पीओपी-सीमेंट नहीं, गुड़, बेल और उड़द की दाल से निखर रही लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों की रंगत

ऐतिहासिक इमारतों को उनको उनकी वही पहचान दिलाने के लिए परंपरागत तरीकों का होता है प्रयोग, विशेष कारीगर पुराने भवनों की कर रहे मरम्मत

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   18 April 2019 6:45 AM GMT

लखनऊ। इमारतें शहर की बनावट तय करती हैं। शहर की सभ्यता, संस्कृति और उसके वास्तुशिल्प की दास्तान कहती हैं। वक्त के साथ लखनऊ की इमारतों की चमक भी फीकी होती जा रही है। आखिरी सांस गिन रही इमारतों में जान फूंकने का काम पुरातत्व विभाग करा रहा है। खास बात यह है कि इन ऐतिहासिक इमारतों को उनको उनकी वही पहचान दिलाने के लिए गुड़, बेल,शीरा, उड़द की दाल,गोंद, सुर्खी और मेथी से बने मसाले का प्रयोग किया जाता है।

ऐतिहासिक इमारतों की मरम्मत करने वाले कंजरवेटर नितिन कोहली का कहना है, " आज सीमेंट का दौर है, लेकिन हम लोग इन इमारतों की मरम्मत में सीमेंट का प्रयोग नहीं करते हैं। परंपरागत तरीके और पुराने जमाने में मकान बनाने के लिए जिन चीजों का प्रयोग होता था उसी को यूज करते हैं। हम लोग चूने का पैंतालिस दिन तक भिगोते हैं फिर उसकी पुट्टी बनाते हैं। पुरानी लाखौरी ईंटों को पीस कर सुर्खी बनाई जाती है। फिर गोंद, गुड़, शीरा, बेल और उड़द की दाल मिलाई जाती है। फिर इस मिश्रण को करीब आठ घंटे तक बारीक पीसा जाता है। इसके बाद इस मसाले को कई परतों में लगाया जाता है। इस मसाले से मकान काफी टिकाऊ होता है, इसिलिए पुरानी इमारतें आज भी वैसी की वैसी टिकी हुई हैं। "


पुरातत्व विभाग द्वारा ऐतिहासिक इमारतों के कायाकल्प की जिम्मेदारी लखनऊ की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी को सौंपी गई है। सैकड़ों साल पुराने भवनों को वही पहचान दिलाने के लिए विशेष कारीगर जुटे हुए हैं।

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नितिन कोहली का कहना है, " किस शहर में कितने साल पहले क्या गुजरा यह शहर की इमारतें देखकर पता लगाया जा सकता है। हर शहर में कुछ ऐसी इमारतें होती हैं जिनसे उसे शहर की पहचान होती है। अवध में भी कुछ ऐसी इमारतें हैं जिनसे लखनऊ को देश दुनिया में जाना जाता है। हम लोग मरम्मत के दौरान उस भवन की तत्कालीन स्थापत्य शैली, बिल्डिंग मटेरियल और डिजायन का विशेष ध्यान रखते हैं।"


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टूटे झरोखे, जर्जर दीवारें, और ऊंचे खंडहर सी दिखने वाली ऐतिहासिक धरोहर अब अपने पुराने स्वरूप में नजर आने लगी हैं। इन इमारातों में जान डालने वाले कुछ लोग ही बचे हैं। लखनऊ के आस-पास के जिलों के रहने वाले शिल्पिकार इन इमरातों को संवार रहे हैं।


पुरानी ऐतिहासिक इमारतों का पुरातत्व विभाग की कमेटी निरीक्षण करती है। कमेटी इमारत के हालातों की शिनाख्त कर पुरातत्व विभाग के अधिकारी विवरण तैयार करते हैं। फिर विभाग इमारतों के संरक्षण के लिए टेंडर निकालता है। अनुवभी लोगों को ही काम दिया जाता है। सारा काम पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञ लोगों की देखरेख में किया जाता है।


कारीगर राज किशोर का कहना है, " हमारे शहर की जो धरोधर है वह जर्जर हो रही है और पुरातत्व विभाग द्यारा सही कराई जा रही है तो यह सही बात है। यह हम लोगों के लिए फक्र की बात है कि हम लोग इन इमारातों को संवार रहे हैं। हमारे परिवार के बच्चे कभी अपने बच्चों से कहेंगे कि यह काम हमारे बाप-दादा ने की है, हमें अच्छा लगेगा।"

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कारीगर कलीम का कहना है, हम लोगों ने गुलिस्तान-ए-इरम को मरम्मत किया। कैसरबाग बारादरी से सटी इमारत गुलिस्तान-ए-इरम यूरोपियन संस्कृति को बेजोड़ नमूना है। इस बिल्डिंग में रेजीमेंट ऑफिस,लैंड रिकॉड्स व एग्रीकच्लर आफिस हुआ करता था। मुझे डिजायन का काम करते-करते 12 साल हो गए हैं। यह काम मेरे पिता ने मुझे सिखाया था और उनके पिता ने उन्हें। हम लोग पांच भाई हैं और सभी यही काम करते हैं।"

छतर मंजिल, फरहत बक्श कोठी, कोठी गुलिस्ता इरम, पिक्चर गैलरी, बड़ा इमामबाड़ा,जामा मस्जिद, रेजीडेंसी, मकबरा नादान महल, सिंकंदरबाग गेट, विलायती बाग, लाल बारादरी भवन, चौक कोतवाली, चिड़ियाघर की ओल्ड कोठी।

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