'जिस बीमारी से मेरे मां-पापा की मौत हुई, मैं उसी बीमारी के साथ 28 वर्षों से जी रहा हूं'

"अपना साबुन, अपने बर्तन अलग रखो, अपना सारा सामान अलग कर लो हमसे और हमारे बच्चों से दूर रहा करो। तुम्हे एड्स है। "

Deepanshu MishraDeepanshu Mishra   23 Jan 2019 5:52 AM GMT

जिस बीमारी से मेरे मां-पापा की मौत हुई, मैं उसी बीमारी के साथ 28 वर्षों से जी रहा हूंविश्व एड्स दिवस 

लखनऊ।"अपना साबुन अलग रखो, अपने बर्तन अलग रखो, अपना सारा सामान अलग कर लो हमसे और हमारे बच्चों से दूर रहा करो। तुम्हे एड्स है।

ऐसा बोलते थे मेरे चाचा और चाची जो कि मेरे मम्मी और पापा की मौत के बाद सब कुछ थे।" अपने रुमाल से अपने आसुओं को छिपाते हुए राजीव (28 वर्ष) (बदला हुआ नाम) ने बताया।

'जिस बीमारी से मेरे मां-पापा की मौत हुई, मैं उसी बीमारी के साथ 28 वर्षों से जी रहा हूं' राजीव ने बताया। मात्र 13 वर्ष की उम्र में पापा और 15 वर्ष की उम्र में मम्मी की मौत के बाद चाचा-चाची से अच्छा बर्ताव न मिलने के कारण अपना भविष्य ढूँढ़ते लखनऊ के एक कॉलेज में बी.टेक करने लगे। राजीव बी.टेक कर चुके हैं अब वो कुछ घरों में जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस बीमारी का पहला केस 1981 में सामने आया था, तब से अब तक करीब 39 मिलियन लोग इस बीमारी का शिकार हो चुके हैं। पिछले 15 वर्षों में एड्स के मामलों में 35% कमी आई है और पिछले एक दशक में एड्स से हुई मौतों के मामलों में 42% कमी आई है।

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"मेरे पापा का एक प्रिंटिंग प्रेस था और उस प्रेस से काफी अच्छा पैसा कमा लेते थे। पापा को पता नहीं क्या हुआ उनके मम्मी के अलावा भी कुछ सम्बन्ध बन गए। वो ड्रग्स लेते थे, बहुत ज्यादा नशा करते थे। शायद ही कोई नशा हो जो पापा से छूटा हो। पापा धीरे-धीरे बीमार होने लगे और बहुत ज्यादा बीमार हो गए। हमने दिल्ली के बड़े अस्पताल में उनका इलाज शुरू करवाया लेकिन पता नहीं क्यों डॉक्टर ऐसा बोल रहे थे कि आपने बहुत देर कर दी है। इलाज चलते-चलते पापा की मौत हो गई। पापा को एड्स था। अभी मेरी उम्र मात्र 13 वर्ष ही थी।" रोती हुई आवाज में राजीव ने बताया।

राजीव ने बताया, "पापा अकेले ही नहीं एड्स से पीड़ित हुए बल्कि उन्होंने मम्मी को भी ये बीमारी दे दी। पापा की मौत के मात्र दो वर्ष के बाद मेरी मम्मी की भी मौत हो गयी। अभी मेरी उम्र मात्र 15 वर्ष की ही हुई थी। मम्मी-पापा के बाद अब मै अपने चाचा और चची के साथ अच्छे से रहता था लेकिन अचानक से मेरी भी तबीयत खराब होने लगी। मेरा वजन बहुत तेजी से घट रहा था, बार-बार निमोनिया हो रहा था। ज्यादा तबीयत खराब होने के बाद इलाज कराने के लिए अस्पताल गया और वहां पता चला कि मुझे भी एचआईवी है। डॉक्टर का कहना था कि तुम्हें जन्म से ही ये बीमारी है।

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"मुझे ये उस समय पता चला जब मै सही तरीके से इसका मतलब भी नहीं जानता था। उस दिन के बाद से मेरे चाचा-चाची का व्यवहार बदल गया। मुझसे दूर रहने लगे थे, मेरा सारा सामान अलग कर रहे थे, अपने बच्चों से मुझे मिलने नहीं दे रहे थे। अकेला पढ़ने के कारण मैंने अपनी पढ़ाई में मेहनत शुरू कर दी अपने परिवार और रिश्तेदारों से खुद से ही दूरी बना ली।"राजीव ने बताया

भारत में एड्स का पहला मामला 1986 में सामने आया था। यूएन एड्स रिपोर्ट के अनुसार 2016 में भारत में 80 000 नए एचआईवी संक्रमण और 62 000 एड्स से संबंधित मौतें थीं। 2016 में एचआईवी के साथ रहने वाले 2 100 लोग थे, जिनमें से 49% एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी तक पहुंच रहे थे।

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राजीव आगे बताते हैं, "मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में हो गया जहां से मैंने अपनी डिग्री ली है। लखनऊ में एक किराए का घर ले लिया है और उसी में आराम से रहता हूं। चाचा-चाची के व्यवहार में बदलाव को देखकर मैंने किसी को भी नहीं बताया मुझे एड्स है। अब मैं अगर किसी भी एचआईवी क्लाइंट के साथ भेदभाव के लिए खुद लड़ता हूँ। एक सरकारी नौकरी की तलाश है मुझे वो मिलते ही मेरा करियर एक दम अच्छा हो जायेगा।"

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