मध्‍य प्रदेश में कर्जमाफी का सच: 10 दिन का वादा तीन महीने में भी पूरा नहीं हुआ

10 दिन में कर्जमाफी का वादा किया था कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सरकार बनने से पहले, तीन महीने बाद मुख्यमंत्री मैसेज भेजकर कह रहे, आचार संहिता लग गयी है, अब लोकसभा चुनाव के बाद कर्जमाफी

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   30 March 2019 5:31 AM GMT

मध्‍य प्रदेश में कर्जमाफी का सच: 10 दिन का वादा तीन महीने में भी पूरा नहीं हुआ

इंदौर/उज्जैन/झाबुआ (मध्य प्रदेश)। दस मार्च को मोबाइल पर मुख्यमंत्री के नाम से आए एक मैसेज ने मध्य प्रदेश के किसानों की चिंता के साथ-साथ गुस्सा बढ़ा दिया हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ की ओर से किसानों के मोबाइल में माफी मांगते हुए एक मैसेज आया कि लोकसभा चुनावों की आचार संहिता के कारण कर्जमाफी की स्वीकृति नहीं मिल पाई है। चुनाव बाद शीघ्र स्वीकृति दी जाएगी।

राज्य में कांग्रेस सरकार बनने के 10 दिन के अंदर किसानों की दो लाख रुपए तक की कर्जमाफी के राहुल गांधी के वादे के अनुसार कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दो घंटे बाद ही कर्जमाफी की फाइल पर साइन कर दिए थे। लेकिन इसकी जमीनी हकीकत तो यह है कि लगभग तीन महीने बाद भी ज्यादातर किसानों को कर्जमाफी का फायदा नहीं मिल पाया है। और अब सरकार आचार संहिता का हवाला देकर फिलहाल कर्जमाफी से इनकार कर रही और किसानों को मैसेज भेजकर कहा जा रहा है कि चुनाव बाद यह प्रक्रिया फिर शुरू होगी। मोबाइल पर इस मैसेज के आने से एमपी के किसान गुस्से में हैं और सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हैं।

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"चुनाव से पहले राहुल गांधी ने वादा किया था कि सरकार बनते ही 10 दिन में किसानों का दो लाख रुपए तक का कर्ज माफ होगा। 11वां दिन नहीं होगा। मेरे ख्याल से अब तो तीन महीने होने को आए, लेकिन मेरा कर्ज माफ नहीं हुआ। और अब मुख्यमंत्री कमलनाथ जी का मैसेज आया है। इस हिसाब से तो अब हमें भी कहना चाहिए कि चुनाव आचार संहिता के कारण हम कांग्रेस के बारे में अभी नहीं सोच पा रहे हैं, चुनाव के बाद सोचेंगे।" इंदौर शहर से लगभग 40 किमी दूर ब्लॉक मेहू के गाँव हरसोला के किसान सुनील पाटीदार गुस्से में कहते हैं।


सरकार ने दावा किया था कि प्रदेश के 55 लाख किसानों का कर्ज माफ होगा। ढाई महीने में प्रदेश के 25 लाख किसानों को कर्जमाफी के प्रमाण पत्र वितरित भी कर दिये गए। लेकिन अब प्रक्रिया रूकने से किसान खुद को ठगा महसूस कर रहा है और सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहा है।

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी किसानों के कर्जमाफी के मामले में सरकार को घेरा है। सरकार ने आचार संहिता लगने से पहले ही किसानों से माफी मांग ली कि आपका कर्ज माफ नहीं होगा, सरकार के लोग भगवान से यही प्रार्थना कर रहे थे कि कब आचार संहिता लगे और उनका पीछा छूटे, रविवार 10 मार्च को आचार संहिता से पहले ही किसानों को मैसेज भेज दिए कि अब लोकसभा चुनाव के बाद कर्जमाफी होगी।

किसानों को सरकार की तरफ से भेजे जा रहे ऐसे मैसेज

किसान यह भी आरोप लगा रहे हैं कि दो लाख रुपए तक का कर्ज माफ़ ही नहीं हो रहा। जिला उज्जैन के तहसील नागदा की मंडी में सुबह-सुबह गेहूं बेचने पहुंचे किसान रामसरन कहते हैं, "सरकार ने तो कहा था कि दो लाख रुपए तक का सभी कर्ज माफ़ हो जाएगा। मैंने तो बस 37 हजार रुपए का कर्ज लिया था, उसमें से बस 30 हजार माफ़ हुआ, बाकी के लिए मैसेज आ गया। इससे तो अच्छा था कि यह भी माफ़ नहीं होता।"

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किसानों के मैसेज आने का सिलसिला 10 मार्च की दोपहर से ही शुरू हो गया था जबकि आचार संहिता इसी दिन देर शाम से लगी थी। खेती के साथ-साथ सब्जी का व्यवसाय करने वाले जिला झाबुआ, पेटलावद के किसान राहुल परमार कहते हैं, "जब फॉर्म भरा था तब किसी ने नहीं बताया कि कब तक माफ़ी होगी। जब तीन महीने में माफ़ नहीं हुआ तो अब चुनाव बाद क्या होगा?"

हालांकि कमलनाथ ने छिंदवाड़ा में मीडिया से कहा कि किसानों के कर्जमाफी की प्रक्रिया चल रही है। 50 लाख से ज्यादा किसानों के कर्जमाफी के आवेदन सरकार को मिल चुके हैं। इनमें शुरुआत में राष्ट्रीयकृत बैंकों के 2 लाख 27 हजार, सहकारी बैंकों के 18 लाख 34 हजार, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के 94 हजार किसान हैं, जिनका कर्ज माफ किया जाना है।

किसानों का आरोप है कि सरकार ने ऐसे वादा किया ही क्यों था

"कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में सभी किसानों के दो लाख रुपए तक के कर्ज को माफ करने का वादा किया है, लेकिन सरकार बनने के बाद अब कांग्रेस केवल अल्पावधि कर्ज माफ किया," भाजपा प्रवक्ता डॉ. दीपक विजयवर्गीय एमपी के पत्रकारों से कहते हैं, "कमलनाथ सरकार किसानों को धोखा दे रही है। हम कांग्रेस को मजबूर करेंगे कि वह वादा पूरा करे, अन्यथा हम इसे मुद्दा बनाएंगे।"

मध्य प्रदेश सरकार की मानें तो उनकी सरकार बनने से पहले प्रदेश के 41 लाख किसानों पर 56 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। जबकि अगर इसमें एनपीए (डूबता कर्ज) को मिला दें यह राशि लगभग 70 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच जाती है। ये कर्ज सहकारी, राष्ट्रीयकृत, ग्रामीण और निजी बैंकों से लिए गये हैं। समाचार रिपोर्टस् के अनुसार अगर किसानों के बस फसली ऋण भी माफ होंगे तो सरकार पर 35 से 38 हजार करोड़ रुपए का भार पड़ेगा।

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