एक्टर पंकज त्रिपाठी: चिड़िया चाहे जितना भी उड़ ले, उसे लौटना तो अपने घोसले में ही है

एक्टर पंकज त्रिपाठी: चिड़िया चाहे जितना भी उड़ ले, उसे लौटना तो अपने घोसले में ही है

पिछले दिनों बॉलीवुड अभिनेता पंकज त्रिपाठी जब लखनऊ आए तो उनके और देश के सबसे चहेते स्टोरीटेलर नीलेश मिसरा के बीच गाँव कुनौरा में बतकही का एक रोचक दौर चला। 'स्लो इंटरव्यू विद नीलेश मिसरा' ने पंकज त्रिपाठी ने अपने गाँव के बारे में कई बातें की। यह इंटरव्यू स्लो है, लेकिन ये आपको अपने अतीत में ले जाएगा, आपके संघर्षों की कहानी भी खुद-ब-खुद इससे जुड़ जाएगी। हाल में आपने इस इंटरव्यू का पहला भाग पढ़ा, पेश है इंटरव्यू का दूसरा भाग...

नीलेश मिसरा : अपने परिवार के बारे में बताइए...

पंकज त्रिपाठी : हम चार भाई-बहन हैं, मैं सबसे छोटा हूँ।

नीलेश मिसरा : तो गंभीरता से नहीं लिए गए कभी?

पंकज त्रिपाठी : ना.. नहीं।

नीलेश मिसरा : छोटे भाइयों को इस बोझ का निर्वहन करना पड़ता है।

पंकज त्रिपाठी : वैसे भी मैं खेलने-कूदने में ज्यादा मशगूल रहता था।

नीलेश मिसरा : क्या-क्या?

पंकज त्रिपाठी : मैं खो-खो अच्छा खेलता था; चिकटहारी एक खेल है हमारे गाँव का उसमें बढ़िया था; धावक बहुत अच्छा था 100 मीटर में; हाई जम्प में भी बढ़िया था, सब खेल, खेल में नम्बर वन था मैं और पढाई में नम्बर टू। पूरी जर्नी मैं सेकेंड रहा, कभी फर्स्ट नहीं आया हूँ लाईफ़ में।

बड़ी सुंदर सड़क है। अब देखिये आपके इलाके में इसकी खेती बड़ी जबर्दस्त होती है, सिंघाड़ा की।

मैं परसों इसकी सब्जी खाया, मुझे पता नहीं था इसकी सब्जी भी बनती है और बड़ी कमाल की सब्जी थी वो।



नीलेश मिसरा : अब मुझे बड़े शहरों में जाना अच्छा नहीं लगता है। वहाँ दो-तीन घंटे में आप अँधेरी से टाउन पहुँच पायेंगे, मैं लखनऊ से बॉम्बे पहुँच जाऊँगा। आप मुझे बोलें कि कल सुबह दस बजे मीटिंग करते हैं, मैं पहुँच जाऊँगा। लेकिन मुझे अपना विस्थापन नहीं करना पड़ेगा उसके लिए। और एक ये है मैं एक नये चश्मे से देखने लग गया हूँ लोगों को कि सामाजिक सरोकार कितना है लोगों का। आप बड़े-बड़े एक्टर्स हैं, बड़े-बड़े सिंगर्स हैं, राइटर्स हैं, क्रिएटिव फ़ील्ड में हैं, लेकिन वो...

जैसे हमारी जो मंडली है उसमे मैं कह रहा था कि... हमने जब शुरुआत की इस सफर की, लिखने की, कहानियाँ सुनाने की तो हम अपना बहुत कुछ लेके आये, जो मंडली होती है बहुत कैथारसिस होती है उसमें, लोग अपना बहुत कुछ बतातें हैं, अपनी पर्सनल चीजें बताते हैं, और वही आप लिसनर को सौंप रहे होते हैं। और आप पाते हैं कि ये तो लिसनर की भी थाति है। यही तो जीवन उसी ने जिया है, तभी तो वो रिलेट करता है उससे।

लेकिन मैंने कहा कहीं ऐसा तो नहीं है कि कहनियाँ लिखते-लिखते आप थोड़ा बाजार की ओर हुए जा रहे हो। आप ये नहीं सोच रहे हो कि आप क्या लिखना चाहते हो, बल्कि ये सोचने लगे हो कि वो क्या पसंद कर सकता है। मैंने हाल ही में एक राइटर को पूछा कि रोती हो? किसी को तकलीफ में देखती हो तो दुःख होता है? मैंने कहा मुझे होता है।

मैंने ये पिछले सालों में देखा है कि जो इस मास्क के पीछे हम छिपे रहते थे... मेरे कभी आंसू नहीं आते थे पहले। एक बार दो प्लेन टकरा गये थे सउदी अरब और दादरी में, उस खेत में मैं चला जहाँ कटे हुए हाथ पड़े थे, और कारगिल का युद्ध कवर किया, सुपर साइक्लोन कवर किया। इतनी जीजिविषा, इतनी तकलीफ देखी मैंने लेकिन रोना नहीं आता था।

जब ये कहनियाँ सुनानी शुरू की तो अब मैं कई बार कहानी सुनाते-सुनाते एंड में मेरा गला रुंध जाता है। रिकॉर्डिंग रोकनी पडती है। एक दिन मैंने देखा कि मैं बच्चों का एक शो देख रहा था गाने का, होटल में अकेले बैठा था। अकेले बैठने को भी कम मिलता है आजकल, आप इतना साराउंडेड हैं कि अपने साथ तो वक्त ही नहीं बिता पाते। वो देख रहा था कि मेरी आँखों में आंसू आ गये, मैंने कहा ये क्या? मुझमे क्या बदलाव आ गया? तो आप जब अपने आप को देखते हैं तो आपको शहर ने कुछ और बना दिया या आपके अंदर अब भी एक संवेदनशील इंसान जिन्दा है? आप आत्म निरीक्षण कर पाते हैं इस बात का?

पंकज त्रिपाठी : इतनी अद्भुत आप बोले हैं ना अभी! बिल्कुल! शहर ने मुझे नहीं बदला है और मैं बहुत साधारण से साधारण बातों पर रोता हूँ। और कलाकार का जो जन सरोकार है न, वो मेरे लिए सबसे प्राइमरी चीज है कि आखिर मेरी जरूरत क्या है समाज को? सिर्फ़ मनोरंजन करना हमारा काम है क्या या सिर्फ़ हँसाना, सिर्फ़ रुलाना हमारा काम है क्या? उसके सिवाय भी आपके अंदर एक-एक...

मैं थिएटर किया; थिएटर ने, अभिनय ने मुझे एक्टर कितना बड़ा बनाया पता नहीं, मुझे आदमी अच्छा बनाया। और सारी कलाओं का मुझे लगता है, कोई भी आर्ट फॉर्म हो, क्रिएटिव काम हो, राइटिंग हो, स्टोरीटेलिंग हो, पेंटिंग हो, जो आदमी कर रहा होता है वो खुद ग्रो कर रहा होता है। हम एक्स्प्लोर करते हैं। मुझे जब रोना आता है, कुछ लोग छुपाते हैं, अरे अरे औरत है? मैं बोलता हूँ नहीं, मैं बिल्कुल हूँ औरत।

मुझे कोई दिक्कत नहीं है औरत होने में, वो तो हमसे ज्यादा इवोल्व हैं थोड़ी, हम तो पीछे हैं अभी।



कल शूटिंग में कुछ चेहरे आये थे। मैं देख रहा था बाकी लोग हैंडल कर रहे थे। मैं बोला यार मैं जिस तरीके से इस आदमी के चेहरे को देख पा रहा हूँ, मुझे उसके हर झुर्रियों में न एक अनुभव दिख रहा था, मुझे लग रहा था क्या सच में हमारा भारत बहुत आगे चला गया है, इस व्यक्ति को हम पीछे छोड़ दिए हैं क्या? इस भारत को आगे ले जाने के चक्कर में। उस आदमी के चेहरे की झुर्रियां, वो सवाल उनका... मैं व्यथित होता हूँ देखकर उन चेहरों को और तकलीफ होती है। तब मुझे लगता है ठीक है, चूँकि हमारा काम है सवेंदना का, हम इकलौते दुनिया के श्रमिक हैं।

एक कलाकार इकलौता श्रमिक होता है जो इमोशनल मेहनत भी करता है। शारीरिक मेहनत, मानसिक मेहनत सब करते हैं लेकिन हम इमोशनल मेहनत भी करते हैं। बेवजह रोना, हँसना, गाना, तो हम जब तक अपनी संवेदनाओं को बिल्कुल जागृत अवस्था में नहीं लायेंगे नहीं होगा। आये दिन लोग बोलते हैं सेंसिटिव एक्टर है। सेंसिटिव एक्टर क्या है? कुछ नहीं, हम सुनते हैं। आप बोल रहे थे, मैं आपको सुन रहा था और महसूस कर रहा था, हम देखते हैं।

मैं गाँव में जाता हूँ और मैं गिरते हुए सुबह के कोहरे को दो घंटे देखता हूँ, सिर्फ़ कोहरे को। मुझे लगता है बॉम्बे में तो नहीं देख पाता हूँ, यहाँ देखकर क्या मिलता है मेरे को नहीं मालूम, मुझे नहीं पता। मैं चिड़िया बैठी है उसे देखने लगता हूँ। अभी भरतपुर में था, यहाँ बहुत चिड़ियाँ आती हैं आपके इलाके में, गाँव में। बगुले पचासों उड़के गीले खेत में बैठते हैं मैं उनको देखता हूँ। और मैं घंटों देख सकता हूँ। मुझे नहीं मालूम क्या मिलता है उससे।

तो एंड ऑफ दी सारी लड़ाई वहीं है हमारी, बेहतर इंसान बनने की। हम अंदर से आदमी बने हैं तो क्या हम वापिस बन्दर बनना चाहेंगे? हमने बहुत सी चीजें बना ली, देश बना लिया, धर्म बना लिया। ऑक्सीजन कहाँ बंट पाया वो तो एक ही है ना, और कलाकार इसीलिए, हम तो हमारा तो कंसर्न ही बड़ा लार्जर होता है। हम तो पूरे समाज, पूरी मानव प्रजाति की बात करते हैं।

नीलेश मिसरा : ये मेरे लिए बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है क्योंकि हम जब कंटेंट देखते हैं, जो आ रहा है, रेडियो पर या टीवी पर, जो ये त्वरित फायदे वाला कंटेंट बनता है, जिसमें आप चाहे महिलाओं का मजाक बना सकते हैं, स्टीरियोटाइप कर सकते हैं लोगों को, जो आज से दो साल बाद, तीन साल बाद जिन्दा नहीं रहेगा। तो हम विरासत क्या छोड़ रहे हैं? एज़ कंटेंट क्रिएटर्स जब हम मुड़कर देखेंगे, अगर कल सुबह हमारे जीवन का अंत हो जाये तो क्या हम खुश हैं? क्या हमें गर्व है कि हमने जो बनाया उससे दस बच्चों को कुछ नया सीखने को मिला या नहीं? या सिर्फ़ बच्चों को गाली बोलना सिखाया है, लड़कियों को छेड़ना सिखाया है।

पंकज त्रिपाठी : वो हमारा बनाया हुआ कंटेंट समाज के हित में कितना काम किया?

नीलेश मिसरा : बिल्कुल...

पंकज त्रिपाठी : या जो लिगेसी हमें मिली है, हमने उसको आगे तक कैरी फारवर्ड थोड़े सुधार, थोड़े बेहतर रूप में किया क्या? क्योंकि हो सकता है हमें थोड़ी कुरीतियाँ भी मिली हों, तो हमने करेक्ट करके आगे बढ़ाया या नहीं। ये तो है कि क्षणिक फायदे के लिए आप कुछ भी कर लो। मैं बोलता भी हूँ अक्सर कि जरूरी नहीं हर पॉपुलर चीज बेहतर भी हो। हमें पॉपुलर के पीछे नहीं भागना है कि भई ये प्रचलित हैं, पॉपुलर हैं तो इन्हीं को सुना जाये या इन्हीं को देखा जाये। मेरा मानना है कि बतौर नागरिक, बतौर अभिनेता मेरी क्या जिम्मेदारी है समाज के प्रति, खुद के प्रति। हाँ मेरी ये भी जिम्मेदारी है कि मेरा घर-परिवार खुश रहे। मुझे आन्दोलन नहीं करना है, बिल्कुल कॉमर्शियल सिनेमा का हिस्सा बनूंगा, करूँगा। पैसे मिलते हैं, मेरी बीवी, मेरे बच्चे जो हैं ठीक जगह पढ़ें, उनको जो इच्छा हो, मन करे वो करें। लेकिन उसी समय पर मैं अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भी जानता हूँ और पूरी तरह कोशिश करता हूँ कि उसका निर्वहन हो, ईमानदारी के साथ हो। देशभक्ति क्या है? जो व्यक्ति को जिम्मेदारी दिख रही है उसका वो ईमानदारी से पालन करे। मैं बतौर अभिनेता अपनी जिम्मेदारी निभाऊं कि मुझे ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनना है जिनमें एक बात भी हो। जो समाज में कहीं न कहीं से व्यंग्य भी करे, शिकायत करे कि बाबा देखिये ये गड़बड़ी है आप लोग थोड़ा क्रॉस चेक कर लीजिये।

नीलेश मिसरा : जो बात नहीं कही जाती है वो कही जाए।

पंकज त्रिपाठी : बिल्कुल वो बात कही जाये।


नीलेश मिसरा : आप कैसे पिता हैं?

पंकज त्रिपाठी : मैं बड़ा अच्छा पिता हूँ। मेरी एक बेटी है अभी 12 साल की है।

नीलेश मिसरा : क्या नाम है उसका?

पंकज त्रिपाठी : आश्वी नाम है। मेरी जर्नी जो है, मतलब मैं गाँव में भी रहा हूँ, शहर में भी। मैंने अपनी बहनों के लिए लड़का ढूंढते जो होता है, वो देखा है। जैसे अभी दिवाली के बाद, वो सीजन आ गया। हमारे गाँव में जो लड़की के पिता हैं वो निकलेंगे सुयोग्य वर की तलाश में। मेरे बाबूजी कई बार दूसरे की साइकिल पर बैठकर जाते थे। मेरे पिताजी को साइकिल चलानी आती ही नहीं है, सीख ही नहीं पाए वो। तीन-तीन, चार-चार दिन सुयोग्य वर ढूंढने में निकल जाते थे उनके। वो घर से बाहर हैं। इस गाँव से उस गाँव, उस गाँव में एक लड़का है इस तरह से। तो मैं वो दुनिया भी देखा हूँ और बरेली की बर्फी टाइप की भी दुनिया देख रहा हूँ, रेड कारपेट की भी दुनिया देख रहा हूँ। तो हमारा बाप जो है वो सब गाँव, शहर, कस्बा सबका मिला हुआ रूप है, वो थोड़ा ज्यादा प्रोग्रेसिव है।

नीलेश मिसरा : एक वक्त था जब मैं अपने आप से सवाल पूछता था कि क्या मैं एक अच्छा बेटा बन पाया? क्या आप एक अच्छे बेटे बन पाए?

पंकज त्रिपाठी : आई थिंक हाँ। क्योंकि इतना समय दिया मैंने। वैसे ये सेल्फ सर्टिफिकेट देना हो जाएगा यदि मैं दूं तो। ये सवाल मेरे माँ-बाप से ज्यादा उचित रहेगा। वो बता पाएंगे कि मैं कैसा बेटा बन पाया। सारी आपाधापी के बावजूद हर तीन महीने से मुझे गाँव पहुंचना ही पहुंचना है। मैं अभी यहाँ शूटिंग में आने से पहले उनके साथ चार दिन रहकर आया हूँ।

नीलेश मिसरा : ये बड़ी उपलब्धि है। हमारे माता-पिता तो पाँच मिनट की दूरी पर रहते हैं और उनको उस अपार्टमेंट से जहाँ वो रहते हैं, हमारा जो नया घर हमने बनाया है वहाँ पर लाना ये निरंतर होती लड़ाई है। कभी तनातनी हो जाती है। उनका अपना कमरा, अपनी अलमारी सब सेट है लेकिन नहीं! अपरूट होना पेरेंट्स कई बार नहीं चाहते हैं। अपने पड़ोसी, अपने दोस्त नहीं छोड़ना चाहते।

पंकज त्रिपाठी : हाँ, उनको अपरूट करना उनकी चाहत के बगैर वो भी अत्याचार ही है। वो जहाँ सहज हैं, कंफर्टेबल हैं वहीं रहने दीजिये। आप ही पहुँच जाओ उनके पास, मिल लो।



नीलेश मिसरा : ये रेड कारपेट की दुनिया के बारे में बताइए। न्यूटन वगैरह के बाद जब आप गये...

पंकज त्रिपाठी : सर हिन्दुस्तान के बाहर जब जाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है फिल्म फेस्टिवल में। जैसे बर्लिन में गया। बड़े अच्छे लोग हैं। वहाँ जाकर ऐसा लगता है कि सिनेमा कुछ बड़ा काम है यार। ये सच में इतना आसान काम नहीं है।

वो चिड़िया को देखिये, उसका साइज़। कैसे प्लेन की तरह हाइट कम करते-करते वहाँ लैंड करने जा रही हैं। वहाँ है उनका कुछ शायद!

नीलेश मिसरा : वाह! फ्राइडे को मैं यहीं आ जाता हूँ। बेटी को पिक-अप करता हूँ स्कूल से और फ्राइडे, सैटरडे, सन्डे तीनों दिन यहीं।

नीलेश मिसरा : तो अब हम मेरे घर में हैं, गाँव के घर में, कैसा लगा आपको?

पंकज त्रिपाठी : देखिये क्या है न कुछ छोटे-छोटे सपने होते हैं, मतलब आदमी सोच लेता है कभी अचानक, अनायास। मैंने बड़ी स्ट्रॉन्गली सोच लिया था कि इन टाइल्स पर बैठूँगा एक दिन। और ये मुझे कल रात को दस बजे तक पता नहीं था कि मैं अगले ही दिन, चौबीस घंटों के भीतर ही बैठने वाला हूँ। आपकी बच्ची वैदेही की मैंने फोटो देखी उसके दोस्तों के साथ, तो मुझे ना ये हरियाली देखते ही अपना गाँव याद आ गया। मुझे लगा ये आपका गाँव है किधर, मुझे जाना है। और ये टाइल्स जो मैं बोल रहा हूँ, ब्लैक एंड व्हाइट, ये बंगाल के पुराने घरों में दिखता है, तो था मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट। आज मेरा यहाँ आना मतलब उन अथाह चाहतों में से एक छोटी सी चाहत पूरी हुई है।

नीलेश मिसरा : कुछ कुरेदा है आपके अंदर क्योंकि अब; तो आप अपने गाँव का घर कब बना रहे हैं।

पंकज त्रिपाठी : हम अब... घर तो है ही, हमारे गाँव का...

नीलेश मिसरा : तो गाँव वापिस जाना, घर वापिस जाना...

पंकज त्रिपाठी : घर वापसी...

नीलेश मिसरा : हाँ घर वापसी

पंकज त्रिपाठी : हाँ हम सबकी लाइफ यही होती हैं न। वो चिड़िया चाहे कितनी ही उड़ले, कहीं उड़ले; अंत में तो उसे अपने घोंसले में ही लौटना है। हम वही चिड़िया हैं जो इधर-उधर उड़ रहे हैं। आना तो अंत में वहीं हैं, जिस मिट्टी से बने हैं उस मिट्टी में फ़ना होना है।

नीलेश मिसरा : आगे आप अपनी लाइफ अपना कॅरियर कैसे देखते हैं? अपने आपको कलाकार के नाते कैसे शेप करना चाहते हैं?

पंकज त्रिपाठी : मैं बतौर अभिनेता चाहता हूँ कि मुझे मेरे काम से ही याद किया जाये और बतौर एक्टर आपकी एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है, सामाजिक सरोकार होता ही है क्योंकि हम रंगमंच से गये हैं और इसीलिए मैं सिक्स पैक और बॉडी बिल्डिंग पर इतना ध्यान नहीं देता हूँ क्योंकि मेरा काम विचारों वाला है। विचार बनने चाहिए, तो सिनेमा में मुझे उसी तरह से याद किया जाये। मैं कुछ मनोरंजक फ़िल्में भी करूँ और मनोरंजन के साथ-साथ उसमें एक विचार भी हो। हर कहानी में एक मकसद तो होता ही है। बिना मकसद के तो कहानी बनेगी ही नहीं, तो चाहते हैं कि वैसे कुछ सिनेमा का हिस्सा बनें जो बात भी करे, जो बात समाज के लिए, आने वाली पीढ़ियों के लिए हितकारक हो।

नीलेश मिसरा : डायरेक्ट करना चाहते हैं?

पंकज त्रिपाठी : हाँ मैं डायरेक्ट भी कर सकता हूँ। अच्छा अभी एक चीज मेरी बहुत लोगों को नहीं मालूम है, मैं खुद भी एक बहुत बढ़िया स्टोरीटेलर हूँ।

नीलेश मिसरा : अरे वाह!

पंकज त्रिपाठी : मेरे पास अथाह कहानियाँ हैं गाँव की। रेणु जी इसीलिए मुझे पसंद हैं। मेरी सास एक हैं वो भी एक बहुत अच्छी स्टोरीटेलर हैं। एक कहानी को मैं चार महफ़िलों में सुनाता हूँ, तो कोई एक बन्दा गलती से मिल गया जिसने पहली महफ़िल में सुनी थी और तीसरी में मिल गया। वो कहता है नहीं नहीं वहाँ तो ऐसे हुआ था। मैंने कहा अच्छा कहाँ? तो वो बोला वो वहाँ तुम सुनाये थे। मैंने कहा अच्छा ओके, तो मेरी कहानियाँ ना ऑडियंस पर डीपेंड होती हैं कि अगर मैं बुद्धिजीवियों के बीच बैठा हूँ तो कहानी को वैचारिक बना दूंगा। पहलवानों के बीच बैठा हूँ तो कहानी को ताकतवर बना दूंगा। अगर ह्यूमर पसंद वाली ऑडियंस है तो ह्यूमर वाले एलिमेंट थोड़े ज्यादा हो जायेंगे।

नीलेश मिसरा : क्या आप स्टोरीटेलर को स्टोरी सुनाना चाहेंगे?

पंकज त्रिपाठी : ऐसी बहुत सारी कहानियाँ हैं। एक ना मेरे अपने गाँव से सात किलोमीटर रत्नसराय एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है। जहाँ से छोटी लाइन की गाड़ियाँ चलती थीं पहले, अब बड़ी लाइन शुरू हो गयी इस साल से, तो उसमें हम लोग बैठकर जाते थे थावे-बरौनी एक ट्रेन हुआ करती थी। जो सुबह साढ़े तीन बजे आती थी, थावे से लेकर बरौनी तक जाती थी, हाजीपुर मुझे उतरना था, पटना जाने के लिए, तो घर से सुबह तीन बजे, चार चालीस की ट्रेन होती थी तो तीन बजे मैं बाबूजी, साइकिल पर थोड़ा चावल, गेहूँ, दाल, सरसों का तेल दो लीटर घर का, लादकर बाबूजी और हम साइकिल पर ऐसे पैदल-पैदल सात किलोमीटर चले गये स्टेशन, ट्रेन पकड़ी। ट्रेन में बामुश्किल एक बोगी के अंदर दो ही बल्ब जलते थे। या तो एक बीच में एक उस दरवाजे पर या पिछले दरवाजे पर और चार चालीस पर थोड़ा अँधेरा रहता ही है। उस कम रोशनी वाले लोकल ट्रेन में जिसमें पूरा कम्पार्टमेंट लकड़ी का है, गद्दा नहीं होता था स्लीपर्स पर, लकड़ी के बेंच होते थे दो नीचे दो ऊपर। उनमें सफ़र करते थे हम। बीच में कोई मूंगफली वाला आ गया, कैसे-कैसे लोग आ गये, कोई बकरी लेकर चढ़ गया, कोई साइकिल लेकर चढ़ गया। साइकिल को ऐसे पलट कर उधर खिड़की पर हैंडल फँसा दिया, रुमाल से बाँध दिया, तो कितने किस्से दिखते थे उस ट्रेन की यात्रा में। बहुत...

मैं चाहता हूँ मैंने जो अनुभव किये हैं मेरी बेटी को वो सारे अनुभव करवाऊं, उसको वो दुनिया दिखा दूँ। सारे बच्चों को वो अनुभव होना चाहिए जो हमारे आपके पास है। जैसे हम अभी स्कूल में भी बात कर रहे थे कि हमने यहाँ की भी जिन्दगी जी ली, अनुभव देख लिया। हम बाहरी दुनिया में, फिल्म फेस्टिवल में जाते हैं तो वो भी देख लेते हैं। जैसा अक्सर मुझे लगता है कि हमारे देश में साउंड पॉल्यूशन, ये हॉर्न बजाने की समस्या खत्म हो जाएगी अगर हर भारतीय को हम यूरोप में या सिंगापुर घूमने भेज दें कि तुम एक हफ्ते इस कंट्री में रहो, और उन्हें ये रियालाइज होगा कि अरे यार क्यूँ मारते हैं हम लोग इतना हॉर्न?

नीलेश मिसरा : कोई पैदल जा रहा है उसके लिए इतनी इज्जत... आप रोक देंगे, आप लाइट के गुलाम नहीं हैं। अगर पैदल जा रहा है तो आप रोक देंगे, उसका अधिकार है ये।

पंकज त्रिपाठी : मुझे लगता है घूमना भी ना... हम संसार में घूमते हैं तो बहुत कुछ सीखते हैं, तो वही जो अनुभव हमारे आपके पास में हैं, मैं चाहता हूँ कि मेरी अपनी बेटी या दूसरे बच्चों तक भी पहुँचे वो।

(प्रस्तुति: दीक्षा चौधरी)



इंटरव्यू का पूरा वीडियो देखिए यहां -



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