हथकरघा उद्योग को सहारे की जरूरत

हथकरघा उद्योग को सहारे की जरूरतहथकरघा उद्योग,

विशुनपुर (बाराबंकी)। हथकरघा उद्योग प्राचीन काल से ही भारत की उन्नति और कारीगरों की आजीविका के लिए आधार प्रदान करता आया है।

इसके अंतर्गत मलमल छींट, दरी, खादी जैसी वस्तुएं बनाई जाती हैं और हथकरघा उद्योग से निर्मित सामानों का विदेशों में भी निर्यात किया जाता है, लेकिन वर्तमान में लोगों का मन हथकरघा उद्योग से भंग हो रहा है।

पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में 3320 गाँवों में हथकरघा उद्योग चलाया जाता है, जिनमें 62822 परिवारों के 183119 लोग इस कार्य में लगे हैं। जिनमें से 104240 पुरुष और 78879 महिलाएं शामिल हैं। हाथ से बुनाई प्रमुख रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में होती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ कस्बों व नगरों में भी हाथ से बुनाई का काम होता है।

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कुल बुनकरों का 71.6 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में और 28.4 फीसदी कस्बों और नगरों में उपस्थित हैं। पुरुष तथा महिला बुनकरों का क्रमशः 66.3 फीसदी व 33.7 फीसदी योगदान है।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी. दूर फतेहपुर ब्लॉक के मोहम्मदपुर, विशुनपुर, बिलौली, ररिया, हसनपुर टांडा सहित क्षेत्र के दर्जनों गाँवों में हाथ से बुनाई का काम होता है। जिनमें से कुछ बुनकर धन के आभाव में स्थानीय व्यापारियों द्वारा कच्चा माल प्राप्त करके मजदूरी पर कपड़ा तैयार करते हैं। वहीं कुछ बुनकर अपनी पूंजी से निर्मित वस्त्रों का स्थानीय बाजारों में विक्रय करते हैं।

विशुनपुर के बुनकर गयासुद्दीन (50 वर्ष) ने बताया, “फतेहपुर स्थित व्यापारी के यहां से सूत का गड्डा लाते हैं एक गड्डे की कीमत 950 रुपए होती है। 

घर के सभी सदस्य मिलकर बुनाई का काम करते हैं। तैयार माल को सूत देने वाला व्यापारी खरीद लेता है। एक दिन में लगभग 13 पीस गमछें तैयार हो जाते हैं और 25 रुपए प्रति पीस के हिसाब से इसकी बिक्री होती है। केवल कारीगरी का पैसा मिलता है। बुनाई के कार्य में कोई विशेष लाभ नहीं है। इस कार्य से दिन में केवल सौ और डेढ़ सौ रुपया कमाया जा सकता है, जबकि मजदूरी करने से एक दिन में तीन सौ रुपए का काम हो जाता है। इससे बुनकर बुनाई का कार्य छोड़कर मजदूरी करना ज्यादा पसन्द करते हैं।

कपड़ा कैसे बुना जाता है? इस प्रश्न का जवाब देते हुए बिलौली निवासी मो. असलम बताते हैं, “सबसे पहले सूत की माड़ी लगाई जाती है, जिससे कपड़े में कड़ा पन आ जाए। फिर वायपीन पर लपेटकर ताना जाता है। इसके बाद बेलन पर लपेट कर एक एक तागा गुरिया में और दो तागे कंघी में भरे जाते हैं। फिर बुनाई का काम शुरू होता है।”

“मोहम्मद असलम आगे बताते हैं, “पहले हमारे यहां पर बुनाई का काम होता था, लेकिन इसमें मजदूरी भी नहीं निकलती थी। जिससे दूसरे व्यवसाय की तरफ रुख करना पड़ा।” मोहम्मद असलम की तरह जिले के कई बुनकर सरकारी सहायता और प्रोत्साहन न मिलने से दूसरे व्यवसाय की तरफ अपना रुख करने लगे हैं, जिससे ग्रामीण कुटीर उद्योग ख़त्म होने के कगार पर पहुंच गया है।

रिपोर्टर - अरुण मिश्रा

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