आखिर क्यों किन्नरों को बनाना पड़ा अपना अलग अखाड़ा

प्रयाराज। लंबे समय से किन्नर समुदाय समाज में बराबरी के लिए संघर्ष करता आ रहा है। इस बार अर्धकुंभ में किन्नर अखाड़ा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है।

साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों के हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, इसमें किन्नरों को तीसरे वर्ग के रूप में मान्यता दी थी। 2016 में हुए उज्जैन कुंभ में किन्नर अखाड़े का गठन किया गया। अक्टूबर, 2018 में इसका रजिस्ट्रेशन भी किया गया।

किन्नरों के अखाड़े बनाने के बारे में जयपुर की महामंडलेश्वर पुष्पा माई कहती हैं, "कृष्णकाल में, सब जगह किन्नरों का उल्लेख है। जब देव और दानवों ने सागर मंथन किया उसमें से लक्ष्मी निकलीं तो उसमें से जब हम लोगों (गंधर्व जाति) का उत्थान हुआ। गंधर्व क्योंकि नाच और गाने वाले होते थे अफ्सराओं की गिनती में आते थे उपदेवता माना जाता था।"


किन्नरों का कहना था कि सनातन धर्म में उचित स्थान मिला है। भारतीय अखाड़ा परिषद के भारी विरोध के बावजूद प्रयागराज के कुंभ में किन्नर अखाड़ा को मान्यता मिली। और वो शाही स्नान में शामिल हुए।

वो आगे बताती हैं, "किन्नर समाज शुरू से पूज्यनीय था, आज भी पूज्यनीय है। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद हमें लगा कि सरकार के कॉलम्स में हम वो चीज पा सकते हैं पर हमारा खोया हुआ सम्मान मिल जाएगा। लेकिन ये जो समाज है उसने हमें पूरा पिछड़ा वर्ग कर दिया। उस समाज को सिस्टम में लाने के लिए समय तो लगेगा, इसीलिए हमने किन्नर अखाड़े का गठन किया और किन्नर अखाड़े का उद्देश्य ये था कि हिन्दू सनातन धर्म में जो किन्नरों का वजूद है उपदेवता वो उसको यथावत स्थापित करने के लिए किन्नर अखाड़े का गठन किया गया।"

इस बारे में किन्नर अखाड़ा के पीठाधीश्वर पवित्रा माई ने कहा, "आज कहीं न कहीं हम लोगों को यहां पर जगह मिली है धर्म में धर्म में तो हम पहले से ही थे, लेकिन ये किन्नर शब्द जो था ये बहुत भेदभाव हमारे लिए समाज को लगता था समाज ने हमें हमेशा दूर रखा इसीलिए हमने हमारे सनातन धर्म को वजूद जिन्दा रखने के लिए हमने किन्नर अखाड़ा चालू किया है।"

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