गाँव कनेक्शन सर्वे: जल संकट 35 प्रतिशत ग्रामीणों को आधा किमी दूर से लाना पड़ता है पानी

Union Budget 2019 से ठीक पहले गाँव कनेक्शन के 19 राज्यों में 18,000 ग्रामीणों के बीच किए गए सबसे बड़े ग्रामीण सर्वे में जो आंकड़े सामने आए वो जल संकट पानी को लेकर ग्रामीणों के दर्द की कहानी कहते हैं।

Manish Mishra

Manish Mishra   27 Jun 2019 8:45 AM GMT

लखनऊ/विदिशा। जल संकट से जूझता भारत: दस साल के मोहित को हर रोज स्कूल जाने में देर हो जाती है, उसको यह देर कोई खेलने की वजह से नहीं होती। मोहित की तरह दूसरे बच्चों का भी देर से स्कूल जाना मजबूरी है।

"हमें हर रोज एक किमी दूर से पानी लाना पड़ता है, जिस वजह से रोज स्कूल जाने में देर हो जाती है। यह काम दिन में दो बार करना पड़ता है," कई पीले बड़े-बड़े डिब्बों के बीच बैठे मध्य प्रदेश में विदिशा जिले के चकरघुनाथपुर गाँव में रहने वाले मोहित ने बताया।

मोहित कक्षा सात में पढ़ाई करता है, लेकिन उसे पढ़ाई से ज्यादा पानी की ढुलाई पर मेहनत करनी पड़ती है। उसकी ही तरह उसके गाँव के दूसरे बच्चे भी कभी समय से स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि उन्हें भी पानी भर के घर में रखना पड़ता है।

यह कहानी सिर्फ मोहित या उसके गाँव के दूसरे लड़कों की ही नहीं है, भारत के 60 करोड़ लोग इस समय इतिहास के सबसे बुरे जल संकट से जूझ रहे हैं।

गाँव कनेक्शन के 19 राज्यों में 18,000 ग्रामीणों के बीच किए गए सबसे बड़े ग्रामीण सर्वे में जो आंकड़े सामने आए वो पानी को लेकर ग्रामीणों के दर्द की कहानी कहते हैं।


गाँव कनेक्शन के सर्वे के अनुसार 35.3 प्रतिशत घरों की महिलाओं को अपनी जरूरत के लिए पानी लाने के लिए घर से आधा किमी दूर तक जाना पड़ता है। महज 60.9 फीसदी लोगों को ही जरूरत का पानी घर में उपलब्ध होता है।

वर्ष 2018 में आई नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत इतिहास में जल संकट से सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। जबकि हर साल दो लाख लोग साफ पीने का पानी न मिलने से अपनी जान गंवा देते हैं।

"जहां तक लोगों के घरों तक पानी नहीं पहुंचने का सवाल है, तो भारत सरकार की बहुत ही महात्वकांक्षी योजना है 'नेशनल रुरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम (राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना)', जिसका लक्ष्य था कि 2020 तक देश के 70 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक पाइप वाटर सप्लाई पहुंचाना। लेकिन 2017 तक मात्र 17 प्रतिशत घरों में ही पाइप्ड ड्रिंकिग वाटर सप्लाई (नल से पेयजल की सप्लाई) हो पाई," वाटर ऐड इंडिया में प्रोग्राम एंड पॉलिसी के निदेशक अविनाश कुमार बताते हैं।

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केन्द्र सरकार के नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम के तहत हर ग्रामीण को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाना है। इस योजना में साल 2014-15 में जहां 15,000 करोड़ रुपये जारी होते थे, वहीं आज 700 करोड़ रुपये ही जारी हो रहे हैं।

नीति आयोग की वर्ष 2018 में आई रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2020 तक दिल्ली और बंगलुरू जैसे भारत के 21 बड़े शहरों से भूजल गायब हो जाएगा। इससे करीब 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। अगर पेयजल की मांग ऐसी ही रही तो वर्ष 2030 तक स्थिति और विकराल हो जाएगी। वर्ष 2050 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में छह प्रतिशत तक की कमी आएगी।


एक तो पानी दूर से लाना, दूसरे उसकी गुणवत्ता सही न होने से लाखों परेशान होते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 प्रतिशत पानी दूषित है और पेयजल स्वच्छता गुणांक की 122 देशों की सूची में भारत का स्थान 120वां है।

"हमारी सबसे बड़ी समस्या है हम मैप नहीं करते कि कहां क्या समस्या है? योजना बनाने लगते हैं। पाइप से पानी कहां से लाएंगे, कैसे घरों तक पहुंचाया जाएगा। इन सभी पर अध्ययन करने की जरूरत है। जल संरक्षण के क्षेत्र में ईमानदारी से काम नहीं हो रहा है। हमारी पॉलिसी इन्वेस्टमेंट बेस्ड हो गई हैं, " ग्राउंड वाटर एक्शन ग्रुप के आरएस सिन्हा समझाते हैं।

आरएस सिन्हा आगे कहते हैं, "हम लोग पानी को मैनेज नहीं कर पा रहे, हमें देखना होगा कि भूजल नीचे जा रहा है तो उसे कैसे रिचार्ज करेंगे। हम यही नहीं कर पा रहे।"

इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार भारत के 50 प्रतिशत शहरी, 85 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में पानी चिंताजनक ढंग से विलुप्त हो रहा है। 3400 विकासखण्डों में से देखा गया कि 449 विकासखण्डों में 85 प्रतिशत से अधिक पानी खत्म है। ज्यादातर राज्यों में भूमिगत जलस्तर 10 से 50 मीटर तक नीचे जा चुका है।

वहीं, भारत में पानी के कुप्रबंधन को समझाते हुए अविनाश कुमार कहते हैं, "इससे बड़ा दु:खद पहलू क्या होगा कि द इकोनॉमिस्ट ने जल संकट को लेकर एक रिपोर्ट छापी जिसमें बढ़िया चीजों के लिए इजराइल से तुलना की गई थी और कुप्रबंधन के बारे में भारत को दिखाया गया।"

आगे कहते हैं, "एक केन्द्रीयकृत विजन के तहत हम स्थानीय स्रोतों को पकड़ने की कोशिश करते हैं। यहीं दिक्कत है, योजनाओं में स्थानीय स्रोतों को पकड़ना होगा," आगे कहते हैं, "इसमें समुदाय की भागीदारी को सुनिश्चित करना पड़ेगा, लोकल गवर्नेंस को शामिल करना पड़ेगा। ताकि पानी सचमुच लोगों तक पहुंच पाए।"


इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार धरती पर कुल 14000 लाख घन किमी पानी है। इतने पानी से पूरी धरती पर 3000 किमी मोटी परत बन सकती है, पर कुल पानी का 2.7 प्रतिशत पानी ही शुद्ध है। इसका भी अधिकांश हिस्सा ध्रुवों पर जमा है। यह पानी उपयोग के लिए नहीं है। इस तरह से एक प्रतिशत से भी कम पानी हमें उपलब्ध है। यह नदियों, झीलों, कुँओं, तालाबों और भूमिगत भंडारों के रूप में है।

"जबसे होश संभाला है तब से पानी की ही दिक्कत दे रहे हैँ, कोई सरकार पानी के बारे में नहीं सोच रही। तीन किमी दूर से साइकिल से हम लोग पानी लाते हैं, जानवर पाल नहीं पा रहे, भैंस खरीद नहीं पा रहे। गर्मी के दिनों में तो पूरा घर पानी में ही लगा रहता है," मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के चकरघुनाथपुर गाँव के घनश्याम यादव कहते हैँ।

विदिशा से 350 किमी दूर मध्य प्रदेश के ही सतना जिले के कैमासन गाँव में रहने वाली मालती को ज़िंदगी की एक जंग हर रोज लड़नी होती है, उन्हें पानी लाने के लिए हर रोज एक किलोमीटर जाना और हैंडपंप पर लाइन लगाना पड़ता है।

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वर्ष 2012 में बनी जल नीति के अनुसार भारत में विश्व की 18 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, जबकि महज 4 प्रतिशत उपयोग लायक पानी के स्रोत हैं। उसपे भी तुर्रा यह कि नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नीति निर्धारकों के सामने बड़ा संकट यह है कि उनके पास कोई आंकड़ा ही नहीं है कि घरेलू कार्यों और उद्योगों में कितना पानी का उपयोग होता है।

जल संकट से सिर्फ भारत ही नहीं, पूरा विश्व जूझ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट-2019 के अनुसार पूरी दुनिया में 1980 के बाद से हर साल पानी का उपयोग एक प्रतिशत बढ़ जाता है। जबकि वर्ष 2050 तक पूरी दुनिया में 20 से 30 प्रतिशत जब पानी की मांग मौजूदा उपयोग से बढ़ जाएगी।

दुनिया भर के दो बिलियन लोग पानी को लेकर तनाव में रहते हैं जबकि 4 बिलियन लोग साल में कम से कम एक महीने गंभीर पानी की समस्या का सामना करते हैं।


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