पंद्रह घंटे तक सरकारी अस्‍पतालों के चक्‍कर काटती रही गर्भवती महिला, निजी अस्‍पताल में हुआ प्रसव

रोबिन सिंह चौहान, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

देहरादून (उत्तराखंड)। प्रसव के दर्द से कराहती लक्ष्मी और उनके पति लखपत सुबह नौ बजे अपने घर से निकलने के बाद पहाड़ी रास्तों से होकर अस्पतालों का चक्कर लगाते रहे, लेकिन पर उनका प्रसव नहीं हो पाया, कहीं पर डॉक्टर नहीं थे तो कहीं पर वेंटिलेटर नहीं खाली। रात के डेढ़ बजे 230 किमी से भी अधिक दूरी का सफर करने के बाद देहरादून पहुंची जहां पर उनका प्रसव हो पाया।

देहरादून के एक निजी अस्पताल में अपने नवजात बच्चे के साथ बैठी चमोली जिले के लंगासु गाँव की लक्ष्मी असवाल की उम्मीद ही खत्म हो गई थी, वो बताती हैं, "मेरी हालत खराब हो गई थी, मैं कर्णप्रयाग तक आयी, उस समय हमारे पास सिर्फ दो हजार रुपए थे, जब कर्णप्रयाग आयी तो वहां पर लोगों ने कहा कि यहां पर कोई व्यवस्था नहीं है न ही डॉक्टर हैं तू यहां से आगे चले जा, उसके बाद श्रीनगर गई तो वहां पर कहा गया कि यहां पर तो बच्चे के लिए कोई सुविधा नहीं है, उसके बाद जब हम ऋषिकेश गए तो वहां पर तो लोगों ने हाथ खड़े कर दिए कि न बच्चा बचेगा और न ही मां बच पाएगी। वहां से रो रोकर मेरी हालत खराब हो गई, उसके बाद हम देहरादून आए तो एक हॉस्पिटल गए तो वहां पर एक दिन के 25 हजार बताया, अब मेरी जेब में सिर्फ दो हजार थे, फिर उसके बाद मैं यहां आयी यहां नॉर्मल डिलीवरी हो गई।"

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल निराशाजनक है। उत्तराखंड में हुए गाँव कनेक्शन के एक सर्वे के अनुसार 44.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि बीमार होने पर जब वे सीएचसी और पीएचसी पहुंचते हैं तब वहां कभी कभार ही डॉक्टर मिलते हैं। 23 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अस्पताल में डॉक्टर रहते हैं लेकिन दवाइयां नहीं मिलती हैं। सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण सामान्य बीमारी तक के लिए लोग व्यक्ति प्राइवेट अस्पताल जाने के लिए मजबूर हैं।

देहरादून के एक निजी अस्पताल में लक्ष्मी और उनके पति लखपत असवालदेहरादून के एक निजी अस्पताल में लक्ष्मी और उनके पति लखपत असवाल

लक्ष्मी देवी आगे कहती हैं, "मेरी तरह कोई भी महिला जाए उसके लिए सरकारी अस्पतालों में ठीक व्यवस्था होनी चाहिए, थोड़ी सुविधा होनी चाहिए, डॉक्टर तो कभी रहते ही नहीं हैं, चमोली की तो बहुत बुरी दशा है, जहां कभी डॉक्टर रहते ही नहीं हैं। पहाड़ों पर कोई सुविधा नहीं है गरीबों के लिए तो कोई सुविधा ही नहीं है, क्योंकि पैसे चाहिए तब जाकर जिंदगी है। सरकारी अस्पतालों में तो डॉक्टर ही नहीं है, जब कोई इलाज कराने जाता है तो उस समय कोई डॉक्टर ही नहीं मिलता है, कितने लोगों की तो जान चली जाती है।"

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा विश्व बैंक के तकनीकी सहयोग से तैयार नीति आयोग की 'स्वस्थ्य राज्य प्रगतिशील भारत' शीर्षक से जारी रिपोर्ट में राज्यों की रैंकिंग से यह बात सामने आयी है। इस रपट में इन्क्रीमेंटल रैंकिंग यानी पिछली बार के मुकाबले सुधार के स्तर के मामले में 21 बड़े राज्यों की सूची में बिहार 21वें स्थान के साथ सबसे नीचे है। इसमें उत्तर प्रदेश 20वें, उत्तराखंड 19वें स्थान पर हैं। रिपोर्ट के अनुसार संदर्भ वर्ष 2015-16 की तुलना में 2017-18 में स्वास्थ्य क्षेत्र में उत्तराखंड 5.02 अंक की गिरावट आयी है।

लक्ष्मी के पति लखपत असवाल कहते हैं, "बता नहीं सकता कि हम पर क्या गुजरी है, हम एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकता रहा, मेरी तरह लाखों लोग होंगे जो भटक रहे होंगे। मुझे अफसोस हो रहा कि हम पहाड़ के लोग इतने दूर से आते हैं, तब भी हमें कोई सुविधा नहीं उपलब्ध हो पाती है। उस समय मुझे डर लग रहा था लग रहा था, मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि कहां जाऊं क्या करुं।


यही हाल पौड़ी गढ़वाल जिले का है, पौढ़ी गढ़वाल जिले के नैनीडांडा ब्लॉक की रहने वाले वाली कमला देवी बताती हैं, ""नाम के लिए तो ये तीस बेड का अस्पताल है, तीस बेड के अस्पताल होने के बावजूद न यहां पर एक्स-रे मशीनें अच्छी हैं, न ही कोई और सुविधा, एक प्रसव के लिए भी हमें 100 किमी. दूर तक जाना पड़ता है।"

नैनीडांडा ब्लॉक में 16 जून 1906 को बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के नाम 30 बेड का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जनता को समर्पित कर तो दिया मगर लगभग 13 साल बीत जाने के बाद भी डॉक्टर और अन्य स्टाफ की कमी के कारण आज यह समुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अपनी बदहाली का रोना रो रहा है। मानकों के हिसाब से जिस स्वास्थ्य केंद्र में 6 विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए थे वह मात्र एक विशेषज्ञ डॉक्टर के सहारे चल रहा है।

लाखों की लागत से एक्स रे मशीन तो लगा दी गई मगर टेक्नीशियन ना होने के कारण एक्स-रे मशीन धूल फांक रही है बंद पड़े एक्स-रे रूम के ताले पर भी जंग लगने लगा है गायनोलॉजिस्ट ना होने के कारण प्रसव के लिए महिलाओं को सौ सौ किलोमीटर दूर कोटद्वार रामनगर के मैदानी क्षेत्रों की तरफ ले जाना पड़ता है इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं पहाड़ी क्षेत्रों के दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल है।

यही हाल उत्तराखंड के ज्यादातर जिलों का है। चंपावत जिले के पान सिंह (60 वर्ष) कहते हैं, "हमारे यहां सरकारी अस्पताल हैं लेकिन वहां दवा नहीं मिलती। डॉक्टर भी नदारद रहते हैं। गंभीर रूप से बीमार होने पर हम लोग यहां से 128 किलोमीटर हल्द्वानी लेकर जाते हैं। सरकारी अस्पतालों का बहुत बुरा हाल है।"

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