जान ले रहा है चाइनीज़ मांझा

जान ले रहा है चाइनीज़ मांझागाँवकनेक्शन

लखनऊ। चार दिन पहले बाराबंकी में एक बच्चे की मौत उस समय हो गई जब उसकी गर्दन चाइनीज मांझे ने काट दी। बीते रविवार को गाँव कनेक्शन पत्रकार के साथ भी स्कूटी चलाते समय ये हादसा होते होते बचा। महिला पत्रकार के गले से सटकर मांझा निकला, जिससे उनके गले में घाव भी हो गया।

चाइनीज मांझे से लगातार होने वाली दुर्घटनाओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसकी ब्रिकी पर रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार को इस पर सख्ती बरतने को कहा था और मांझा बनाने वाले स्थानों को सीज करने के भी निर्देश दिए थे।

इसके बावजूद भी मांझे बाजारों में बिक रहे हैं और कई लोगों के परेशानी का सबब बन रहे हैं। 24 सितंबर 2015 को इलाहाबाद में रहने वाले गौरव मुखर्जी की जान चाइनीज मांझे से कटने के कारण हुई, जिसके बाद कई दिनों तक इसके खिलाफ प्रदर्शन भी हुआ था लेकिन फिर भी इसकी ब्रिकी पर रोक पूरी तरह से नहीं लग पाई।

लखनऊ के जानकीपुरम निवासी सुनील बाजपेई चाइनीज मांझे का शिकार हो चुके हैं। वो बताते हैं, ‘’कुछ महीनों पहले रास्ते में बाइक से जाते समय मेरा गला मांझे में फंस गया था, हाथ की मदद से मैंने किसी तरह खुद को बचाया लेकिन फिर भी गले में गहरा घाव हो गया, जिसका महीनों इलाज हुआ तब जाकर ठीक हुआ।”

हर वर्ष कई मासूम पक्षी, बच्चे, महिलाएं, आदमी इसका शिकार होते हैं। दमकल विभाग के अनुसार, हर साल अगस्त माह में 10 से 15 पक्षियों के मांझे से फंसकर मरने की सूचना आती है क्योंकि इस माह में गुडिया का त्योहार होता है।

घायल होने वाले पक्षियों को बचाने के लिए बेजुबान क्रांति नाम से जागरूकता अभियान चलाकर स्कूली बच्चों और लोगों को जागरूक किया जा रहा है। वन्यजीवों पर काम करने वाली गैरसरकारी संस्था गो ग्रीन सेव अर्थ फाउंडेशन में कार्यरत आशीष मौर्या इस क्षेत्र में कई वर्षों से काम कर रहे हैं। वो बताते हैं, ‘‘लगातार ऐसी दुर्घटनाएं सामने आती हैं और इससे पक्षियों की जानें भी जाती हैं। हमने इसके लिए डीएम और एसडीएम को पत्र भेजा था, थानों में भी ये पत्र भेजे गए हैं कि चाइनीज मांझे की ब्रिकी को पूरी तरह से रोका जाए और ऐसा फिर भी करने पर सजा दी जाए।’’

चोरी छिपे बिकता है मांझा

रोक लगने के बाद भी पुराने चौक में अभी भी चोरी छिपे ये मांझा बिकता है और पतंगबाज इसे सस्ता और देर तक पतंग न कटे इसलिए खरीदते हैं। चौक के पतंग बेचने वाले दुकारदार सलीम बताते हैं, ‘‘करीब छह साल पहले चाइनीज मांझा भारत में आया था और बहुत कम समय में लोग इसे पसंद करने लगे क्योंकि ये मजबूत और सस्ता होता है। हालांकि इससे खतरा भी बहुत है लेकिन फिर भी पतंग के शौकीन इसे खरीदते हैं।” वो आगे बताते हैं, ‘‘बाजार में कई तरह के चाइनीज मांझे डिस्कवरी, पांडा, क्लासिक, चाइना डोर आते हैं। इन सब पर रोक है लेकिन लोग चोरी छिपे बेचते हैं क्योंकि पतंगबाज इसकी मांग करते हैं।”

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