बड़ी कठिन होती है नागा साधु बनने की प्रक्रिया

प्रयागराज। सोलह वर्ष के मनीष गिरि की पहचान अब बदल गई है, अब वो मनीष नहीं मनीष गिरि नागा बाबा के नाम से जाने जाते हैं, इन्हीं की तरह ही हज़ारों ऐसे नागा बाबा हैं, जिन्होंने सब कुछ त्याग कर नागा बाबा बनने की राह चुनी।

गाजियाबाद के नागा बाबा मनीष गिरी बताते हैं, "हमारे गुरु जी हमें मुक्ति सीखा रहे हैं, यहां पर हम आसन और भक्ति भाव सीख रहे हैं।"


अपने नागा बाबा बनने के बारे में वो कहते हैं, "तीन साल हो गए हमें नागा बाबा बने हुए, प्रयागराज में कुंभ जैसे अभी लोग बाबा बन रहे हैं ऐसे ही तीन साल पहले हम भी उज्जैन कुंभ में नागा बाबा बने थे।"

नागा साधुओं को धर्म रक्षक योद्धा माना जाता है। इन साधुओं का संबंध शैव संप्रदाय है। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय हजारों नागा साधुओं ने धर्म की रक्षा के लिए अब्दाली की सेना का सामना किया और गोकुल की रक्षा। यही वजह है कि हिंदू धर्म में इन्हें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। धर्म के सिपाही होने के नाते नागा साधु आम जीवन से दूर कठोर अनुशासनपूर्ण जीवन जीते हैं।


साधु नरोत्तम गिरि सन्यास में गुरु की महत्ता समझाते हुए रामचरित मानस की एक चौपाई का जिक्र करते हैं, "गुरु गृह पढ़ने गए रघुराई, अल्पकाल सब विद्या पाई, उस समय भी राजा रामचन्द्र जी ने माता पिता का त्याग करके गुरु के पास पांच-छह बरस व्यतीत किए थे और भगवान कृष्ण जी ने भी गुरु जी के यहां रहकर सुदामा के साथ शिक्षा ग्रहण की थी।"

साधु बनना आसान नहीं होता इस बारे में वो आगे कहते हैं, "इसके लिए धन-माया का त्याग, मान-अपमान का त्याग करना होता है, ये गुरु-शिष्य परंपरा होती है, जिसके लिए सर्वप्रथम त्याग करने की आवश्यकता होती है। सब कुछ त्याग करके ही सन्यास दीक्षा ग्रहण की जाती है। सर्वप्रथम अहंकार का त्याग करना होता है, जो शिष्य जिज्ञासा लेकर आता है, उसी को सन्यास की दीक्षा जल्दी प्राप्त होती है।"

आदिगुरु शंकराचार्य धर्म के नाम पर हो रहे संघर्ष और विदेशी आक्रांताओं से धर्म की रक्षा के लिए पुख्ता रास्ता निकालने का साधन ढूंढ रहे थे। इसी क्रम में इन्होंने धर्म रक्षा सेना तैयार किया। इसमें ऐसे युवाओं को शामिल किया गया जो कठोर साधना का पालन करते हुए धर्म की रक्षा कर सकें। शंकाराचार्य का यह प्रयास नागा साधुओं के रूप में सामने आया। वर्तमान में नए नागा साधुओं को कुंभ में ही नागा साधु बनने की दीक्षा दी जाती है। 13 अखाड़ों में से केवल शैव अखाड़ों में ही नागा साधु बनने की दीक्षा दी जाती है। इनमें जूना अखाड़े में सबसे अधिक नागा साधु बनते हैं।

नागा साधु बनने के लिए यह प्रक्रिया सबसे खास मानी जाती है। महापुरुष बनने के बाद नागा साधु को अवधूत बनने की परीक्षा देनी होती है। इस प्रकिया में सबसे पहले मुंडन किया जाता है इसके बाद स्वयं को मृत मानकर अपने हाथों से श्राद्ध और पिंडदान करते हैं।

गीतानंद गिरि (नागा बाबा) कहते हैं, "जब सनातन धर्म पर कोई विपदा पड़ती है तो वहां नागा दल आगे आते हैं, रुद्राक्ष हमारा श्रृंगार है, वही रुद्राक्ष हमारा देवता है जो हमारे भोलेनाथ का श्रृंगार है।"

वो आगे कहते हैं, "नागा लोगों की भी मान मर्यादा है, सन्यासियों के लिए वस्त्र नहीं है, लेकिन हम बहन-बेटियों और मां के बीच में जाते हैं, तो वस्त्र धारण करना पड़ता है असल में तो भस्म ही हमारा कवच होता है।"

दीक्षा के बाद गुरु से नागा साधु को गुरुमंत्र मिलता है। यह गुरु मंत्र हमेशा उसके जीवन तक उसका साथ देता था।











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