By Dr SB Misra
भले ही कबीर जीवन भर हिन्दू और मुसलमानों को फटकारते रहे, लेकिन अंत में दोनों ही उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। पता नहीं कहाँ तक सही है, जब चादर उठाई गई तो उसके नीचे केवल फूल निकले। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने ढंग से संस्कार किया। वह न हिन्दू थे और न मुसलमान, वह थे बस एक अच्छे इंसान। सेकुलरवाद को बचाने के लिए कबीर को और निकटता से समझना और समझाना होगा।
भले ही कबीर जीवन भर हिन्दू और मुसलमानों को फटकारते रहे, लेकिन अंत में दोनों ही उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। पता नहीं कहाँ तक सही है, जब चादर उठाई गई तो उसके नीचे केवल फूल निकले। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने ढंग से संस्कार किया। वह न हिन्दू थे और न मुसलमान, वह थे बस एक अच्छे इंसान। सेकुलरवाद को बचाने के लिए कबीर को और निकटता से समझना और समझाना होगा।
By Dr SB Misra
भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।
भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।
By Dr SB Misra
नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।
नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।
By Dr SB Misra
अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और नैतिक साहस की दुर्लभ मिसाल थे। छात्र जीवन में साम्यवादी संगठन से लेकर संघ, जनसंघ, जनता पार्टी और अंततः भाजपा तक उनका सफ़र विचारधाराओं की जकड़न से ऊपर मानवीय मूल्यों की खोज है।
अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और नैतिक साहस की दुर्लभ मिसाल थे। छात्र जीवन में साम्यवादी संगठन से लेकर संघ, जनसंघ, जनता पार्टी और अंततः भाजपा तक उनका सफ़र विचारधाराओं की जकड़न से ऊपर मानवीय मूल्यों की खोज है।
By Dr SB Misra
ग्रामीण भारत की जल-व्यवस्था कभी सामुदायिक तालाबों और कुओं पर टिकी थी। आज वही संरचनाएँ उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर गाँवों की जल-धरोहर बचाई जाए, तो देश के जल संकट से निपटा जा सकता है।
ग्रामीण भारत की जल-व्यवस्था कभी सामुदायिक तालाबों और कुओं पर टिकी थी। आज वही संरचनाएँ उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर गाँवों की जल-धरोहर बचाई जाए, तो देश के जल संकट से निपटा जा सकता है।
By Dr SB Misra
भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।
भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।
By Dr SB Misra
गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।
गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।
By Dr SB Misra
एक समय था जब गाँवों की लाइफ साइकिल और बैलगाड़ी तक सीमित थी। आज वहां मोटरसाइकिल, कार और ट्रैक्टर की भरमार है, लेकिन ड्राइविंग ट्रेनिंग और ट्रैफिक नियमों की समझ पीछे छूट गई। नतीजा: दुर्घटनाएं बढ़ रहीं, और जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।
एक समय था जब गाँवों की लाइफ साइकिल और बैलगाड़ी तक सीमित थी। आज वहां मोटरसाइकिल, कार और ट्रैक्टर की भरमार है, लेकिन ड्राइविंग ट्रेनिंग और ट्रैफिक नियमों की समझ पीछे छूट गई। नतीजा: दुर्घटनाएं बढ़ रहीं, और जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।
By Dr SB Misra
मन में एक सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म मनुष्य के अस्तित्व के लिए कितना जरूरी है? आखिर मनुष्य कोई धर्म लेकर तो पैदा नहीं होता; उसे जिस परिवार में वह पैदा हुआ, उसके बड़े-बूढ़ों से धर्मज्ञान मिलता है।
मन में एक सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म मनुष्य के अस्तित्व के लिए कितना जरूरी है? आखिर मनुष्य कोई धर्म लेकर तो पैदा नहीं होता; उसे जिस परिवार में वह पैदा हुआ, उसके बड़े-बूढ़ों से धर्मज्ञान मिलता है।
By Dr SB Misra
आधुनिक भारत में हम भले ही तकनीक और विकास की राह पर आगे बढ़ गए हों, पर हमारी नैतिकता, शिक्षा और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है। कैसे औपनिवेशिक मानसिकता, अंधी आधुनिकता और मूल्यों का ह्रास आज के समाज, राजनीति और शिक्षा- सबको प्रभावित कर रहा है।
आधुनिक भारत में हम भले ही तकनीक और विकास की राह पर आगे बढ़ गए हों, पर हमारी नैतिकता, शिक्षा और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है। कैसे औपनिवेशिक मानसिकता, अंधी आधुनिकता और मूल्यों का ह्रास आज के समाज, राजनीति और शिक्षा- सबको प्रभावित कर रहा है।
By Gaon Connection
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By Manvendra Singh
By Preeti Nahar
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