ज्ञानी चाचा से जानिए कम समय में मेंथा की खेती से ज्यादा उत्पादन का तरीका

लखनऊ। ज्ञानी चाचा और भतीजा के भाग में चाचा अपने भतीजे को मेंथा की खेती का गणित समझा रहे हैं, कि कैसे कम समय में मेंथा से ज्यादा उत्पादन ले सकते हैं।

ज्यादातर किसान मेंथा की बुवाई मार्च-अप्रैल के महीने में करते हैं, लेकिन अब अगेती मिंट तकनीक से जनवरी महीने में मेंथा की नर्सरी कर फरवरी में ही मेंथा की रोपाई कर सकते हैं।

मेंथा उगाने की 'अगेती मिंट' पद्धति को इस्तेमाल करके किसान अभी से पॉलीथीन से ढ़ककर कृत्रिम गर्मी से 20-25 दिन में नर्सरी तैयार कर सकता है और फिर फरवरी में ही रोपाई कर सकता है। किसानों को भ्रम रहता है कि जितनी गर्मी मौसम होगी उतना ज्यादा तेल निकलेगा, लेकिन इस चक्कर में वो गर्मी की फसल लेट करके दोनों तरफ नुकसान झेलते हैं। अगर बारिश हो गई तो पूरा नुकसान। जबकि अगेती मिंट से इतने समय में दो बार मेंथा बो सकते हैं।


नई तकनीक में ध्यान रखने योग्य बातें

इस तकनीक में समतल क्यारियों के स्थान पर मेड़ बनाकर उस पर रोपाई की जाती है।

मेड़ों की दूरी एक दूसरे से 40-50 सेमी और पौध से पौध की दूरी 25 सेमी रखनी चाहिए।

कटाई के 15-20 दिन पहले ही सिंचाई बंद कर देनी चाहिए लेकिन फसल सूखने न पाए।

कटाई से पहले सिंचाई करने से पौधों की लम्बाई बढ़ती है लेकिन कुछ समय बाद पौधों की पत्तियां गिरनी शुरू हो जाती हैं।

कटाई के समय खेत में नमी है तो पत्तियां और अधिक गिरती हैं।

समय-समय पर खेत के पौधों को पास से देखना चाहिए ताकि समय रहते कीट प्रबंधन किया जा सके।

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