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पूरे सदन को उन लोगों से माफ़ी मांगनी चाहिए, जिनकी लाशें गंगा में बह रही थीं, राज्य सभा में प्रो. मनोज कुमार झा का पूरा भाषण

संसद के मानसून सत्र में चर्चा के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और बिहार से राज्यसभा सांसद (राष्ट्रीय जनता दल) ने अपने 8 मिनट के भाषण में ऐसा कुछ कहा कि देशभर में उनकी चर्चा हो रही है। लोग उनकी आवाज़ को देश के लाखों की आवाज़ कह रहे हैं। पढ़िए और सुनिए पूरा भाषण...

ये कोई भाषण के रुप में नहीं है। शोक संतत गणतंत्र का एक नागरिक समझिए या एक जनप्रतिनिधि समझिए, उसकी ओर से कुछ बातें कही जा रही हैं। सबसे पहले माफीनामा उन तमाम लोगों के लिए जिनकी मौत को हम लोग Acknowledge (संज्ञान) नहीं कर रहे। हम मान ही नहीं रहे कि वो मारे गए हैं। ये माफीनामा सिर्फ मेरा नहीं है।

मैं ये इसलिए ये बात कह रहा हूं क्योंकि मैंने मई के महीने में 6 आर्टिकल लिखे। संसद चल नहीं रही थी, कहां अपनी शिकायत ले जाते। किससे कहते। मुझे भाजपा के मित्रों ने बधाई दी, मैंने उनका ऐहतराम किया।

मैं कहता हूं ये भरोसा इस सदन का है कि एक साझा माफीनामा हम लोगों को उन लोगों को भेजना चाहिए, जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं।

सर (उपसभापति) किसी सत्र के बीच 50 लोगों के शोक संदेश किसी के लिए नहीं हुए। संसदीय इतिहास में भी। (संसद के दो सत्रों के बीच दोनों सदनों के 50 सांसदों की मौत)

राजीव सातव की उम्र थी इस दुनिया से जाने की। रघुनाथ महापात्रा, जब मिलते थे गले लगाते थे। बोलते थे जय जगन्नाथ, अचानक वो नहीं हैं।

ये पीड़ा व्यक्तिगत है। आंकड़ा मैं नहीं कहना चाहता। मेरा आंकड़ा तुम्हारा आंकड़ा। अपनी पीड़ा में आंकड़ा खोजिए। एक व्यक्ति नहीं है, इस देश में, इस सदन में, उस सदन (लोकसभा) में, सदन के बाहर जो ये कहे कि उसने किसी जानने वाले को नहीं खोया है।

ऑक्सीजन के लिए लोग फोन करते थे, हम अरेंज नहीं कर पाते थे। लोग समझते थे सांसद है ऑक्सीजन बिछा देगा। 100 फोन में, पूरे दिन में फोन नंबर देखते थे, सक्सेज रेट 2, सक्सेज रेट 3...

हमें कोई आंकड़ा नहीं देखना है। हमें देखना है कि जो लोग हमें छोड़कर गए हैं वो जिंदा दस्तावेज छोड़कर गए हैं हमारे फेल्यिर (असफल होने) का...

आप कहिएगा 70 साल में कुछ नहीं हुआ। मैं उसमें जाना ही नहीं चाहता। ये कलेक्टिव फेल्यिर (सबकी असफलता) है, 1947 से अब तक की सरकारों की... क्या बना दिया हमनें...।

हमें पता नहीं था कि आस्पताल और ऑक्सीजन का क्या रिश्ता होता है। मैं मेडिकल बैकग्राउंड से नहीं आता है। लेकिन सुबह से देखता था ऑक्सीजन, ऑक्सीजन, रेमडेसिवीर,.. मैंने शुरु में उच्चारण चेक किए, कि कैसे दवाई का उच्चारण करूंगा। तब हम आंकडों की बात कर रहे हैं, तब हम... ये कह रहे हैं कि थैंक्यू फलाना साहब, ढिकाना साहब..

मैं यहां से निकलता हूं, बाहर बहुत बड़ा विज्ञापन लगा है, मुफ्त वैक्सीन, मुफ्त राशन....

मैं आज किसी दल की तरफ से नहीं बोल रहा हूं। मैं दावे से कहता हूं कि मैं लाखों लोगों की तरफ से बोल रहा हूं। जो यहां बोलना चाहते हैं।

अब मेरी बात सुनिए आज, शिकायत नहीं कर रहा हूं, ये वेलफेयर स्टेट हैं ना, एक साबुन की टिकिया अगर गांव में कोई गरीब खरीद रहा है ना तो सर, अडानी अंबानी के बराबर का करदाता है।

आप उसको कह रहे हो मुफ्त... मुफ्त वैक्सीन, मुफ्त इलाज, मुफ्त राशन...

नहीं साहब कुछ मुफ्त नहीं है। उसका स्टेट है, इस वेलफेयर स्टेट का कमिटमेंट है। उसे आप डिनाइग्रेट (महत्वहीन) न करें। उसे बौना न बनाइए, ये आग्रह है मेरा।

मैं भी मानता हूं कि कोरोना चैलेंज है हमारे लिए। बहुत बड़े बड़ी बातें नए नए कानूनों की हो रही है, राइट टू हेल्थ (स्वास्थ्य का अधिकार) की बात क्यों नहीं करते हम लोग। स्वास्थ्य का अधिकार, उसमें कोई लेकिन, किंतु, परंतु, ही सीधे स्वास्थ्य का अधिकार। राइट टू लाइफ (जीने का अधिकार) के साथ लिंक करिए, किसी अस्पताल की मजाल नहीं होगी कि वो खिलवाड़ कर पाए।

पॉपुलेशन (जनसंख्या) को लेकर बहुत बातें हो रही हैं। डेमोग्राफी को ड्रेमोग्राफर को छोड़ दीजिए। लेकिन ये हम कर सकते हैं, इस सदन में और उस सदन में, Right to life राइट टू वर्क। कानून लाइए…

कोरोना महामारी में हॉस्पिटलिटी सेक्टर से लोग निकाले गए गए। मैंने आवाज उठाई कोई सुनने वाला नहीं है सर, कोई सुनने वाला नहीं है। अगर आप सांसद की नहीं सुन रह हैं तो जो छोटे आदमी, अदना संविदा वाले हैं, नौकरी से निकाले गए उनकी कौन सुनेगा।

एक और अदभुत चीज हुई इसी कौरोना के दौरान, माननीय उपसभा पति महोदय हाहाकार मचा हुआ था, हास्पिटल के लिए, आईसीयू बेड के लिए, दवाइयों के लिए, उस दौर में कई चीजें हुईं। जिसमें एक महत्वपूर्ण थी, जिसका जिक्र करूंगा।

मैं सिर्फ केंद्र सरकार को नहीं कहूंगा, कई राज्य सरकारें भी नदारद थी, वो डेढ़ महीना (कोरोना का पीक टाइम) कैसे बिताएं हैं इस मुल्क ने... हमारे सदन के कई लोग बड़ी मुश्किल से बचकर आए हैं, मैं नाम नहीं लूंगा। पूरे देश ने वो वक्त कैसे बिताया है नाइट मेयर की तरह लगता है। डरावना लगता है। मेरा एक स्टूडेंट 37 साल का, हॉस्पिटल में बेड जब तक मैंने अरेंज किया. वो दुनिया छोड़कर जा चुका था।

इसलिए मैं बार-बार कर रहे हैं, इसमें व्यक्तिगत पीड़ा को खोजिए, तब हम इसका निदान खोज पाएंगे।

एक खत मैंने मृत आत्माओं के नाम लिखा था। कुछ कर नहीं पा रहा था, बेबसी में एक खत लिखा। जो लोग इस दुनिया से चले गए। उसमें मैंने सरकार को कुछ सलाह दी थी, और जो उस बीच कहा गया कि सरकारें फेल नहीं थी सिस्टम फेल कर गया, अरे साहब ये सिस्टम क्या है?

बचपन से सुनते थे कि सिस्टम के पीछे व्यक्ति होता है। सिस्टम के पीछे संरचना होती है। अगर सिस्टम फेल हुआ है दिल्ली में या गांव की किसी की गलियों में तो वहां की सरकारें फेल हुईं हैं, इसे सिस्टम का नाम मत दीजिए... क्योंकि वहीं ये सिस्टम बनाते हैं।

मैंने एक शिकायत नहीं कि, किससे शिकायत करता, आहत हूं। जगाना चाहता हूं स्वयं को भी आपको भी। क्योंकि अगर गंगा में तैरती लाशें को जिंदगी में डिग्निटी चाहिए। मौत में उससे बड़ी डिग्निटी (गौरव, मर्यादा) चाहिए। हमने अन-डिग्नीफाइड डेढ को विटनेस किया है। अगर हमने इसे दुरस्त किया है नहीं किया को आने वाली सदियां माफ नहीं करेंगी।

आप बड़े-बड़े इस्तहार छपवाओ, अखबारों के चार पन्ने रंग दो, फनाला थैंक्यू, कोई फायदा नहीं, इतिहास को थैंक्यू कहने का मौका मिलने चाहिए।

जयहिंद

अगर मेरी बात से फिर भी किसी को कष्ट पहुंचा हो तो मैं उन्हीं लाखों लोगों की डेड बॉडी के बिहॉव (उनकी तरफ से) पर आपसे मांफी मागता हूं। जय हिंद



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