कैंसर के वैकल्पिक इलाज कितने भरोसेमंद

कैंसर के वैकल्पिक इलाज कितने भरोसेमंदगाँव कनेक्शन

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के उत्तर-पश्चिम में 300 किमी दूर कासगंज ज़िले में गंगा के तट पर स्थित है अमीर खुसरो की जन्मभूमि पटियाली। लेकिन आज पटियाली पंचायत की पहचान खुसरो नहीं किसी और व्यक्ति से होती है।

यहां के पटियाली बाबा का आश्रम हमेशा कौतुहल का विषय बना रहता है। पूरे उत्तर प्रदेश और आस-पास के राज्यों से अथाह संख्या में मरीज़ और तीमारदार रोगों से मुक्ति पाने के लिए आश्रम में जमा होते हैं। मान्यता है कि इस साधू के सत्संग में रोगों को दूर करने की चमत्कारिक शक्तियां हैं।

दिल्ली में कई वर्षों से घरेलू सहायक के तौर पर काम कर रहीं कानपुर की आशा देवी (37 वर्ष) जिस घर में काम करती हैं, जब उस घर की 28 वर्षीय लड़की को कुछ समय पहले ही तीसरी बार कैंसर हुआ, तो आशा ने लड़की को पटियाली बाबा के पास ले जाने की सलाह दी।

''लड़की को कुछ साल पहले कैंसर हुआ था, उसके बाद दिल्ली, मुम्बई और बैंगलोर में कई बार इलाज करवा चुकी है। लेकिन इस बार जब दोबारा कैंसर हुआ तो मैंने लड़की की मां को पटियाली बाबा के पास ले जाने को कहा। आश्रम के प्रसाद और जल में ऐसे गुण हैं जो किसी भी रोग को ठीक कर सकते हैं। वहां की सत्संग की धुन में भी चमत्कारिक शक्तियां हैं,’’ आशा आगे बताती हैं, ''हमारे गाँव के दो लोगों को कैंसर था, वो आश्रम जाकर बिना किसी सर्जरी या डॉक्टरी दवा के बिलकुल ठीक हो गए हैं।’’

देश में सीमित जानकारी, जागरूकता की कमी, अच्छे इलाज के लिए अस्पताल और पैसे कम होने के चलते बहुत से कैंसर के मरीज़, खासकर ग्रामीण इलाकों के मरीज़ ऐेसे 'वैकल्पिक इलाजों’ का रुख करने लगे हैं। 

गुडग़ाँव के सोहना के पास स्थित नुह गाँव की निवासी प्रीति (25 वर्ष) का एक बच्चे को जन्म देने के बाद अचानक वजन कम होने लगा। गुडग़ाँव के डॉक्टरों ने ट्यूमर होने का अनुमान लगाया। ट्यूमर शरीर के किस भाग में इस बारे में प्रीति को कोई जानकारी नहीं थी, ऐसे में डॉक्टरों ने उसे बायोप्सी कराने की सलाह दी। लेकिन उसके पिता अड़ गए, ससुराल वालों के विरोध के बाद भी वे प्रीति को लेकर राजस्थान के बालाजी मंदिर में 'झाड़ा’ करवाने गए। ''आज वो बिलकुल ठीक है, हमें और क्या चाहिए? अस्पताल लेकर जाते तो डॉक्टर कहते ऑपरेशन करो,’’ पिता सतीश सिंह ने कहा।

कैंसर का वैकल्पिक इलाज खोज रहे इन मरीजों में से बहुत से लोग कई तरह के इलाज करवा चुके होते हैं। इनमें आधुनिक अस्पतालों से कीमोथेरेपी, रेडिएशन से इलाज और सर्जरी तक शामिल हैं। लेकिन जैसे ही ये बीमारी बढ़ती है धीरे-धीरे इलाज के तरीके बहुत जटिल होते जाते हैं। इस वजह से बहुत से कैंसर मरीज़ों के आगे वैकल्पिक इलाज खोजने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के कर्मचारी अशोक कुमार (57 वर्ष) को जब 2010 में ब्रेन ट्यूमर होने का पता चला, तो उन्होंने गुडग़ाँव के मेदांता अस्पताल में रेडिएशन कीमोथेरेपी इलाज पर तीन-चार लाख रुपए लगा दिए। लेकिन उसके बाद भी जब उनकी स्थिति ज़्यादा बिगड़ी तो उनका परिवार उन्हें हरियाणा के भिवाड़ी में रहने वाले '100 साल के बाबा’ के पास ले गया। 

कुमार को एक 'खास तुलसी’ की पत्तियां, गाय के दूध के साथ शहद और मालिश करने के लिए एक तेल दिया गया। ''बाबा बात नहीं करते हैं। उनके सहायक सारी चीज़ें समझाते हैं। दो-तीन महीनों की दवाईयों की कीमत 500 रुपए होती है,’’ कुमार के बेटे ध्रुव ने 'गाँव कनेक्शन’ रिपोर्टर को बताया। न शरीर की जांच हुई, न ही नब्ज़ जांची गई। दवाईयां बस 'रिपोर्ट और मरीज़ को देखकर’ ही दे दी जाती हैं।

हालांकि पश्चिमी इलाज की पद्घति कोई भी दर्ज साक्ष्य न होने के चलते इन वैकल्पिक इलाजों को नहीं मानती, पर धु्रव का मानना है कि वैकल्पिक इलाज से उसके पिता को आखिरी समय में थोड़ा आराम मिल गया था। परिवार भी सेहत बीमा न होने के कारण लगातार वित्तीय दबाव झेल रहा था। ''कीमोथेरेपी से हमें कोई आशा नहीं थी और खर्च भी बहुत बढ़ता जा रहा था। इसलिए ये हमारे लिए आखिरी विकल्प बचा था, जिसने बहुत मदद की।’’ वर्ष 2011 में कुमार की मृत्यु हो गई। 

ऐसे लोग भी हैं जो आधुनिक पश्चिमी पद्घतियों से इलाज कराने के बाद भी, बीमारी को दोबारा होने से रोकने के लिए वैकल्पिक इलाजों का सहारा लेते हैं।

उत्तर प्रदेश के गाजि़याबाद के निवासी मृणाल स्टेज-1 के रक्त कैंसर से पीडि़त थी और दिल्ली के एम्स अस्पताल में इलाज करवाया था। इलाज के लिए उसे कीमोथेरेपी के छह चरण और रेडिएशन यानि विकिरण से इलाज के 15 चरणों से गुज़रना पड़ा था।

''लेकिन मैं डरी हुई थी और इस बात को भी पक्का करना चाहती थी कि कैंसर वापस न आए,’’ मृणाल ने गाँव कनेक्शन को बताया। इसलिए मृणाल हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित मैकलोड़ गंज में डॉ येशी ढोंडेन के पास गई।

डॉ ढोंडेन एक नब्बे वर्षीय महंत हैं, जो दलाई लामा के व्यक्तिगत चिकिल्सक हुआ करते थे। इन्होंने ही भारत में तिब्बती चिकित्सा पद्घति को स्थापित किया है। कुछ वर्षों पहले सेवानिवृत्त होने के बाद डॉ ढोंडेन ने जोगीवारा रोड पर अपना खुद का क्लिनिक खोला। हर सुबह क्लिनिक के सामने, उत्तर भारत के राज्यों जैसे- पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा आदि से आए मरीज़ों और उनके तीमारदारों की लंबी कतार लगती है। कैंसर विशेषज्ञ माने जाने वाले डॉ ढोंडेन मरीज़ों का इलाज दिन के पहले मूत्र और नब्ज़ की जांच के आधार पर करते हैं। इनके इलाज में खान-पान पर भी बहुत अंकुश लगाने को कहा जाता है। मांस, कोल्डड्रिंक, कुछ फल और तेल खाने-पीने की बिलकुल मनाही होती है। 

''उनसे (डॉ ढोंडेन से) इलाज कराकर लोग बहुत अच्छा महसूस करते हैं। मैं पिछले एक महीने से ही उनसे इलाज करवा रही हूं, लेकिन मैं अभी से ही बहुत अच्छा महसूस कर रही हूं,’’ मृणाल ने कहा।

वैकल्पिक दवाईयों को आधुनिक चिकित्सा पद्घति का प्रयोग करने वाले बहुत कम विशेषज्ञों का ही समर्थन मिलता है। मुम्बई के जसलोक अस्पताल में कार्यरत देश के सबसे मशहूर कैंसर विशेषज्ञों में से एक डॉ सुरेश अडवानी ने बताया कि कैंसर के वैकल्पिक इलाजों के फायदे या नुकसान को लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता। ''इनका कोई तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं है जिसके आधार पर इनकी तुलना पश्चिमी दवाईयों से की जा सके।’’

हालांकि मैकलोडग़ंज में ही स्थित सी-खांग अस्पताल के डॉ तेंजि़ंग इस बात को गलत बताते हैं। उनके अनुसार, बहुत सी वैकल्पिक पद्घतियां 'प्राचीन विज्ञान’ और उसमें दर्ज 'लंबे शोधों के ज्ञान’ पर आधारित होती हैं। ''ये दिमागी ताकत को दवाईयों और अच्छे खान-पान के साथ जोड़ती हैं। जैसे-जैसे हम इसमें जांच के आधुनिक तरीकों जैसे-खून की जांच, एक्स-रे, एमआरआई आदि जैसी तकनीकों को प्रयोग कर रहे हैं, ये और परिष्कृत होती जा रही है। आधुनिक जांचों से मिली बीमारी का इलाज हम अपनी हर्बल दवाईयों से करते हैं, हम जानते हैं कि हमें दोनों पद्घतियों को साथ लेकर चलना होगा।’’ आयुर्वेद के जानकार डॉ संजय सेहरा का मत है कि तुरंत इलाज के लिए ज़रूर एलोपैथी उम्दा है लेकिन आयुर्वेद जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा देता है। ''कैंसर के मरीज़ का आखिरी समय बहुत तकलीफदेय होता है और आयुर्वेद उसी को कम करने की कोशिश करता है।’’

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