इस गाँव के लोग अब लड़कियों को कुश्ती सीखने से नहीं रोकते

इस गाँव के लोग अब लड़कियों को कुश्ती सीखने से नहीं रोकतेkushti players 

मेरठ। “मेरे गाँव के लोग कहते हैं कि पहलवानी करना लड़कियों का काम नहीं, बल्कि लड़कों का काम है”, फिर भी मैं रोज सुबह साढ़े पांच बजे उठकर अखाड़ा पहुंच जाती हूँ। अंशु गुर्जर कहती हैं कि मुझे पहलवानी करने का बहुत शौक है, मैं तीन साल से पहलवानी सीखने आती हूँ।

अलका तोमर ने कुश्ती में बनाई है विश्व में पहचान

मेरठ जिले के चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में “रुस्तम-ए-जमां दारा सिंह कुश्ती स्टेडियम” है। इसी स्टेडियम से कुश्ती सीखने वाली अलका तोमर ने मेरठ को विश्व स्तर पहचान दिलाई। वर्ष 2006 में अलका ने पहला कांस्य पदक जीता तो मेरठ की गाँव की लड़कियों में कुश्ती सीखने का जूनून पैदा हुआ। इस स्टेडियम में मेरठ जिले के आस-पास गाँव की सैकड़ों लड़कियाँ प्रतिदिन आती हैं। मेरठ के अलावा महाराष्ट्र, राजस्थान, बागपत, मुजफ्फरपुर तमाम जिलों से लड़कियाँ कुश्ती सीखने के लिए यहां आती हैं।

तब अंशु ने कुश्ती सीखने का लिया संकल्प

हापुड़ जिले से 30 किलोमीटर दूर गोहरा आलमगीरपुर एक गाँव हैं। इस गाँव में रहने वाली अंशु गुर्जर (17 वर्ष) इस समय कक्षा 11 में पढ़ती हैं। अंशु का कहना है कि बचपन से मैं शरारती थी। अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बचपन में खेल-खेल में कुश्ती किया करते थी। जब मैं लड़कों के साथ कुश्ती खेलती तो गाँव के लोग कहते कि कुश्ती खेलना लड़कियों का काम नहीं है। अंशु आगे बताती हैं गाँव वालों की ये बात मुझे परेशान करने लगी और मैंने ये संकल्प लिया कि मैं पहलवानी सीखकर रहूंगी।

25 लड़कियां रोजाना सीखने आती हैं कुश्ती

अंशु का ये जुनून कुछ समय में ही रंग लाया और उसे वर्ष 2015 में जनवरी में जिले स्तर पर गोल्ड मेडल, मार्च 2015 में नेशनल में ब्राउंज मैडल मिला। अंशु का उत्साह लगातार बढ़ता जा रहा है और वह अपनी पढ़ाई छोड़कर पूरे-पूरे दिन स्टेडियम में पहलवानी सीखती रहती हैं। अंशु की तरह इस समय चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के “रुस्तम-ए-जमां दारा सिंह कुश्ती स्टेडियम” में 25 लड़कियाँ और 30 लड़के प्रतिदिन पहलवानी सीखने आते हैं।

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भाई ने बढ़ाया हौसला

स्टेडियम से सात किलोमीटर दूर पछगऊ गाँव में रहने वाली इषिका तोमर (17 वर्ष) का कहना है कि हमें पहलवानी सीखने में हमारे घर वाले हमारा हौसला बढ़ाते हैं। पाँच साल पहले इस गाँव से स्टेडियम आने की शुरुवात मैंने की, पर अब आसपास गाँव की 8-10 लड़कियाँ हमारे साथ जाने लगी। इषिका कहती हैं कि सात साल पहले मेरी बड़ी बहन इन्दू तोमर ने स्टेडियम आने की शुरुआत की थी। इन्दू खुश होकर बताती हैं कि हमारे भाई ने कुश्ती खेलने के लिए हमारा हौसला बढ़ाया।

अब गांव वाले करते हैं सहयोग

अंशु खुश होकर बताती है जब कई अवॉर्ड मिले तो गाँव वाले अब कुछ नहीं कहते और अगर कोई लड़की सीखना चाहती है तो उसका पूरा सहयोग करते हैं। समय के साथ गाँव के लोगों की सोच परिवर्तन हो रही है, लड़कियों को पहलवानी जैसे शौक को पूरा करने के लिए अब ये लोग सहयोग कर रहे हैं।

वर्ष 1983 से “रुस्तम-ए-जमां दारा सिंह कुश्ती स्टेडियम” में हजारों लड़के-लड़कियां को कुश्ती सिखा चुका हूं। मेरी सिखाई अलका तोमर जैसी तमाम लड़कियां है जिन्होंने मेडल जीते हैं। मुझे खुशी होती है जब लड़कियाँ आगे बढ़ती है, खासकर गाँव की। शुरुआत में लड़कियाँ बहुत कम आती थी पर अब लड़के और लड़कियों की संख्या लगभग बराबर रहती है। सुबह साढ़े पाँच बजे से शाम छह बजे तक ये बच्चे स्टेडियम में सीखते रहते हैं।
- डॉ. जबर सिंह सोम, कुश्ती कोच, रुस्तम ए जमां दारा सिंह कुश्ती स्टेडियम

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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