Read latest updates about "संवाद" - Page 1

  • वैकल्पिक खेती का रूप कोई नहीं सुझाता

    केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने शनिवार को देश के गांवों के बारे में एक खयाल पेश किया है। इस साल लोकसभा चुनाव के ऐन पहले उन्होंने गांवों को आदर्श बनाने के लिए अपना विचार सामने रखा। विचार यह है कि देश में पारंपरिक खेती को बदलना पड़ेगा। पारंपरिक खेती से उनका मतलब यह है कि अभी देश में दशकों से कुछ...

  • जीडीपी के आंकड़ों को लेकर मीडिया में बड़ी गंभीरता से हो रही हैं बातें

    देश की माली हालत से देश के हर नागरिक का सरोकार होता है। जाहिर है गांव और किसान का भी उतना ही सरोकार है। अब ये अलग बात है कि गांव और किसान की गरीबी और बदहाली के कारण उन्हें देश की अर्थव्यवस्था के हाशिए पर डाल दिया गया हो, फिर भी लोकतांत्रिक देश होने के कारण गांव और किसानों को जोड़े रखना राजनीतिक...

  • राजस्थान के बाड़मेर में अकाल से पशु-पक्षियों के मौत का सिलसिला जारी

    डॉ. आर.बी. चौधरी चेन्नई। सूखा प्रभावित बाड़मेर में इस साल कि भीषण गर्मी में ताल तलैया सूख गया है और आंखों देखी हाल के अनुसार पशु पक्षियों की हालत अत्यंत दयनीय है पूरे जिले में पशुधन तेजी से मर रहा है खास करके चारा-पानी के अभाव में। बाड़मेर के तमाम ग्रामीणों का कहना है कि अनुरोध पर राहत मिलती...

  • पत्रकारिता किसके लिए और किनके विषय में हो यह महत्वपूर्ण विषय है

    डॉ. नरेंद्र तिवारीनारद ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक माने गए हैं। वे विष्णु के अनन्य भक्त हैं और बृहस्पति के शिष्य हैं। ये प्रत्येक युग में मानव कल्याण के लिए सदैव सदा विचरण करते रहते हैं। इनकी वीणा 'महती' से नारायण-नारायण की ध्वनि निकलती रहती है। नारद आद्य पत्रकार माने जाते हैं। नारद का...

  • 'सब तो लीडर हैं यहां फॉलोवर कोई नहीं'

    महागठबंधन बनाने का खूब प्रयास चला लेकिन थेाड़ी सी प्रांतीय गुटबन्दी के आगे नहीं बढ़ पाया। विपक्ष के लिए 2014 से भी बदतर हालत बन चुकी है। उत्तर प्रदेश मायावती को प्रधानमंत्री का दावेदार स्वीकार करके अखिलेश यादव ने राहुल गांधी को नेता मानने से इनकार कर दिया है। कांग्रेस की समझ में नहीं आता कि जो...

  • विकास की दौड़ में कहां हैं मज़दूर

    एक मई को पूरी दुनिया मजदूर दिवस मनाती है। इस दिन मजदूरों या श्रमिकों के कल्याण की बातें की जाती हैं। आज के दिन रस्म के तौर पर यह भी याद किया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाने की परंपरा कब शुरू हुई थी? क्यों शुरू हुई थी? भले ही आज इस दिवस का रूप बदल गया हो फिर भी विकसित विश्व में मजदूरों...

  • अतिवृष्टि और अनावृष्टि का चक्रव्यूह कैसे टूटेगा ?

    आममतौर से देखा गया है कि दो साल लगातार सामान्य वर्षा के बाद तीसरे साल सूखा जैसी हालत आती है। मौसम विज्ञानी के. निरंजन और उनके साथी शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च का परिणाम 2013 में छापा और इंटरनेट पर उपलब्ध कराया। इसके अनुसार 1901 से 2010 के बीच देश में 21 बार सूखा पड़ा है। समय के साथ हालात बिगड़ ही रहे...

  • आत्महत्या की रिपोर्टिंग में मीडिया को अधिक जिम्मेदार भूमिका निभाने की जरूरत

    भूपेश दीक्षित आत्महत्या का सीधा अर्थ है स्वयं को मारना अर्थात जानबूझ कर अपनी मृत्यु का कारण बनना। देश में पिछले कुछ सालों से आत्महत्या के प्रकरण बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसा देखा गया है हर आत्महत्या के पीछे कोई न कोई कारण छिपा होता है। अकारण आत्महत्या के मामले न के बराबर हैं। आर्थिक संकट, लम्बी...

  • 24 साल की दुश्मनी फिर 'मुलायम' हुए रिश्ते

    लखनऊ। चाैबीस साल की दुश्मनी के बाद जब मुलायम और मायावती एक मंच पर आए तो जैसे एक दूसरे के प्रति कड़वाहट भुला चुके थे, जहां मायावती ने मुलायम सिंह को पिछड़ों का असली नेता बताते हुए भारी मतों से जिताने की अपील की, तो वहीं मुलायम ने भी कहा, 'वह इस एहसान को नहीं भूलेंगे'। गेस्ट हाउस कांड के 24 साल बाद...

  • "दलित शब्द का प्रयोग वर्जित होना चाहिए"

    चुनाव आयोग ने आजम खां, योगी आदित्यनाथ, मेनका गांधी और मायावती को अमर्यादित बयानों के लिए चुनाव प्रचार से कुछ समय के लिए रोक दिया तो मायावती ने कहा यह दलित समाज का अपमान है । चार बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद वह अभी तक दलित हैं ऐसा कोई नहीं मान सकता। राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत ने तो महामहिम...

  • चुनाव आयोग के सुझावों पर गंभीरता से विचार हो

    आखिर चुनाव आरम्भ हो ही गए और अब विषाक्ता चुनाव प्रचार में कुछ सुधार होगा। बहुमत में कमी रह गई तो जोड़-तोड़ और खरीद-फरोख्त की दुकानें सजेंगी। सरकार मोदी की बनेगी या महागठबंधन की, यह कह नहीं सकते परंतु बहुमत जुटाने में मशक्कत कितनी करनी होगी, यह कहा नहीं जा सकता। चुनाव परिणाम कुछ भी हों, लेकिन...

  • जैसा पिता, वैसा पुत्र? राजनीतिक घरानों के कारण 'भाग्यों का उलटाव' क्यों होता है

    सिद्धार्थ जॉर्ज अनेक समाजों ने वंशवादी शासन समाप्त करने के लिए लोकतंत्र अपना लिया लेकिन राजनीतिक घराने लोकतांत्रिक देशों में हर जगह मौजूद हैं। इस आलेख में भारत में वंशवादी राजनीति के आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया गया है। इसमें पाया गया कि वंशवादी शासन का कुल मिलाकर नकारात्मक आर्थिक प्रभाव होता...

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