सोनभद्र: जिस खेत पर आदिवासी कर रहे हैं खेती, उस पर किसी और का दावा क्यों

भीम कुमार, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

सोनभद्र(उत्तर प्रदेश)। सोनभद्र के उभ्भा गांव में हुए नरसंहार की चर्चा पूरे देश में है। इस घटना में हुई गोलीबारी में 10 लोग मारे गए थे। सोनभद्र के आदिवासी इलाकों में अक्सर भूमि विवाद देखने को मिलता है। हमेशा देखा जाता है कि खेती और बुवाई के समय में यहां कोई न कोई विवाद निकल कर सामने आ ही जाता है। बरसात के आते ही यहां इस तरह का विवाद होना आम है।

पूरे सोनभद्र में दो तरह के विवाद देखने को मिलते हैं। एक विवाद आदिवासियों और वन विभाग में देखने को मिलता है, तो दूसरा आदिवासियों और दंबंगो के बीच। आदिवासियों को भूमि विवाद की इस समस्या से निजात दिलाने के लिए वन अधिकार कानून 2006 लाया गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य था कि आदिवासियों को उनके पुश्तैनी जमीनों का मालिकाना हक मिल सके।

वन विभाग ने केवल 12020 दावों को ही सही माना

ग्रामीण देव कुमार ने बताया कि 65536 आदिवासी लोगों ने जमीनों पर मालिकाना हक के लिए दावा किया था, लेकिन इनमें से 53506 दावों को बिना सुनवाई के ही खारिज कर दिया। इन दावों में 12020 दावों को ही वन विभाग की ओर से सही माना गया । इस पर आदिवासियों का कहना है कि सालों से इस जमीन पर वह खेती करते आ रहे हैं, उनसे पहले उनके दादा परदादा यहां खेती करते थें। अब दूसरा कोई आता है और इस जमीन को अपना बताने लगता है।

नगांव गांव के गीतबंधन अपनी जमीन दिखाते हुए बताते हैं कि इस जमीन पर हमारे बाप दादा खेती करते थे और अब हम खेती कर रहे हैं। कोई भी नया आता है कहने लगता है कि जमीन अपने नाम करा लिए हैं, अब छोड़ेंगे नहीं।

महेशानंद समाजिक कार्यकर्ता हैं वह कहते हैं कि आदिवासियों को जो जमीन मिलना चाहिए था वह भी छीन लिया गया। वन अधिकार कानून की फिर से समीक्षा होनी चाहिए और सरकार को खूद आदिवासियों को उनका हक दिलाना चाहिए।

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जिन भूमि पर किसान खेती कर उसे वन विभाग बता रहा है अपना

वन विभाग 2000 हेक्टेयर में बसे नगवा गांव के 1400 से ज्यादा भूमि को भी अपना बताता है। वन विभाग इसके लिए वह धारा 20 का हवाला देता है। 5000 आबादी वाले इस गांव में 95% अनुसूचित जनजाति के खरवार जाति के आदिवासी रहते । इसी गांव के 40 वर्षीय देव बली खरवार अपने 5 बीघे जमीन पर खेती कर अपने परिवार का जीवन यापन करते आ रहे है। लेकिन अब वन विभाग इनके जमीन को भी अपना बता रहा है।

समाजिक कार्यकर्ता अभय सिंह बताते हैं कि वन अधिकार कानून आने से पहले साहूकारों, दबंगों , वन विभाग आदिवासियों में जमीन को लेकर विवाद होता था। वन अधिकार कानून आने के बाद लगा आदिवासियों को न्याय मिलेगा, लेकिन जिला प्रशासन इस कानून को लेकर उदासीन रहा। जिला प्रशासन की ओर से आदिवासियों को यह तक नहीं बताया गया कि कितने दावे को सही माना गया और किन दावों को खारिज कर दिया गया है।



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