ग्राम उदय के लिए उत्सव नहीं ज़मीनी स्तर पर कम करने की ज़रुरत

ग्राम उदय के लिए उत्सव नहीं ज़मीनी स्तर पर कम करने की ज़रुरतgaonconnection, ग्राम उदय के लिए उत्सव नहीं ज़मीनी स्तर पर कम करने की ज़रुरत

पिछले माह की 14 तारीख से 24 तारीख तक ‘ग्राम उदय से भारत उदय अभियान’ चलाया गया। 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिवस से 24 अप्रैल 2016 को पंचायती राज दिवस तक चले इस अभियान के तहत ग्रामीण भारत के लिए केंद्र की विभिन्न योजनाओं के बारे में जागरूकता पैदा की गई।

बताया गया इसका लक्ष्य गाँवों में सामाजिक सौहार्द बढ़ाना, पंचायती राज को मजबूत करना, ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन देना और गरीबों के लिए किसानों के कल्याण व आजीविका को प्रोत्साहन देना था। इस अभियान को तीन चरणों में पूरा किया। पहला चरण सामाजिक एकता से जुड़ा था दूसरा ग्राम पंचायतों में डॉ. अम्बेडकर की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में ग्रामवासियों द्वारा अम्बेडकर के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर सामाजिक समरसता को मजबूत करने का संकल्प लेना था और तीसरे चरण में प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक ग्राम सभा का आयोजन किया जाना था।

अब सवाल यह उठता है क्या वास्तव में 10 दिन में ग्राम उदय से भारत उदय तक लक्ष्य सम्पन्न हो गया? क्या भारत इतना छोटा और बेहद कम विविधता व चुनौतियों वाला देश है जहां इतना बड़ा कार्य सिर्फ 10 दिन में पूरा किया जा सके? क्या गाँवों में रहने वाले लोग वास्तव में इस बात पर हामी भर सकते हैं कि उन्होंने इन 10 दिनों के अंदर सामाजिक समरसता व आर्थिक विकास के सारे गुण सीख लिए? यदि ऐसा है तो अब भारत के गाँव उड़ान भरने की स्थिति में पहुंच गए फिर अब सरकार के लिए कोई कार्य शेष ही नहीं बचे? लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ है तो फिर इस दस दिन के आयोजन को क्या माना जाए-प्रहसन या राजनीतिक प्रोपोगैंडा? क्या वास्तव में ग्राम उदय के लिए महज राजनीतिक प्रोपोगैंडा की जरूरत है या फिर उनकी वास्तविक समस्याओं के समाधान की जो फंड, फंक्शन और फंक्शनरीज के ट्रैप के कारण सुलझाई नहीं जा पा रही हैं?

सबसे पहले बात पंचायती राज व्यवस्था की जाए क्योंकि इसी व्यवस्था के पास ग्राम उदय की चाबी है। संवैधानिक व्यवस्था और पंचायती व्यवस्था से जुड़े प्रावधानों को देखें तो पंचायतीराज संस्थाओं को भारतीय संविधान ने संवैधानिक अधिकार और थोड़ी बहुत वित्तीय शक्तियां प्रदान कर दीं लेकिन योजनाएं बनाने और उन्हें लागू कराने का काम सरकारों और उनकी नौकरशाही से लेकर कर्मचारी वर्ग के हाथों में ही केनि्द्रत रहा। पंचायती राज संस्थाओं की इस संदर्भ में भूमिका को अस्पष्ट रखा गया। इन संस्थाओं के लिए न ही मानव बल को लेकर कोई दिशा-निर्देश तय हुए हैं और न ही उनसे जुड़े कामों को लेकर कोई स्पष्ट तस्वीर पेश की गई। संविधान की 11 वीं अनुसूची में दिए गए 29 विषयों को जोड़ते हुए राज्य के 13 विभागों में तीनों स्तर की पंचायतों को शक्तियां प्रत्यायोजित की गई हैं। बावजूद इसके ढेरों खामियां हैं जिनमें सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि अधिकतम विभागों में उन संस्थाओं के लिए फंड ही नहीं हैं। इस बिंदु पर सरकार की तरफ से कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं।

दूसरी समस्या यह है कुछ विभागों ने उन शक्तियों का बंटवारा अलग-अलग लेवल पर नहीं किया है जिससे यह भ्रम बना हुआ है कि किस स्तर पर कौन सा कार्य किया किया जाएगा। 12वीं पंचवर्षीय योजना के कार्य समूह ने पंचायती राज संस्थाओं और ग्रामीण शासन तथा अन्य समीक्षाओं (जैसे आईआईपीए 2012) में इसकी प्रगति को नितांत अपर्याप्त पाया है। इस अपर्याप्तता के मुख्य तीन कारक हैं- निधि, कार्य और अधिकारी। सभी जानते हैं कि बिना निधि के कार्यों का अंतरण व्यर्थ है। पंचायती राज संस्थाओं को केन्द्र सरकार से बहुत बड़ी धनराशि राज्य सरकार के विभागों या स्थानीय प्रशासन के माध्यम से मिलती है लेकिन पंचायतीराज संस्थाओं को अक्सर यह पता नहीं होता कि उन्हें कितना धन मिलेगा और कब मिलेगा। स्पष्टता के अभाव से योजना बनाने की क्षमता और कार्यों के निधियन में बाधा पहुंचती है। कुछ राज्य सरकारें इस प्रक्रिया को कारगर बनाने का प्रयास कर रही हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा ने हाल ही में केन्द्र और राज्य विकास योजनाओं की निधि को ग्राम पंचायतों के बैंक खाते में सीधे डालने का प्रस्ताव दिया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राज्य सरकारें पंचायती राज संस्थाओं को बहुत कम धन देती हैं।

पंचायती राज संस्थाओं के रूप में राजस्व संसाधन भी अपर्याप्त होते हैं जो उन्हें प्रभावी निकाय बनने से रोकते हैं। आंशिक रूप से इसका कारण संसाधन जुटाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। यह तो रहा सरकार का दोष लेकिन सबसे बड़े दोषी पंचायत व्यवस्था के तहत चुने गए प्रतिनिधि होते हैं क्योंकि जो धन मिलता भी है वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है जिसकी शुरुआत पंचायत चुनाव के समय से ही हो जाती है। अधिकांश पंचायत प्रतिनिधि इसलिए चुनाव नहीं लड़ते कि उन्हें गाँव का विकास करना है बल्कि इसलिए लड़ते हैं क्योंकि उन्हें पंचायती व्यवस्था के तहत प्राप्त धन का बड़ा हिस्सा अपनी निजी अर्थव्यवस्था से जोड़ना है, इसमें उन्हें सहयोग देती है ग्रामीण जनता। यद्यपि वह पंचायती संस्थाओं की अक्षमता, गैर-जवाबदेही वाले आचरण, अकुशलता से पीड़ित होती है पर अंततः वह ऐसे ही प्रत्याशियों को चुन लेती है जो उन्हें छोटे-मोटे लालच देने और झूठ बोलने में कुशल होते हैं।

जहां तक कार्य का सवाल है तो कुछ राज्यों ने दूसरों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है पर कुल मिलाकर राज्य सरकारों ने पंचायती राज संस्थाओं के लिए संविधान में परिकल्पित जिम्मेदारियों या कार्यों की शृंखला को लागू करने की अनिच्छा जाहिर की है। हरियाणा, कर्नाटक, केरल और सिक्किम ने सभी 29 विषयों के हस्तांतरण के लिए आदेश जारी किए हैं जबकि शेष ने केवल कुछ विषयों के लिए ही आदेश जारी किए। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के दस्तावेजों के अनुसार ज्यादातर राज्यों के पंचायती राज अधिनियमों में पंचायती राज संस्थाओं की गतिविधियों और बजट की समीक्षा तथा अनुमोदन (या अस्वीकृति), स्वीकृत प्रस्तावों और निर्वाचित अधिकारियों को निलम्बित करने तथा सत्ता व कार्यों को वापस लेने सम्बंधी अधिकार अब भी बने हुए हैं।

इसका अर्थ यह है लगभग सभी राज्यों में पंचायतीराज संस्थाओं के ऊपर जिला कलक्टर, संभागीय आयुक्त या राज्य सरकार स्वयं अपने अधिकार का प्रयोग करती हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 73वें संविधान संशोधन अधिनियम की भावना की बड़े पैमाने पर उपेक्षा की गयी है-अधिनियम की कल्पना से इतर पंचायती राज संस्थाएं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के शब्दों में ‘अनुमोदक कार्यात्मक क्षेत्र’ के अंतर्गत काम कर रही है। चार राज्यों-केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में जहां सभी ने हस्तांतरण के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है- एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार कानून और व्यवहार दोनों ही में जिम्मेदारियों का अधिकतर काम राज्य के पास होता है। राज्य निचले स्तर को प्रशासनिक जिम्मेदारी दे देते हैं लेकिन स्वशासन की स्वायत्तता इकाई के रूप में पंचायती राज संस्थाओं को बहुत कम देते हैं।

पंचायती राज संस्थाओं को जो कुछ काम मिलते हैं वे बहुत कम महत्व वाले होते हैं। जो जिम्मेदारी पंचायती राज संस्थाओं को मिलती भी है वह प्रत्याशियों की अयोग्यता और गाँव की जनता की अनभिज्ञता या उदासीनता की भेंट चढ़ जाती है। ऐसे में ग्राम उदय कैसे सम्भव होगा? असम्भव तो कुछ भी नहीं है पर इसके लिए सरकारों को नुमाइशी प्रक्रिया से अलग गाँवों के लिए कुछ करना होगा और गाँवों की जनता को अपने अधिकारों तथा सरकारों से गाँव के लिए भेजे गए धन की एक-एक पाई की जानकारी रखनी होगी। उन्हें गाँव की पंचायतों को गाँव के विकास के लिए चुनना होगा और निजी हितों को दरकिनार करना होगा। यह कार्य आज के भारतीय समाज में, जहां संवेदनाएं कमजोर हो गई हों, मन कलुषित और मस्तिष्क निजी अनुलाभों पर ही कार्य करते हों, मुश्किल है पर यदि सामूहिक प्रयास हो तो इस ट्रैप से निकला जा सकता है।

(लेखक आर्थिक व राजनीतिक विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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