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महाराष्ट्र: किसानों के लिए मुसीबत बनी बारिश, लगातार बारिश से खेत में बर्बाद हो रहीं फसलें

खराब मौसम और अनियमित बारिश ने एक बार फिर महाराष्ट्र में फसलों को बर्बाद कर दिया है, ये लगातार दूसरा साल है जब किसानों की फसलें बारिश से बर्बाद हुईं हैं।

Divendra SinghDivendra Singh   28 Sep 2020 8:27 AM GMT

महाराष्ट्र: किसानों के लिए मुसीबत बनी बारिश, लगातार बारिश से खेत में बर्बाद हो रहीं फसलें

चेतन बेले, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

महाराष्ट्र में एक बार फिर खराब मौसम और अनियमित बारिश ने तबाही मचायी है, लगातार बारिश से सोयाबीन, ज्वार, बाजरा जैसी फसलें खेत में ही अंकुरित होकर सड़ने लगी हैं।

"पिछले डेढ़ महीने से शुरू बारिश ने किसानों के सामने फिर से संकट खड़ा कर दिया है, पहले बारिश की कमी और फिर इल्लियों का प्रकोप और अब जब फसल तैयार होने को हुई तो इतनी बारिश हो रही कि सोयाबीन की फलियों में दाने अंकुरित होने लगे हैं, फसल खेत में ही सड़ने लगी है।, "वर्धा जिले के सलोड हीरापुर गाँव के किसान अविनाश भोयर बताते हैं।

किसान अविनाश भोयर के पास सात एकड़ खुद की खेती है और 25 एकड़ बटाई पर लेकर खेती करते हैं। अविनाश ने इस बार इस बार 13 एकड़ में सोयाबीन की फसल लगायी है। फसल बुवाई के समय अच्छी बारिश होने होने से इस बार अच्छी फसल रही, तो उन्हें लगा कि पिछले वर्ष का और इस वर्ष का कर्ज चुका देंगे। लेकिन अगस्त में बैल पोला त्योहार के बाद से सोयाबीन में कीटों ने नुकसान करना शुरू करना दिया। पीली पड़ रही फसल को बचाने के लिए दो बार कीटनाशक का भी छिड़काव किया। अब लगातार हो रही बारिश से सोयाबीन की फसल काली पड़ गई है। सूखी फलियों में से नए अंकुरण निकलने लगे हैं।

वर्धा जिले में लगातार बारिश से सोयाबीन की फलियां काली पड़ गईं हैं।

ये महाराष्ट्र का वो क्षेत्र है, जहां पर किसानों की आत्महत्या की लगातार आती रहती हैं, यहां के उस्मानाबाद, नांदेड़, वर्धा जैसे कई जिलों में इस समय खरीफ की सोयाबीन, बाजरा, उड़द, कपास, ज्वार और मूंग की फसल तैयार हो रही है। सितम्बर से अक्टूबर में ये फसलें तैयार हो जाती हैं, लेकिन इस बार फिर बारिश ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है।

पिछले साल भी यहां पर बारिश ने तबाही मचायी थी, गाँव कनेक्शन ने नवंबर 2019 को मराठवाड़ा, लातूर और उस्मानाबाद जिलों में रिपोर्टिंग के दौरान कई खबरें की थीं, जहां पर पिछले कई साल से सूखे की मार झेल रहे किसानों को बारिश ने बर्बाद कर दिया था।

पिछले साल 2019 में भी बारिश से फसलें बर्बाद हुईं थीं, मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार तब महाराष्ट्र के 325 तालुका में 55,2200 हेक्टेयर में, सोयाबीन, ज्वार, तूर, कपास, बाजरा और धान जैसे फसलों को नुकसान पहुंचा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से नुकसान के आंकड़े जारी किए गए थे, जिसके अनुसार पुणे की 51 तालुका में 1.36 लाख हेक्टयेर, कोंकण की 46 तालुका की 97000 हेक्येटर, नाशिक की 52 में 16 लाख हेक्टेयर, औरंगाबाद की 72 तालुका में 22 लाख हेक्टेयर, अमरावती की 56 तालुका में 12 लाख और नागपुर की 48 तालुका की 40000 हेक्टेयर में फसल का नुकसान हुआ था।


स्काईमेट के अनुसार महाराष्ट्र में इस साल मॉनसून सीजन में सामान्य से अधिक वर्षा हुई है। मध्य महाराष्ट्र में एक जून से अब तक सामान्य से 30% अधिक, कोंकण गोवा में 24% ज़्यादा और मराठवाड़ा में 16% अधिक वर्षा हुई है। हालांकि विदर्भ में अभी भी बारिश में 12% की कमी है।

उस्मानाबाद के उमरगा तालुका के चिंचौली भुयार गाँव के किसान अशोक पंवार, पिछले दिनों लगातार हो रही बारिश से नुकसान के बारे में बताते हैं, "इस बार दस एकड़ में सोयाबीन की फसल लगी है और कुछ एरिया में तूर (अरहर) की फसल भी बोई है। लगातार हो रही बारिश इस बार फिर सोयाबीन की फसल बर्बाद हो गई है। यहां हर बार यही हो रहा है, जून-जुलाई में जब फसलों को पानी चाहिए तब उतनी बारिश नहीं हुई और अब जब फसल तैयार होने को हुई है तो बारिश से नुकसान हो रहा है। पिछले साल भी बारिश ने ऐसी तबाही मचायी थी।

साल 2019 में रोजाना 28 किसानों (खेत मालिक और कृषि मजदूर) और 89 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की है। ये जानकारी सरकारी संस्थान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की सालाना रिपोर्ट से मिली है। वर्ष 2019 में 10281 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने जान दी है। जबकि 32,559 दिहाड़ी मजूदरों ने इस अवधि में आत्महत्या की है।

साल 2019 में कुल 139,123 लोगों ने पूरे देश में जान दी। जिसमें सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र (18,916) में है। पूरे देश में मौत को गले लगाने वाले लोगों में 7.4 फीसदी लोग खेती से जुड़े (किसान और खेतिहर मजूदर) थे। पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। देश में सबसे अधिक किसान आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र से हैं।

नांदेड़ जिले के लोहा तालुका में किसान सोयाबीन के साथ ही कपास की खेती करते हैं। यहां भी वही हाल है, यहां के शेख मलंग बताते हैं, "बारिश ने हालत खराब कर दी है, इतनी बारिश हुई है कि गाँव में बाढ़ जैसी आ गई, इससे सबसे ज्यादा नुकसान किसानों का ही हुआ है, खेत में अभी भी दो-ढ़ाई फीट तक पानी भरा हुआ है। इतने पानी में तो फसल बचेगी नहीं सड़ जाएगी।"

वो आगे कहते हैं, "ये पहली बार नहीं हुआ है, जब पानी की जरूरत होती है तब बारिश नहीं होती और जब फसल तैयार होती है तो बारिश आ जाती है। पिछले साल भी यही हुआ था, यहां के कई किसानों ने आत्महत्या भी कर ली थी।"

कपास की फसल में कई बार फूल आते हैं और किसान उनको पकने पर चुनते रहते हैं। लेकिन इस बार पहली बार ही फूल आया था और इतनी बारिश हो गई कि पौधे ही सूख गए। ऐसे में जिस पौधे से 500-700 ग्राम रुई मिलनी थी वो 50 ग्राम भी नहीं निकल रही। किसान का मुनाफा दूर जमा पूंजी भी डूब गई है।

एक एकड़ में 8 से 10 कुंतल तक कपास निकलती है। 4500-5000 का रेट मिला तो करीब 45000 रुपए का माल निकलता है। जिसमें 20000-25000 का खर्च निकाल दिया जाए तो भी 20 हजार से ज्यादा की प्रति एकड़ बचत हो जाती थी, लेकिन इस बार हजारों किसानों के खेतों में प्रति एकड़ एक कुंतल भी कपास होना मुश्किल है।"

पिछले साल नवंबर 2019 नांदेड़ जिले की ही लोहा तालुका के खंभेगांव के रहने वाले युवा किसान गजानद शिंदे (35 वर्ष) का शव उसी पेड़ के नीचे लटका पाया गया, जिसके नीचे खेती में काम करने के दौरान कभी वह सुस्ताया करते थे। बेहद गरीब परिवार के गजानन के सिर पर 60 हजार रुपए का बैंक का कर्ज़ और एक लाख से ज्यादा पैसे साहूकार के थे। उनकी फसल भी बारिश से बर्बाद हो गई थी।

वर्धा जिले के किसान अविनाश भोयर सोयाबीन की फसल के में लगायी गई लागत भी निकल पाने की आशंका से परेशान हैं। वो कहते हैं, "सरकार किसानों को सक्षम करने के लिए फसलो के निर्धारित मूल्य तय करने की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति कुछ और ही है।"


वो कहते हैं, "पिछले वर्ष तुअर और चना की ठीक ठाक फसल हुई थी, लेकिन बाजार में जब निर्धारित मूल्य पर बेचने गए तो, तुअर के दाने की असमानता के कारण उसे खरीदने से मन कर दिया। जिस कारण मंडी में ही स्थित व्यापारियों को औने पौने दाम में फसल बेचनी पड़ी।"

"कपास का भी यही हाल हुआ, दाम बढ़ने की आशा में घर में कपास भर कर रखा और कोरोना ने दस्तक दी जिस कारण महीनों तक बाजार बंद रहा। जब बाजार खुला तो बटाई की जमीन में खेती के कारण दो गाड़ी कपास निजी व्यापारियों को बेचनी पड़ी, 5550 निर्धारित मूल्य का कपास 4500 सौ रुपए में बेचनी पड़ी, जिस कारण 54 कुंतल कपास पर लगभग 55 हजार रुपए का नुकसान हुआ। तो बाकी गाड़ियों को पड़ोसी किसान के नाम पर डालकर बेचने गए तो उसके लिए किसान का दो हजार देने पड़े। सोचा था कि इस बार बारिश समय पर आने से फसल अच्छी होगी, लेकिन कीट और बारिश ने सब बर्बाद कर दिया, "अविनाश भोयर बताते हैं।


बारिश से महाराष्ट्र में खरीफ प्याज की फसल का भी नुकसान हुआ है। महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संगठन के अनुसार इस बार लगभग 35,000 हेक्टेयर में 50 प्रतिशत प्याज बारिश से बर्बाद हुई है। महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संगठन के अध्यक्ष भारत दिघोळे बताते हैं, "इस बार प्याज की खेती में शुरूआत से ही किसानों का नुकसान हो रहा है। पहले अच्छे बीज होने के कारण नर्सरी खराब हो गई, कई किसानों को तो दो बार नर्सरी तैयार करनी पड़ी। अब जब नर्सरी खेत में लग गई तो तो बारिश से फसल बर्बाद हो रही है। हमारे यहां पुणे, नासिक जैसे कई जिलों में प्याज की खेती होती है, जहां पर बारिश से नुकसान हुआ है।"


महाराष्ट्र में नाशिक, पुणे और सांगली जिले में अंगूर की बड़े पैमाने पर खेती होती है। इन मानसून में कई दौर की लगातार बारिश से इन तीनों जिलें में अंगूर की अगैती (पहले पकने वाली) फसल को भारी नुकसान हुआ है। नाशिक जिले में सटाना, कल्वन और मालेगांव तालुका अगैती फसल के लिए जाने जाते हैं।

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