"पहले लोग चाय-पानी पूछते थे, अब किसी के पास वक़्त ही कहाँ है!" राष्ट्रीय डाक सप्ताह पर आज के डाकियों की कहानी

उस ज़माने में घुंघरू की झनक से गाँव वाले समझ जाते थे कि पोस्टमैन आ गया है हमारे द्वार पर और बडी प्रसन्ता और आदर के साथ हमारा सतकार होता था और हमें पत्ता-पानी (खाना-पीना) भी पूछते थे और कहते थे आइये, पोस्टमैन साहब आ गये!

Jigyasa MishraJigyasa Mishra   11 Oct 2018 11:45 AM GMT

लखनऊ। एक दौर था जब दूसरे शहर में काम करने वाले परिवार के किसी सदस्य की एक चिट्ठी के इंतज़ार में लोग हर साईकिल की घंटी पर खिड़की तलक दौड़ जाया करते थे। तब डाकिया साहब भी किसी मसीहे से कम नहीं माने जाते थे। लेकिन आधुनिकीकरण का पहिया ऐसा घूमा कि अब एक ही घर के दो कमरों में बैठ कर लोग वाहट्सएप्प पर बात कर रहे होते हैं। यही नहीं, हाल तो ये है कि अब शौचालयों में फ़ोन होल्डर्स भी स्थापित होने लगे हैं और भावनाएं व्यक्त करने के लिए फेसबुक वाल का इस्तेमाल इस कदर हो रहा है कि कई बार पता नहीं वो संचार सेन्डर से रिसीवर तक पहुँच भी पता है या बस लाइक और कमेंट कि होड़ में ही गुम हो जाता है।


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"कितना भी इंटरनेट आ जाए, डाकघर में हम डाकियों का काम कम नहीं हुआ है, अब सोच और नज़रिया बदला है। अक़सर लोग बोलते हैं कि पहली बार हमने पोस्ट वुमन को देखा। पोस्टमैन तो थे पर अब पोस्टवुमेन भी हो गई हैं। बहुत अच्छा है कि लेडीज़ (महिलाएं) आगे बढ़ रही हैं। बहुत सम्मान मिलता है हमको," साजदा बानो, गोमतीनगर डाकघर के 35 डाकियों में एकमात्र महिला डाकिया बताती हैं।

डिजिटल स्क्रीन से नज़रें उठाकर देखें तो एक ज़माने में घुँघरू और भाला लेकर चलने वाले डाकिये अब साइकिल पर सवार होकर हमारी गलियों से गुज़रते दिखेंगे। लखनऊ के गोमतीनगर पोस्टऑफिस के पोस्ट-मास्टर नीलेश श्रीवास्तव बताते हैं, "टेक्नॉलजी कितनी भी आ जाए लेकिन लेटर्स आने पर जो एहसास होता है वह वॉट्सएप और मैसेज से नहीं होता। आज भी रक्षा बंधन पर आने वाली डाकेँ बेहद बहुमूल्य होती हैं, फ़ोन पर 'हैप्पी-राखी' लिखने या बोलने से दिल नहीं भरता।"

एक दौर घुँघरू और भालों का भी था–

27 वर्षों से बतौर डाकिया काम करने वाले कृष्णा यादव, पुराने दिन याद कर के बड़े उत्साह से बताते हैं, "पहले तो भाला टाइप में होता था जिसे साथ लेकर डाकिये चलते थे... उसमे घँघरू बांधते थे। उस ज़माने में घुंघरू की झनक से गाँव वाले समझ जाते थे कि पोस्टमैन आ गया है हमारे द्वार पर और बडी प्रसन्ता और आदर के साथ हमारा सतकार होता था और हमें पत्ता-पानी (खाना-पीना) भी पूछते थे और कहते थे आइये, पोस्टमैन साहब आ गये! अब लोग अपनी अपनी जिंदगियों में व्यस्त रहते हैं तो वक़्त नहीं होता कि हमसे बात करें।"

अम्बिका प्रसाद बताते हैं, "पहले लोग चिठ्ठियों का बेसब्री से इंतेज़ार भी करते थे। मिलेट्री में काम करने वालों के ख़त आते थे तो उनके परिवार के लोग बहुत खुश हो जाते थे, तब फ़ोन कहाँ हुआ करते थे, लेकिन संदेशे तब भी आते थे, संदेशे अब भी आते थे, बस निजी खत आने काम हो गए हैं।"


डॉक्टर शिव बालक मिश्र, भूगर्भ विशेषग्य और गाँव कनेक्शन के प्रधान सम्पादक अपनी पुरानी यादें ताज़ा करते हुए बताते हैं-

कुछ दशक पहले तक मध्यमवर्गीय परिवारों में दूरभाष यानी टेलीफोन बहुत कम होते थे। करीब 35 साल पहले जब मैं नैनीताल के किसी पब्लिक बूथ से लखनऊ फोन करना चाहता था तो पड़ोस के एक मुस्लिम परिवार में करता था क्योंकि मुहल्लेभर में केवल उन्हीं के घर फोन था। वह मेरी पत्नी या बच्चों को बुला दिया करते थे। टेलीफोन होना वैसे ही प्रतिष्ठा का विषय था जैसे आज बड़ी कार होना। कुछ दिनों बाद लखनऊ में मेरे ससुर जी ने टेलीफोन लगवा लिया था। जिस दिन टेलीफोन का डब्बा घर में आया था तो लाइनमैन की खातिरदारी तो हुई ही थी उस बक्सेनुमा टेलीफोन की भी पूजा हुई थी। गाँव से सीधा सम्पर्क अभी भी नहीं थ।

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"डोमेस्टिक चिट्ठियों का चलन ज़रूर कम हुआ है लेकिन सरकारी डाक अब भी बहुत आते हैं। अभी तो हम अपनी कैपेसिटी (छमता) से डेढ़ गुना ज्यादा काम करते हैं। सुबह साढ़े आठ आ जाते हैं और शाम को जब तक काम ख़तम नहीं होता तब तक डाक बांटते हैं" जनसम्पर्क निरीक्षक ऐस ऍफ़ इमाम ने बताया।

तेज़ रफ़्तार वाली ज़िन्दगी से बराबरी के शौक़ीन नहीं ये डाकिये:

गाड़ियां हमारे काम के लिए सही नही हैं क्योकि हमारा काम कोरियर का नहीं है कि हम एक चिठ्ठी यहां दे और दूसरी एक किलो मीटर पर दें। हमें तो हर दूसरे-तीसरे घर पर रुकना पड़ता है, जिससे हमको बार-बार टिक (रीसीविंग) लगाने में दिक्कत होगी। अगर एक जगह गाड़ी खड़ी करके भी मोहल्ले में पैदल बांटे तो इसमें भी टाइम ज्यादा वेस्ट होता है इसलिए हमारे लिए साइकिल सबसे अच्छी है," वो आगे बताते हैं।



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