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दिल्ली की देहरी: सिमटने लगी है देश में सराय की समृद्ध परंपरा

भारतीय संस्कृति में हमेशा से विभिन्न रूपों आश्रय देने की एक महत्वपूर्ण सामाजिक परंपरा थी, जिसके माध्यम से सर्वसाधारण जन को भी सेवा प्रदान की जाती थी

Nalin ChauhanNalin Chauhan   30 March 2019 9:46 AM GMT

दिल्ली की देहरी: सिमटने लगी है देश में सराय की समृद्ध परंपरा

भारत में यात्रियों के लिए आश्रय की अवधारणा नई नहीं है। ऐतिहासिक अभिलेखों और पुस्तकों में धर्मशाला, विहार, सराय और मुसाफिरखाना जैसे शब्दों का उल्लेख है। इन प्रतिष्ठानों ने सभी पर्यटकों-चाहे वे तीर्थयात्री, विद्वान, व्यापारी या साहसी व्यक्ति कोई भी हो-को आश्रय प्रदान किया। भारतीय संस्कृति में हमेशा से विभिन्न रूपों आश्रय देने की एक महत्वपूर्ण सामाजिक परंपरा थी, जिसके माध्यम से सर्वसाधारण जन को भी सेवा प्रदान की जाती थी।

मोतीचन्द्र की पुस्तक "सार्थवाह" के अनुसार, प्राचीन भारत में सड़कों पर यात्रियों के आराम के लिए धर्मशालाएं होती थी। अंग और मगध के वे नागरिक, जो एक राज्य से दूसरे राज्य में बराबर यात्रा करते थे, उन राज्यों के सीमान्त पर बनी हुई एक सभा में ठहरते थे। रात में मौज से शराब, कबाब और मछलियां उड़ाते थे तथा सवेरा होते ही वे अपनी गाड़ियां कसकर यात्रा के लिए निकल पड़ते थे। उपर्युक्त विवरण से यह पता चलता है कि सभा का रूप मुगल युग की सराय जैसा था।


"धम्मपद अठ्ठकथा" के अनुसार, ऐसा पता चलता है कि तक्षशिला के बाहर एक सभा थी, जिसमें नगर के फाटकों के बंद हो जाने पर भी यात्री ठहर सकते थे। यात्रियों के आराम के लिए सड़कों के किनारे कुओं और तालाबों का प्रबन्ध रहता था। एक तरह से कहा जा सकता है कि भारत में यात्रा के मध्य आश्रय प्रदान करने की अवधारणा को संस्थागत बनाने वालों में सर्वप्रथम बौद्ध भिक्षु ही थे। भारत के समूचे दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में यत्र तत्र बिखरे हुए गुफा मंदिरों में पूजा और प्रार्थना के लिए चैत्य और विहार (मठ) दोनों थे। ये भिक्षु आबादी वाले कस्बों और गाँवों से दूर रहने के बावजूद भी यात्रियों और तीर्थयात्रियों की जरूरतों के बारे में सजग थे। इसी का परिणाम था कि इन मठों में उन्हें आश्रय और भोजन दोनों मिलता था। यह याद रखना दिलचस्प है कि ये मठ प्राचीन व्यापार मार्गों पर क्षेत्र के महत्वपूर्ण तीर्थ केंद्रों के बीच में ही स्थित थे।


"शब्दों का सफर" नामक तीन खंडों वाली पुस्तक के लेखक अजित वडनेकर के अनुसार, फारसी में कारवां सराय शब्द भी इस्तेमाल होता है जिसका मतलब है राजमार्गों पर बने विश्रामस्थल। प्राचीनकाल से ही राहगीरों की सुविधा के लिए शासन की तरफ से प्रमुख मार्गों पर विश्रामस्थल बनवाए जाते थे जहां कुछ समय सुस्ताने के बाद राहगीर आगे का सफर तय करते थे। गौरतलब है कि पुराने जमाने में अधिकांश यात्राएं पैदल या घोड़ों की पीठ पर तय की जाती थीं। सराय शब्द में मूलतः आश्रय का भाव है। ईरानी संस्कृति में सराय की अर्थवत्ता में महल भी शामिल है।


मुस्लिम शासन के दौरान "सराय" शब्द का इस्तेमाल उत्तर भारत में खूब बढ़ा। सराय के धर्मशाला वाले अर्थ में इसका खूब विस्तार हुआ। देश भर में कई आबादियां बिखरी पड़ी हैं जिनके नाम के साथ-साथ सराय शब्द लगाता है। मुगलों के पड़ाव या डेरे के तौर पर बसी आबादी को मुगलसराय नाम से जाना जाता है। जाहिर है कभी यहां सराय नाम की इमारत जरूर रही होगी। शेख सराय और बेर सराय, जैसे नामों से यह साफ है। यहां तक कि दिल्ली के एक उपनगरीय रेलवे स्टेशन का नाम सराय रोहिल्ला है। जहां से आजकल राजस्थान की ओर जाने वाली रेलगाड़ियां चलती हैं।

इतिहासकार आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव की पुस्तक "द हिस्ट्री ऑफ इंडिया (1000-1707)" में लिखते हैं कि शेरशाह एक महान सड़क निर्माता था। प्राचीन हिंदू राजाओं के नक्शे-कदम पर चलते हुए, उसने अपनी राजधानी को अपने प्रभुत्व के विभिन्न हिस्सों से जोड़ने के लिए कई सड़के बनवाईं। सड़कों की दोनों ओर पेड़ों की कतारें होती थीं और यात्रियों और व्यापारियों के लिए चारदीवारी वाली सराय होती थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली के तख्त पर काबिज होने के बाद शेरशाह ने अपने शासनकाल में पहले से मौजूद सड़क व्यवस्था को ही मजबूत किया।


"मुगल भारत में सड़क परिवहन" पुस्तक के लेखक सुभाष परिहार के अनुसार, हर पांच कोस या आठ कोस (10 या 16 मील) के बाद सराय होती थीं। उनका वास्तविक नाम कारवांसराय होता था। मुगल शासन काल में आगरा-लाहौर राजमार्ग पर कम से कम सैंतीस स्थानों-बड़, मथुरा, आजमाबाद, छट्टा, कोसी, होडल, पलवल, ख्वाजा सराय, बदरपुर, निजामुद्दीन, बादली, नरेला, गन्नौर, समालखा, पानीपत, घरौंडा, करनाल, तरौरी, थानेसर, शाहबाद, कोट कच्छवाहा, शंभू, राजपुरा, सराय बंजारा, सरहिंद, खन्ना, सराय लश्कर खान, दोराहा, फिल्लौर, नूरमहल, नाकोदर, महलियान कलां, सुल्तानपुर लोधी, फतेहबाद, नौरंगाबाद, सराय अमानत खान और सराय खान-ए खाना-पर कारवांसराय होने के बारे में पता चलता है।

"दिल्ली तेरा इतिहास निराला" पुस्तक में "सराय की प्रत्यय" वाले दिल्ली के गांवों के नाम सहित उनकी बसावट के इतिहास की रोचक ढंग से विस्तृत जानकारी दी गई है। ऐसे ही कुछ गांवों के नाम हैं, कानू सराय, लाडो सराय, नेब सराय, कटवाड़िया सराय, जिया सराय, दादो सराय, तोत सराय, षाहजी सराय, गांव बुआ सराय, युसुफसराय, सरबन सराय, गटटू सराय, सराय कबीरुद्दीन, सूरा सराय और हमीद सराय। जैसे दरख्त नेब यानी नीम के पेड़ के कारण नेब सराय तो तोते के नाम पर तोत सराय पड़ा। वहीं गांव बुआ सराय पर बसे आज के मस्जिद मोठ इलाके की मस्जिद मोठ की दाल की भरपूर फसल होने के कारण मशहूर हुई। मालवीय नगर में विजय मंडल के उत्तर पश्चिम में लगभग 500 मीटर की दूरी पर कालू सराय नामक एक छोटा गांव भी है।


आज की दक्षिणी दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामने मुनिरका नामक एक गांव है। इस नाम के मूल में मुनीर खान है जो कि 15 वीं सदी में इस इलाके का मनसबदार था। यह भी सराय मुनिरखां था जो कि समय की धारा से घिसते-घिसते मुनिरका हो गया। जबकि लेखक रघुराज सिंह चौहान और मधुकर तिवारी की पुस्तक "जुलियानानामा, द स्टोरी आफ डोना जुलियाना डा कोस्टा, ए पुर्तगीज कैथोलिक लेडी एट द मुगल कोर्ट" के अनुसार, मुगल बादशाह औरंगजेब की 1707 में हुई मौत के बाद उसके बेटों के बीच तख्त पर काबिज होने को लेकर जजाऊं के मैदान में छिड़ी जंग में जुलियाना और उसके पुर्तगाली तोपचियों ने अपने कारनामे से लड़ाई का रूख बदलते हुए हिंदुस्तान के भावी मुगल बादशाह बहादुर शाह की गद्दीनशीनी तय की। दक्षिणी दिल्ली स्थित ओखला में इसी साहसी महिला के नाम पर जुलियाना सराय थी।

"दिल्ली और उसका अंचल" पुस्तक के अनुसार, वर्तमान दिल्ली करनाल रोड से सब्जी मंडी को जोड़ने वाली सड़क पर एक सराय थी जो "गुड़ की सराय" कहलाती थी और जिसे बाद के मुगल काल में बनवाया गया था। इसके तीन प्रवेश द्वारों से, जिनके दोनों छोरों पर मेहराबी दरवाजे हैं, पुरानी ग्रांड ट्रंक रोड गुजरती थी। यह ज्यादातर ईटों से निर्मित है यद्यपि उसकी परत में बलुआ पत्थर का भी इस्तेमाल हुआ है। ये द्वार जैसा कि उनके दोनों प्रवेश द्वार पर एक-एक अभिलेख से पता चलता है कि नाजिर महलदार खां ने 1728-29 में बनवाए थे।


"सेलिब्रेटिंग दिल्ली" में इतिहासकार नारायणी गुप्ता लिखती है कि शाहजहांनाबाद के आसपास यूसुफ, शेख, बेर, काले खान, बदरपुर, जुलियाना ( मुगल बादशाह औरंगजेब के बेटों को पढ़ाने वाली एक पुर्तगाली महिला), रुहेला और बादली नाम की सरायें थीं। शहर में, चांदनी चैक के पास सुंदर रूप से आकल्पित की गई सराय थी, जिसका नाम शहजादी जहांआरा के नाम पर थी। यह सराय 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के बाद गायब हो गई। जब शहर में रेलवे का आगमन हुआ और शहर के उत्तरी भाग में पूर्व से पश्चिम की दिषा की ओर एक बड़ा इलाका समतल किया गया तथा जहांआरा बेगम की सराय की सराय के स्थान पर टाउन हॉल बना। आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने 1857 में अपने परिवार के साथ अरब सराय में ही पनाह ली थी और अंग्रेज लेफ्टिनेंट हडसन ने उन्हें बंदी बनाया था।

दिल्ली दरवाजे से सटी हुई एक सराय थी और पास ही मस्जिद जो अब भी है। सराय, इस दुनिया की सराय से उठ गई। सराय दिल्ली दरवाजा को नकटे की सराय भी कहते थे क्योंकि इसके स्वामी नन्नेखां की नाक कटी हुई थी। लाल पत्थर से निर्मित सराय गढ़ी के रूप में दिखाई देती थी। सराय का प्रवेश द्वार ऊंचा और कंगूरों से सुसज्जित था। दरवाजे का फाटक सूरज डूबने के बाद बंद कर दिया जाता था। इसमें घोड़े, ऊंट और बैलगाड़ियों सहित एक हजार मुसाफिरों के ठहरने की व्यवस्था थी। मुसाफिरों के मनोरंजन और सुविधा के लिए गायक, वादक, नर्तक, नर्तकियां, नाई, धोबी और दवा-फर्रोश उपलब्ध थे।

डाक बंगलों और होटलों के पनपने और लोगों को बेहतर सुविधाओं की जरूरत के साथ ही सरायों का अस्तित्व सिमटने लगा। पर आज यह बात जानकर हर किसी को हैरानी होगी कि होटल में ठहरने वाले मेहमानों पर अभी भी 19 वीं सदी (1867) का सराय अधिनियम लागू है।

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