दवाओं के अभाव में अटकी सेहत की गाड़ी

दवाओं के अभाव में अटकी सेहत की गाड़ी

लखनऊ। यूपी के सरकारी अस्पतालों में होम्योपैथिक व आयुर्वेदिक विधा के मरीजों को दवाओं के लिए प्राइवेट मेडिकल स्टोरों से पैसे देकर दवाएं खरीदनी पड़ रही है। प्रदेश के कई जिलों में सरकारी अस्पतालों में संचालित आयुष विंग में पिछले एक वर्ष से दवाओं का टोटा बना हुआ है। दवाओं की कमी की वजह से मरीजों को सिर्फ चिकित्सकीय परामर्श ही मिल पा रहा है। आयुष विंग का यह हाल तब है जब होम्योपैथिक व आयुर्वेदिक विधा की ओर मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

''बिटिया को बुखार आने पर इलाज के लिए अस्पताल आया था। अस्पताल में डॉक्टरों ने देख तो लिया, लेकिन दवा नहीं दी। जब मैंने पूछा तो  बताया कि बुखार की दवा है ही नहीं।" उन्नाव जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर मगरवारा गांव में रहने वाले सुरेश कुमार (32 वर्ष) ने बताया।  

सुलतानपुर जिले के आयुष विभाग में दवाओं की खरीद इस वर्ष नहीं हो सकी है। कुछ ऐसा ही हाल चित्रकूट जिले का भी है। चित्रकूट जिले में इस वर्ष दवाओं की खरीद नहीं हो सकी। पिछले वर्ष की जो भी दवाएं स्टॉक में बची थी उसी से चिकित्सक काम चलाने को मजबूर हैं। चिकित्सकों का कहना है कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को मजबूरन अस्पताल के बाहर की दवाएं लिखी जा रही हैं। कुशीनगर जिले में वर्ष 2013-2014 के बाद से आयुर्वेदिक दवाओं की खरीद नहीं हुई है। यहां के चिकित्सकों का कहना है कि दवाओं की खरीद के संबध में वह कई बार सीएमओ को लेटर लिख चुके हैं लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। ऐसा ही हाल मऊ, सोनभद्र व भदोही का भी है। इन जिलों में बजट मौजूद होने के बाद भी दवाओं की खरीद नहीं की जा सकी। बलिया के किसी भी प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में दवा उपलब्ध नहीं है। 

दवाओं के साथ ही आयुष विंग में चिकित्सकों की भी कमी है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश के 23,458 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 4,276 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 600 जिला अस्पताल में सिर्फ 9,500 आयुष चिकित्सकों को पिछले चार वर्षों में तैनाती दी जा सकी है। जबकि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर 34410 चिकित्सकों की जरूरत है। 

आयुष विभाग में दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता न होने पर आयुष मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉ. आईएम तव्वाब बताते हैं, ''केंद्र सरकार से दवाओं की खरीद के लिए दिसंबर में बजट मिल जाता है। इसके बाद राज्य स्तर से दवाओं की खरीद के लिए मार्च माह तक आदेश आता है। तब तक कंपनी का कांट्रैक्ट रेट न होने व विभाग की ओर से दवाओं की खरीद पर ध्यान न देने से दवाओं का खरीद नहीं हो पाती और दवा का टोटा साल भर बना रहता है।" डॉ. आईएम तव्वाब बताते हैं, ''अगर दवा खरीद की सही नीति शासन स्तर पर बनाई जाए और जरूरत के मुताबिक दवा खरीद की अनुमति सीएमओ को दी जाए तो इस समस्या का निदान निकल सकता है।" वह आगे बताते हैं, ''बदलते दौर के साथ लोगों का होम्योपैथिक व आयुर्वेदिक विधि की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है। आयुष अस्पतालों में हर रोज दो सौ से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। यह मरीज आयुर्वेदिक व होम्योपैथिक विधि से स्वास्थ्य लाभ भी ले रहे हैं। बावजूद इसके शासन की ओर से इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।" 

रिपोर्टिंग - श्रीवत्स अवस्थी

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