीकरण आदि सैकड़ों विषयों का सरोकार पूरे समाज से है, जिसकी जिम्मेदारी देश चलाने वाली सरकार की है। यदि हम सेकुलरवादी और समाजवादी व्यवस्था का दम भरते हैं तो समाज को टुकड़ों में बांटकर नहीं देख सकते। यदि भारत के सेकुलर संविधान और इस्लामिक शरिया अथवा मनुस्मृति में टकराव हो तो संविधान सर्वोपरि रहना चाहिए।

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शादी ब्याह का तरीका अलग-अलग होता रहे लेकिन तलाक और गुजारे के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए। हिन्दू कोड बिल के बावजूद हिन्दू महिलाओं की दशा अच्छी नहीं है। जहां कहीं सम्भव हो महिलाओं को महिलाएं समझ कर और पुरुषों को पुरुष मानकर कानून बने जो संविधान सम्मत हो। सरकार यह प्रावधान कर सकती है कि जो मुस्लिम महिलाएं गुजारा मांगे उनका हाल शाह बानो जैसा न होने पाए और जो हिन्दू दम्पति स्वेच्छा से अलग होना चाहें उनके छुट्टी छुट्टा में अनावश्‍यक विलम्ब न हो।

मुस्लिम और हिन्दू महिलाओं ने मिलकर मुम्बई की हाजी अली दरगाह में प्रवेश के मामले में विजय हासिल की थी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। मोदी सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने की संभावना तलाशने के लिए लॉ कमीशन की सलाह मांगी थी, आशा की जानी चाहिए कि सकारात्मक सलाह मिलेगी और सभी के लिए समान कानून बन सकेगा।

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