पराली से मल्चिंग : मेंथा में निराई- गुड़ाई का झंझट खत्म, सिंचाई की भी होगी बचत

Arvind ShuklaArvind Shukla   25 March 2019 6:38 AM GMT

पराली से मल्चिंग : मेंथा में निराई- गुड़ाई का झंझट खत्म, सिंचाई की भी होगी बचतमेंथा के गढ़ में कुछ किसानों ने पुआल यानि पराली से मल्चिंग शुरू कर दी है

बाराबंकी (यूपी)। मेंथा की खेती में तेल का भाव सही रहा तो मुनाफा अच्छा होता है। लेकिन एक तरफ जहां सिंचाई ज्यादा करनी पड़ती हैं वहीं निराई-गुड़ाई में काफी मेहनत और पैसा खर्च हो जाता है। लेकिन मेंथा के गढ़ में कुछ किसानों ने पुआल यानि पराली से मल्चिंग शुरू कर दी है। इससे निराई-गुड़ाई की जरुरत नहीं पड़ेगी और सिंचाई भी घटेगी।

उत्तर प्रदेश में बाराबंकी को मेंथा और पिपरमिंट का गढ़ कहा जाता है। देश का करीब 80 फीसदी मेंथा ऑयल उत्पादन अब यहीं होता है। बाराबंकी में मसौली ब्लॉक के अमदहा गांव किसान मनोज मौर्य पिछले कई दशकों से मेंथा की खेती करते आ रहे हैं, इस बार उन्होंने अपने खेत में नया प्रयोग किया है। मेंथा की रोपाई के बाद इन्होंने अपने एक एकड़ खेत में कतारों के बीच में पुआल (पराली- पैरा) बिछाया है। इसका फायदा पूछने पर मनोज गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मेंथा रोपाई के करीब 10-12 दिन बाद मैंने कतारों के बीच की दूरी धान का पैरा बिछा दिया है, क्योंकि इससे खेत में खरपतवार नहीं जमेगा। तो निराई-गुड़ाई नहीं करानी पड़ेगी।"

तकनीकी भाषा में फसल के बीच इस तरह पराली बिछाने को मल्चिंग कहते हैं। हालांकि भारत में ज्यादातर प्लास्टिक की मल्चिंग होती है, लेकिन ये काफी महंगा पड़ता है। बाराबंकी के किसानों को पराली का ये फायदा बताने वाली संस्था एग्रीबिजनेस सिस्टम इंटरनेशनल के टेक्निकल डॉयरेक्टर डॉ. एसपी सिंह बताते हैं, "हमने दो साल की रिसर्च और सफल रिजल्ट के बाद किसानों को मेंथा में पुआल से मल्चिंग का सुझाव दिया है। वैसे मेंथा में कम से कम 2 निराई और एक गुड़ाई करनी हो होती है, लेकिन अगर पौधे के बीच पुआल डाल दिया जाए तो खरपतावार होगा ही नहीं। यानि किसान के खर्च का एक बड़ा भाग बच जाएगा।' देखिए वीडियो

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पुआल से मल्चिंग का दूसरा फायदा वो सिंचाई में गिनाते हैं। मेंथा को काफी पानी की जरुरत होती। कई इलाकों में 12-13 पानी (सिंचाई) लगते है, इस तकनीकी में कम से कम 2 पानी कम लगेंगे यानि निराई गुड़ाई के साथ डीजल भी बचेगा।' ये पराली का काफी अच्छा इस्तेमाल है, क्योंकि अभी तक पराली पशुओं के लिए चारे और कुछ पेपर इंडस्ट्री के अलावा किसी काम नहीं आ पा रही थी।

पंजाब, हरियाणा , यूपी समेत कई राज्यों में किसान धान कटाई के बाद भारी मात्रा में पराली जलाते हैं। वर्ष 2017 में तो पराली के धुएं से दिल्ली तक सांस लेने मुश्किल हो गया था। ऐसे पराली से मल्चिंग इसका बेहतर उपाय हो सकता है।

डॉ. एसपी सिंह कहते हैं, "एएसआई बाराबंकी में ही अकेले 7500 से ज्यादा किसानों के साथ शुभ मिंट प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। हम किसानों का उन्नत तरीकों से मेंथा करना सिखाते हैं, उन्हें ट्रेनिंग और खेत पर जानकारी देते हैं, लेकिन इस बार सिर्फ 1000 किसानों को पराली से मल्चिंग करवा पा रहे हैं क्योंकि पराली नहीं हैं, इसकी जानकारी होने के बाद किसान पराली जलाना बंद कर देंगे।" देखिए वीडियो

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खेत-खेत जाकर पराली बिछाने के फायदे बताने वाले संस्था के कृषि प्रसार अधिकारी बलराम मिश्रा बताते है, "पिछली बार हम लोगों ने कुछ किसानों के खेत में इसका इस्तेमाल किया था, "जो काफी कारगर रह था, किसानों निराई और सिंचाई का खर्च तो कम हुआ था, उत्पादन भी अच्छा था, जिन किसानों ने मेंथा काटकर धान लगाए थे, उन्हें और फायदा मिला था, क्योंकि ये पराली बाद में अच्छी खाद बन गई थी।'

मेंथा में निराई गुड़ाई और सिंचाई का ही सबसे ज्यादा खर्च होता है। लेकिन अगर पौधों के बीच पुआल डाल दिया जाए तो खरपतावार कम होगा तथा निराई-गुड़ाई कम करनी हागी। साथ ही सिंचाई के खर्च में कमी आएगी।
डॉ. एसपी सिंह, टेक्निकल डॉयरेक्टर, एएसआई

मेंथा करीब 90 दिन की फसल है। इस दौरान उसमें लगातार पानी लगता है। जब तक मेंथा कटकर तैयार होती है पराली सड़कर अच्छी खाद बन जाती है। डॉ. एसपी सिंह बताते है, "पराली की मल्चिंग फल,फूल और सब्जियों वाली उन सभी फसलों में हो सकता है, जो लाइन में लगाई गई हों। पहले तो ये पानी और निराई बचाएगा, फिर सड़कर मिट्टी में मिल जाएगा इससे जमीन में कार्बन तत्व बनकर मिल जाएगा, जिससे जीवाश्म की मात्रा बढ़ेगी, खेत उपजाऊ हो जाएगा।" देखिए वीडियो

शुभ मिंट के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मेंथा किसानों की आमदनी बढ़ाने वाली फसल है, लेकिन इसमे पानी ज्यादा लगता है, यही वजह है पंजाब समेत कई इलाकों में इसकी खेती बंद हो गई। हम शुभ मिंट के जरिए किसानों कम पानी और लागत में मेंथा की खेती करवा रहे हैं। पिछले साल करीब 2 हजार किसान थे, इस बार ये संख्या बढ़कर साढ़े 7 हजार हो गई है। अगले साल 15 हजार का लक्ष्य है।"

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वो आगे बताते हैं, "जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात कही है, उसके लिए जरुरी है, किसानों को तकनीकी के साथ पूरी सलाह दी जाए। हम लोग किसानों को मेंथा की उन्नत किस्मों की पौध से लेकर मृदा प्रशिक्षण और सलाह सब कुछ देते है। कम लागत में ज्यादा उत्पादन लेकर ही आमदनी बढ़ाई जा सकती है।"

हम शुभ मिंट के जरिए किसानों से कम पानी और लागत में मेंथा की खेती करवा रहे हैं। पिछले साल करीब 2 हजार किसान थे, इस बार ये संख्या बढ़कर साढ़े 7 हजार हो गई है। अगले साल 15 हजार का लक्ष्य है।
अभिजीत शर्मा, प्रोजेक्ट मैनेजर, शुभमिंट

कैसे होती पराली से मल्चिंग

पराली से मल्चिंग के लिए जरुरी है, मेंथा लाइन में सही दूरी ( लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटी मीटर पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटी मीटर) में हो। रोपाई के 10-12 दिनों बाद लाइनों के बीच पुआल की हल्की लेयर बिछा देते हैं। डॉ. एसपी सिंह के मुताबिक एक एकड़ मेंथा के लिए मुश्किल से 50-60 बोझ (ग्रामीण बोलचाल की माप) पैरा लगेगा। अगर प्लास्टिक से मल्चिंग कराई जाए तो करीब 7 हजार की लागत आएगी जबकि पुआल अगर किसान के घर का हो तो मुश्किल 300-400 रुपए का खर्च आएगा वो भी मजदूरी का।

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