आल्हा-ऊदल की कहानी सुनाती हीर सिंह और वीर सिंह की गढ़ी

आल्हा-ऊदल की कहानी सुनाती हीर सिंह और वीर सिंह की गढ़ी

रामजी मिश्रा, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

लखीमपुर(उत्तर प्रदेश)। यह वही स्थान है जहां हुई आल्हा खंड में वर्णित गांजर की लड़ाई हुई थी। बरसात के मौसम में लोकप्रिय आल्हा जगह जगह सुना और गाया जाने लगता है। कहा जाता है कि कन्नौज के राजा जयचंद ने आल्हा और ऊदल को गंगा पार पड़ने वाली बेरिहा गढ़ी में कर वसूलने भेजा था। बेरिहा गढ़ी के राजा हीर सिंह और वीर सिंह ने कर देने से मना कर दिया जिसके चलते युद्ध हुआ और यह उल्लेख आल्हा की गांजर की लड़ाई में है।

मानसून में आल्हा की बात न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। गाँव-गाँव सुना और गाया जाने वाला आल्हा। यह न सिर्फ खासा लोकप्रिय है बल्कि इसकी कहानियाँ इतिहास को भी संजोए हैं। गाँव गाँव में गाए जाने वाले आल्हा की ऐसी ही एक कहानी कह रही है ध्वस्त हो चुकी बिरिया गढ़ी।


स्थानीय लोगों के मुंह से और कुछ इतिहास के पन्नों ने हमें रूबरु कराया कि आखिर गढ़ी ध्वस्त कैसे हुई थी। लखीमपुर जिले के मितौली तहसील का एक गाँव है जिसका नाम है हिन्दू नगर। इसी हिन्दू नगर में इस गढ़ी सबसे ऊंचे टूटी-फूटी ईंटों के टीले हैं। वैसे यह गढ़ी कठिना नदी के किनारे है।

नदी के एक तरफ पश्चिम दिशा के गाँव जिला लखीमपुर में आते हैं और दूसरी तरफ के पूर्व दिशा के सीतापुर जिले में। वहीं एक पास ही के गाँव का नाम बीरिया भी है जो सीतापुर जिले में आता है, लेकिन यह जिले के बार्डर पर है। गढ़ी के टूटे-फूटे ईंट पत्थर के टुकड़े कई किलोमीटर दूर तक फैले हैं।


कहा जाता है कि कन्नौज के राजा जयचंद को गांजर से बारह साल का कर नहीं मिला था। उदल ने कर वसूल कर लाने का फैसला किया। आल्हा और उदल एक बड़ी फौज लेकर लाखन के साथ कर वसूलने आए। इधर बीरिया गढ़ पर हीर सिंह और वीर सिंह दो भाई राज्य कर रहे थे। इन्होंने कर देने से मना कर दिया।

यहाँ पर सरकार द्वारा पुरुस्कृत साहित्यकार रमाकांत पाण्डेय 'अकेले' से बात की। वो बताते हैं, "हीर सिंह और वीर सिंह के पिता ने यहां आकर अपना राज्य स्थापित किया था। हीर सिंह और वीर सिंह का कन्नौज को कर न देना युद्ध की वजह बना। इसका उल्लेख गांजर की लड़ाई में स्पष्ट रूप से है। बहुत विकराल युद्ध हुआ।"

वो आगे कहते हैं, "आल्हा को विजय नहीं मिली तब उन्होने शिलहट देवी की स्थापना की। यह प्रसिद्ध शिलहट माता का मंदिर सीतापुर जिले के महोली तहसील में पड़ता है।

पाण्डेय ने यहाँ पर लोगों को मिले सिक्के और उस समय के कुछ अन्य कीमती सामान के बारे में भी बात की। रमाकांत पाण्डेय अकेले ने अपनी पुस्तक सिद्ध पीठ शिलहट में इस कहानी पर विस्तृत प्रकाश डाला है।


सीतापुर जिले के महोली तहसील के ब्रम्हावली गाँव के चंद्रमोहन बताते हैं, "बचपन में आल्हा खूब होता था, वीर रस से भरे आल्हा को सुनकर बाहें फड़क उठती हैं। चन्द्रमोहन के अनुसार उनका यह क्षेत्र वीरगाथा काल से सीधे तौर पर जुड़ा है। बेरिहा गढ़ी में टूटी फूटी ईंटों के टीले, टूटी मूर्तियां और तमाम तरह के टूटे फूटे हथियारों के टुकड़े यहाँ के लोगों को मिलते रहे हैं ऐसी चर्चाएं यहां पर आम बात हैं।d

लखीमपुर और सीतापुर के कई गाँवों तक इस गढ़ी का साम्राज्य था। आज यह गढ़ी सरकार और लोगों की नजरों से दूर है कारण हैं शायद इसका गाँव से जुड़ा होना। लालच में पड़कर कई बार लोग अवशेषों को खोजते या उनसे छेड़खानी करते नजर आते हैं। यह गढ़ी बहुत ही पुरानी है ऐतिहासिक है बावजूद इसके विडंबना तो देखिए यह सरकार की नजरों से दूर और अपनी उपेक्षा की कहानी भी कहती हुई नजर आ रही है।

और यहीं से शुरू हुआ गांजर का युद्ध एक ऐसा घमासान युद्ध जो दिन या हफ्ते भर नहीं बल्कि महीने भर से भी ज्यादा चलता रहा। तलवारें चली भाले चले तीर चले और बात न बनी तो बंदूकें और तोप भी चलीं। हीर सिंह और वीर सिंह बहुत बहादुरी से लड़े. कहा जाता है उनकी गढ़ी तोप के गोलों से ध्वस्त हो गई।

लगभग एक हजार साल पहले के आस पास हुए इस युद्ध में तबाही की तस्वीर गढ़ी आज भी बयां कर रही है। इस गढ़ी के रहस्यों और रोचक ऐतिहासिक कथाओं को जानने के लिए हमने कई आस पास के गाँव देखे और वहाँ के लोगों से इस बारे में बात की।

हिन्दू नगर के जसवंत बताते हैं, "इस गढ़ी के बारे में वह अपने पुरखों से सुनते थे। बहुत अधिक तो वह नहीं जानते लेकिन यहां हीर सिंह और वीर सिंह का राज्य था जो बाद को युद्ध का मैदान बन गया। गढ़ी पर आश्रम बना कर रह रहे कामतादास कहते हैं कि य‍ह सब रण है। यहीं युद्ध हुआ गाँव के राम पाल बतातें हैं कि सैकड़ो साल हो गए।

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