गुज़र गए वो कॉमिक्स वाले दिन

गुज़र गए वो कॉमिक्स वाले दिनgaoconnection

गर्मी की छुट्टियों के वो दिन याद हैं न जब हम कॉमिक्स खरीदने की जिद्द किया करते थे। अखबार वाले से कहकर महीने में एक बार या 15 दिनों में आने वाली कॉमिक्स का इंतजार करते थे और जैसे ही कॉमिक्स आती थी अगले दिन ही उसे पढ़कर चट कर जाते थे। यहां तक कि दुकानों से किराए पर कॉमिक्स खरीदकर भी पढ़ते थे।

धीरे-धीरे समय के साथ विडियो गेम और कम्प्यूटर गेम्स का आविष्कार होता गया और अब बच्चे कॉमिक्स कि दुनिया से दूसरी तरफ मुड़ने लगे। अब कॉमिक्स का बाजार भी धीरे-धीरे कम हो रहा है क्योंकि इसके खरीददार कम होते जा रहे हैं। 

पिछले साल हुई नीलामी में इंद्रजाल कॉमिक्स की पहली कॉमिक्स फ़ैंटम 1, 2, 3 की बोली कुल एक लाख रुपए लगाई गई। विश्लेषक हिंदी कॉमिक्स के प्रति लोगों के कम होते रुझान की वजह निम्नस्तरीय कहानियों और चित्रांकन बताते हैं। इसके साथ ही बाजार में बच्चों के मनोरंजन के लिए टीवी, वीडियो गेम वगैरह जैसे नए विकल्प होने की वजह से  90 के दशक के दूसरे हिस्से से ज्यादातर कॉमिक्स प्रकाशन बंद होते गए। इसके अलावा काग़ज़ और छपाई की बढ़ती कीमतों के चलते भी कई लोकप्रिय प्रकाशकों को अपनी प्रेस बंद करनी पड़ी।आज हम आपको भारत में हिंदी कॉमिक्स के इतिहास के बारे में बताते हैं-

अंग्रेजी पात्रों के हिंदी अनुवाद से हुई थी शुरुआत 

भारत में कॉमिक्स प्रकाशन की शुरुआत देखें तो शुरू के वर्षों में हमें विदेशों के ही कॉमिक्स पात्रों के कॉमिक्स को हिन्दी में अनुवादित करके प्रकाशित करने का रिकॉर्ड मिलता है, जिसमें सर्वप्रथम नाम आता है ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ का जिसने 1964 में ‘ द फैंटम्स बेल्ट’ के नाम से महान कॉमिक्स लेखक और चित्रकार ली फॉक के प्रसिद्ध पात्र फैन्टम की कॉमिक्स प्रकाशित की थी।

इसमें एक कॉमिक्स 28 पेज की होती थी और दाम 60 पैसे होते थे। इस तरह साल 1966 में प्रथम हिन्दी कॉमिक्स ‘वेताल की मेखला’ प्रकाशित हुई जो कि ‘द फैंटम्स बेल्ट’ का ही हिन्दी अनुवाद थी। इंद्रजाल कॉमिक्स में केवल कुछ ही मूल हिन्दी पात्रों की कहानियाँ प्रकाशित हुईं जिसमें बहादुर (प्रथम प्रकाशन वर्ष 1981) प्रमुख है। 

70 में आए ‘चाचा चौधरी’

इसके बाद साठ के दशक मे अमर चित्र कथा प्रकाशन का जन्म हुआ जिसमें पौराणिक कथाओं का जिक्र होता था। 1969 में लोटपोट पत्रिका से प्रकाशित की गई जिसमें सबसे पहले मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण ने 1971 में चाचा चौधरी का पर्दापण किया था। 60 के दशक में कॉमिक्स भले ही भारत में आई हो लेकिन बच्चों में इसका क्रेज 70 के दशक हुआ था। इस दौरान कई नए प्रकाशक आए जिनमें डायमंड कॉमिक्स, मधु मुस्कान, आदर्श चित्र कथा, गोवरसंस कॉमिक्स प्रमुख हैं। इस दशक में ही कार्टूनिस्ट प्राण ने चाचा चौधरी, श्रीमती जी, पिंकू, बिल्लू और रमन जैसे किरदारों को जन्म दिया। 

80 के दशक में किरदारों का हुआ जन्म

अस्सी के दशक में स्टार कॉमिक्स, चंदा मामा और चित्रभारती कथा माला जैसे नए प्रकाशक आए। वहीं अस्सी के दूसरे हिस्से में मनोज कॉमिक, तुलसी कॉमिक्स, राधा कॉमिक्स, पवन कॉमिक्स, नीलम चित्रकथा और राज कॉमिक्स जैसे और भी प्रकाशक आए। अब कहानियों के साथ किरदार भी बनने लगे। मनोज कॉमिक्स के पास राम रहीम (बाल जासूसों की जोड़ी), हवलदार बहादुर, महाबली शेरा और क्रूक्बांड जैसे किरदार थे और राज कॉमिक्स ने परमाणु, बांकेलाल, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव जैसे किरदारों को बच्चों के समक्ष पेश किया। 

इस तरह होने लगा कॉमिक्स का अंत

अस्सी के दशक में प्रकाशकों की भरमार की वजह से पाठकों को अच्छी कहानी नहीं मिलती थी। नतीजा 90 के दशक के दूसरे हिस्से से ज्यादातर प्रकाशन बंद होने लगे। केवल कुछ ही प्रकाशन कॉमिक्स प्रकाशित कर रहे थे जिनमे राज कॉमिक्स, तुलसी कॉमिक्स, मनोज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स और अमर चित्र व प्रमुख थे। इसके बाद इनमें से राज और डायमंड कॉमिक्स ही बचे जिनकी अब कॉमिक्सों की संख्या में कमी आई है। कॉमिक्स के सामने एक बड़ी दुविधा पायरेसी की भी है।

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