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जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के किसानों को ईरानी सेब से परेशानी क्या है?

वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर ने 19 लाख मीट्रिक टन सेब की पैदावार की थी, जो देश के किसी भी राज्य से ज्यादा है। सेब की खेती से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 20 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में ईरानी सेबों का बिना टैक्स के बाजारों में बिकना इनके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

Amit PandeyAmit Pandey   13 April 2021 2:45 PM GMT

जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के किसानों को ईरानी सेब से परेशानी क्या है?

सोफियां के बागान में तोड़े गये सेब। (फोटो-गांव कनेक्शन)

मार्च के महीने की शुरुआत में सेब के किसानों की समस्या पर विचार करने के लिए उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के फल संघ के नेताओं ने मीटिंग की। इस मुलाकात का प्रमुख उद्देश्य देश में ईरान के सेबों का अफगानिस्तान के रास्ते होने वाले आयात को रोकना था।

कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोवर्स कम डीलर्स यूनियन के चेयरमैन बशीर अहमद बशीर कहते हैं कि इस साल भारत के बाजारों में ईरान के सेब आने के कारण स्वदेशी सेबों की कीमतों पर भारी असर पड़ेगा। हमें ईरान के सेबों के आयात से कोई परेशानी नहीं है, लेकिन उनका गलत तरीके से अफगानिस्तान के रास्ते भारत आना, इसका हम विरोध करते हैं। ये एक तरह की टैक्स चोरी है।

हिमाचल किसान सभा के अध्यक्ष कुशल भरद्वाज बताते हैं कि अफगानिस्तान साफ्टा (SAFTA) दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र का हिस्सा है और यहां के सेब के आयात पर कोई शुल्क नहीं लगता है। ईरान इसका हिस्सा नहीं और यह सब अफगानिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते अटारी बॉर्डर से भारत भेजे जा रहे हैं। इसमें एक कंटेनर पर आठ लाख के करीब आयात शुल्क की चोरी हो रही है। इसके कारण ईरान का सेब दिल्ली में सस्ता बिकता है।

कश्मीर के सोफियां के सेब किसान मोहम्मद अशरफ भी इसी बात को दोहराते हुए कहते हैं, "हमें ईरान के सेब के गलत तरीके से बाजार में आने से दिक्कत है। यदि ये सेब ईरान के रास्ते आए तो इसमें पंद्रह प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी और 35% सेस लगेगा। इसके साथ-साथ इस सेब का दिल्ली आजादपुर की मुख्य फल मंडी में बिकने का भी हम विरोध करते हैं। इसकी बिक्री का स्थान दिल्ली की नई सब्जी मंडी है, लेकिन ये धड़ल्ले से मुख्य फल मंडी में बेचा जा रहा है।"

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पचपन वर्ष के अल्ताफ का कहना है कि ये सेब ईरान का है क्योंकि अफगानिस्तान में सेब तोड़ने का समय सितंबर से अक्टूबर महीने का होता है, जिसमे दो प्रतिशत सेब निर्यात के लायक होते हैं। ऐसे में फरवरी के महीने तक इनका भारत के बाजारों में बिकना नामुकिन है।


जम्मू और कश्मीर की अर्थव्यवस्था में हॉर्टिकल्चर की एहम भूमिका है। वर्ष 2019 में कश्मीर ने लगभग 19 लाख मीट्रिक टन सेब की पैदावार की थी, जो देश के किसी भी राज्य से ज्यादा है। सेब की खेती प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 20 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में ईरानी सेबों का बिना टैक्स के बाजारों में बिकना इनके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

केंद्रीय वित्त मंत्री और दिल्ली के सीएम को लिखा लेटर

बशीर बताते हैं की ईरानी सेबों की समस्या को लेकर उन्होंने केंद्र की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को भी पत्र लिखा। केजरीवाल सरकार ने जहां इसे केंद्र का मुद्दा बताकर नकार दिया तो वहीं केंद्र सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। फिलहाल ईरानी सेबों का आयत रुक गया है, लेकिन अगर सरकार इस पर ध्यान नहीं देगी तो हमे अगले साल फिर इस मुसीबत का सामना करना पड़ेगा।

माइनिंग से भी परेशान हैं कश्मीर के किसान

कश्मीर में किसानों के सामने सिर्फ बाजार की समस्या नहीं है। इसके अलावा किसान नदियों के ऊपर माइनिंग की समस्या को लेकर भी परेशान है, जिसके कारण उनके बागों में नाले द्वारा आने वाले पानी का बाहव कम हो गया है।

खनन की तस्वीर।

शोपियां के सेब किसान और फल विक्रेता फारूक अहमद बताते हैं, "कश्मीर की ज्यादातर नदियों में माइनिंग के कारण पानी का स्तर नीचे हो गया है। ये नदियां शोपियन और पुलवामा जिले में पानी की आपूर्ती का काम करती हैं, लेकिन अब धीरे -धीरे पानी कम हो रहा है। जिले का नाला रम्बी आरा शोपियन जिले में सेब के किसानों को पानी देता है, लेकिन अभी जिस समय बगान में कीटनाशक और सिंचाई की जरूरत है। ऐसे में हमें पानी उपलब्ध नहीं हो रहा है।"

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55 वर्षीय फारूक का कहना है कि जब पीर पंजाल पहाड़ी श्रृंखला से बर्फ पिघलती है तो ये रम्बी आरा, रोमशी और विषो जैसे सहायक नदियों में पानी की पूर्ती करती हैं। ये नदियां सेब के बागानों में खनिज और अन्य जरूरी पोषण की पूर्ति करती हैं। साउथ एशिया नेटवर्क ऑफ डैम, रिवर्स एंड पीपल (SANDRP) अपनी अक्टूबर की एक रिपोर्ट में बताता है कि किस प्रकार जम्मू एंड कश्मीर की नदियों में खनन के कारण जैव विविधता और जरूरी संसाधनों की कमी वहां के लोगों को झेलनी पड़ेगी। इसके साथ साथ रिपोर्ट खनन की बोली की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाती है I

न्यूनतम समर्थन मूल्य के अधीन लाया जाए सेब

हिमाचल के सेब किसानों ने पिछले महीने राज्य की राजधानी शिमला में मार्च निकालकर सेब की न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग की। यह मार्च हिमाचल किसान सभा की अगुवाई में निकाला गया। सभा के सेक्रेटरी ओंकार सिंह, जो खुद कुल्लू के सेब किसान हैं बताते हैं, "कुछ सालों में सेब पर लागत की कीमत में काफी ज्यादा इजाफा हुआ है, जिसके कारण मुनाफा बिलकुल शून्य हो गया हैI फर्टिलाइजर के दाम बढ़े हैं, तेल की कीमत में वृद्धि होने के कारण अब स्प्रेइंग और माल धुलाई की कीमत में भी किसान को काफी पैसा खर्च करना पड़ता हैI'

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वे आने वाले दिनों में सेब की पैकेजिंग में आने वाले खर्च की बात करते हुए कहते हैं, "आने वाले समय में जो कार्टन अभी 40-60 रुपए में मिलता है वह 100 रुपए तक पहुंच जायेगा I सेब के बागानों में काम करने वाले मजदूरों की दिहाड़ी भी अब दोगुना हो गयी है। एक मजदूर की दिहाड़ी 500 -600 रुपए तक है। हमने अपनी इन सभी समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर को ज्ञापन भेजा है, जिसमे हमने मांग रखी है कि सेब को न्यूनतम समर्थन मूल्य के अधीन लाया जाए।

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