मिलिए चित्रकूट के ट्री-मैन भैयाराम से, अकेले लगा दिए 40 हजार से ज्यादा पेड़

बुंदेलखंड में हर जगह पर जब गर्मियों में सूखा नजर आता है, तो गाँव से बाहर एक छोटे से पहाड़ के पास जंगल में हरियाली दिखती है। ये हरियाली भैयाराम यादव के कई साल की अथक मेहनत का परिणाम है।

Divendra SinghDivendra Singh   10 Feb 2021 5:42 AM GMT

चित्रकूट (उत्तर प्रदेश)। देश में हर साल लाखों पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन इनमें से कितने पौधे पेड़ बनकर तैयार हो पाते हैं, इसकी जानकारी नहीं मिल पाती। लोग आमतौर पर पेड़ लगाकर उसे भूल जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए भैयाराम यादव एक उदाहरण हैं, जिन्होंने साल 2007 में पेड़ लगाने की शुरूआत की और एक अच्छा-खासा जंगल बसा दिया।

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के भरतपुर गाँव में जब हर जगह पर गर्मियों में सूखा नजर आता है, तो गाँव से बाहर एक छोटे से पहाड़ के पास जंगल में हरियाली दिखती है। ये हरियाली भैयाराम यादव के कई साल की कड़ी मेहनत का नतीजा है। यहां के सभी पेड़ भैयाराम के लगाए हुए हैं। जब उन्होंने पेड़ लगाने की शुरुआत की तो भैयाराम के साथ वही हुआ जो हर जुनूनी व्यक्ति के साथ होता है, गाँव में लोगों ने उन्हें पागल कहना शुरू कर दिया था।

भैयाराम जल्दी अपने इस जंगल को छोड़कर कहीं नहीं जाते हैं। फोटो: दिवेंद्र सिंह

भैयाराम के इस जुनून की कहानी बहुत अनोखी है, भैयाराम गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "जब मैं छोटा सा था तब मेरे माता-पिता मुझसे कहते थे, भैयाराम तुमको तो हम नहीं पढ़ा पाए, लेकिन हम तुमको पढ़ाई बता देते हैं कि ज्यादा नहीं महुआ का पांच पेड़ लगा लेना। उसी में तुम्हारा नाम चलता रहेगा।"

वो आगे कहते हैं, "इसके बाद मेरे तीन बच्चे हुए, लेकिन तीनों बच नहीं पाए, फिर पत्नी भी नहीं रही। तब मैंने ये शपथ उठा ली कि अब मैं अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जिऊंगा। बस तब से पेड़ लगाना शुरु कर दिया। ये जो पेड़ लगा रहा हूं, ये सब दूसरों के लिए ही लगा रहा हूं, वृक्ष अब मेरे पुत्र हैं और इन्हीं के लिए अब मैं जी रहा हूं।"

भैयाराम ने जंगल में चेतावनी भी लिखकर टांग दी है, जिससे कोई पेड़ न काटे। फोटो: दिवेंद्र सिंह

भैयाराम ने गाँव से बाहर खाली जगह पर झोपड़ी बनाई और वहीं रहने लगे। ज़मीन वन विभाग की तो थी लेकिन यहां एक भी पेड़ नहीं था। पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। भैयाराम गाँव से सुबह-शाम पानी भरकर लाते और पौधों को पानी देते।

"जब पेड़ लगाना शुरू किया तो सब कहते थे कि ये तो पागल हो गया है, पहाड़-पहाड़ पेड़ लगाता है, पहाड़ खोदता रहता है। अब जब खोदूंगा तभी तो पेड़ लगाऊंगा, भैयाराम ने आगे कहा।

पीछे दिख रहे इसी घर में भैयाराम रहते हैं, पहले इस जगह पर झोपड़ी थी, अब गाँव वालों ने मदद से ये कच्चा घर बना दिया है। फोटो: दिवेंद्र सिंह

आज पौधे, पेड़ बन रहे हैं, कभी ख़ाली पड़ी वन विभाग की इस जमीन पर आम, महुआ, बबूल, बरगद, पीपल जैसे हजारों पेड़ों का जंगल सा बस गया है। अब तो गाँव वाले भी उनके इस प्रयास को समझने लगे हैं। गाँव के कई युवा अब उनकी मदद करने भी आ जाते हैं, लेकिन कई बार लोग चोरी से पेड़ काट भी ले जाते हैं। भैयाराम कहते हैं, "दिन में तो किसी की हिम्मत नहीं होती, लेकिन कई बार रात में लोग पेड़ काटने आ जाते हैं, इसलिए मैं रात में भी जागता रहता हूं। मैं कभी लोगों को सूखी लकड़िया लेने से मना नहीं करता, लेकिन किसी को भी हरा पेड़ नहीं काटने देता।

अब इस जंगल में सरकारी हैंडपम्प भी लग गया है, जिससे पौधों को पानी देने में मदद हो जाती है। भैयाराम कहते हैं, "मैं शासन-प्रशासन से यही कहना चाहूंगा, हर साल जितने सरकारी पेड़ लगाए जाते हैं, अगर उनकी देखभाल हो तभी वो बच पाएंगे। मैं अकेला आदमी जब इतने पेड़ बचा सकता हूं, तो वो पेड़ भी बच सकते हैं।"

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