Top

सुरों की मलिका लता मंगेशकर और एक मासूम सी ख़्वाहिश

यतीन्द्र की डायरी' गांव कनेक्शन का साप्ताहिक शो है, जिसमें हिंदी के कवि, संपादक और संगीत के जानकार यतीन्द्र मिश्र संगीत से जुड़े क़िस्से बताते हैं। इस बार के एपिसो़ड में यतीन्द्र ने स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर जी से जुड़ा एक बेहतरीन संस्मरण सुनाया।

ये क़िस्सा सुरों की मलिका लता मंगेशकर जी ने यतीन्द्र को उन दिनों सुनाया था, जब वे अपनी किताब 'लता - सुर गाथा' के लिए उनसे बातचीत किया करते थे। आइए यतीन्द्र के ही शब्दों में पढ़ें (और वीडियो में देखें) ये प्यारा क़िस्सा।

ये वो दौर था जब लगा मंगेशकर जी पार्श्व गायन के लिए संघर्ष कर रही थीं, ये वाकया 1944-45 का रहा होगा। जब लता मंगेशकर की उम्र मुश्किल से 14-15 साल की होगी। इस वक्त उन्होंने ये हसरत पाल ली कि उनका नाम रेडियो पर प्रसारित हो। उस दौर में रेडियो पर एक कार्यक्रम आता था, 'आपकी फरमाइश' जिसमें गाने सुनाए जाते थे। साथ ही, गीत की फरमाइश करने वाले का नाम भी पुकारा जाता था। लता जी के मन में ये हसरत हुई कि मैं भी अपना नाम रेडियो पर सुनूं। इसके लिए उन्होंने ग़ज़ल की महान अदाकारा बेग़म अख्तर साहिबा की एक ग़ज़ल चुनी, 'दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे'

उन्होंने रेडियो को लिखकर भेजा कि ये गाना सुनना है। इसके बाद वो रोज़ रेडियो चलाकर बैठती थी कि कब ये गाना सुनाया जाएगा। कई हफ्ते बाद, एक दिन अचानक रेडियो पर उनका नाम अनाउंस हुआ कि लता मंगेशकर 'दीवाना बनाना हे तो बनाना बना दे' ग़ज़ल सुनना चाहती है। ग़ज़ल सुनने से ज़्यादा अभिभूत लता जी अपना नाम सुनकर हुई थीं...

यतीन्द्र कहते हैं कि इस छोटे से संस्मरण से एक नवोदित कलाकार के मन के भाव छिपे हुए हैं। हालांकि बहुत जल्द ही लता मंगेशकर के नाम एक गायिका के तौर पर पहले रेडियो फिर दूरदर्शन पर छा गया था, पर पहली बार रेडियो पर अपना नाम सुनने सुनने में जो रोमांच महसूस हुआ था वैसा रोमांच फिर दोबारा कभी नहीं हुआ।


इसे भी देखें: आख़िर क्यों ग़ज़ल गायिका बेग़म अख़्तर ने लौटाई थी अयोध्या के राजा को इनाम की ज़मीन?



Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.